शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

पत्रकारिता की अन्तर्कथा



सुनील शर्मा, बिलासपुर

मनुष्य के मेरुदंड में 62 हजार नाडिय़ा होती है. यदि रीढ़ की हड्डी स्वस्थ है तो मानिये की मनुष्य स्वस्थ है. यदि एक भी नाड़ी किसी भी कारण से प्रभावित हुई तो यह माना जाता है कि मनुष्य के लिए स्वास्थ्य संकट शुरू हो चुका है.

बिहार योग विश्वविद्यालय के योगाचार्य स्वामी तेजोमयानंद के मुताबिक तो ऊपर लिखी बातें उतनी ही सच है जितना यह कि '' सूरज हमे प्रकाश देता है. पृथ्वी आश्रय. वृक्ष फल, शीतल छाया व आक्सीजन और मां का दूध शिशु के लिए अमृत के समान होता है। '' हमारी भारतीय संस्कृति ही कुछ ऐसी है और हमारे संस्कार ही कुछ ऐसे है कि हमें जो भी बताया जाता है, उसे हम सहजता से मान लेते है, मै यह नहीं कहता की यदि कोई विश्वसनीय व्यक्ति जानकारी देता है, तो उसे नहीं मानना चाहिए , मानना भी चाहिये, लेकिन अब जानकारियां भी त्रुटिपूर्ण और भ्रामक हो सकती है, (खासतौर पर अखबारों में) यह बात भी मान लेने का समय आ चुका है, इसके लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए.

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, खैर इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन मुझे आपत्ति है, भ्रामक खबरें इजाद करने वाले पत्रकारों के कौम से, ऐसे अखबार, चैनल या अन्य मीडिया समूहों से जो ऐसे पत्रकारों को जो सनसनी फैलाने के पैसे लेते है, को अपने यहां इज्जत, शोहरत देते है वह भी मोटी तनख्वाह के साथ.

पिछले दिनों पेशे से पत्रकार एक सुलझे हुए व्यक्ति से पत्रकार, पत्रकारिता और सनसनी खबरों के मुताल्लिक देर तक चर्चा हुई. अपने 20 साल के पत्रकारिता अनुभव को साक्षी रखते हुए उन्होंने बड़े ही साफगोई से कहा-भाई साहब पत्रकार को व्यवस्था यानी कुव्यवस्था के खिलाफ होना चाहिये, कलम सिस्टम के खिलाफ चलाना चाहिये न कि किसी को बलि का बकरा बनाकर हलाल करने और उसकी जेब से रकम ऐंठने के बारे में विचार.

वैसे तो उन्होंने और कई बातें की जिसे लिखने पर पत्रकार साथियों को इतना बुरा लग सकता है कि हो सकता है कि वे कलम-दवात फेंककर गांव-देहात चले जाये और वहां खेती-बाड़ी संभालते हुए परलोक सुधारने का मन बना लें. वैसे भी पत्रकारिता से मोहभंग होना कोई नई बात तो नहीं. इनकी भी बड़ी लंबी जमात है, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी भी पत्रकार थे, किस टाइप के नहीं पता.

खैर, पुराने पत्रकार जैसे भी थे, मैं समझता हूं ज्यादा सुलझे हुए और अपनी निंदा से डरने वाले थे. पाप-पुण्य एक अलग मुद्दा है लेकिन भाई ईमानदारी भी तो किसी चिडिय़ा का नाम है, प्रयास तो यहीं होना चाहिए कि जितनी देर हो सके पेड़ रूपी शरीर पर इसे बिठाकर रखें. दाना-पानी देते रहेंगे तो चिडिय़ा क्यों उड़ेगी.

उन्हीं सुलझे हुए पत्रकार का यह भी कहना था जो बात मुझे जंच गई कि भाई जब तक हो सके रीढ़ की हड्डी सीधी रखी जाये, बेईमानी, तोड़ी-तकाड़ी, उगाह और दलाली सहित इस बिरादरी के तमाम धंधे तो कभी भी और कहीं से भी शुरू किया जा सकता है. प्रेस क्लब में अक्सर जाता रहा हूं. अभी भी जाता हूं. आप यकीन मानेंगे ? वरिष्ठ से वरिष्ठ पत्रकार (जिनमें से कई को मैं पत्रकार नहीं मानता) को मैंने अक्सर अपनी पहली
दलाली, पहली तोड़ी के किस्से अपने जूनियर साथियों के साथ शेयर करते सुना है.

पत्रकारिता के पेशे के नवेलो को वे नमक-मिर्ची लगाकर सही-गलत कहानी सुनाते रहते है. हालांकि भूले से भी उन्होंने कभी अपनी पहली बाईलाईन स्टोरी (हालांकि उनमें से कई कि तो आज तक नहीं छपी) के छपने का जिक्र नहीं किया. पत्रकारिता के संघर्ष के दिनों की कथा-व्यथा नहीं सुनाई. सुनाते भी कैसे न अच्छा काम करने की आदत रही और न अच्छी बात करने की. उनमें उनकी भी गलती नहीं है, क्योंकि उन्होंने जिनसे शिक्षा ली है, वे भी वैसे ही रहे होंगे.

एक किस्सा सुनिये. एक पत्रकार साथी है. एक प्रतिष्ठित अखबार में उपसंपादक के रूप में पदस्थ है. जब वे पत्रकारिता नहीं करते थे तो मेरी घनिष्ठ साथी (जो कि पेशे से स्वयं पत्रकार है) की बहन के साथ लॉ कालेज में पढ़ते थे. पढ़ाई पूरी करने के बाद कोर्ट में पे्रक्टिस भी करते थे.

एक दिन उन्होंने मेरे साथी के घर गये हुए थे. मेरे साथी ने उनसे उनका हाल-चाल पूछा और स्वाभाविक रूप से चर्चा का रुख आर्थिकता की ओर चला गया. फिर क्या था, उन्होंने मेरे साथी से पूछ डाला, भैया कितनी कमाई होती है ऊपरी ? साथी भी थोड़ा मजाकियां है. उसने कह दिया आठ हजार तनख्वा है और 15-20 हजार रुपए हर महीने इधर-उधर से मिल जाते हैं. वकालत करने वाले को यह समझते देर न लगी कि इधर-उधर का मतलब क्या होता है. पर मेरे साथी ने उन्हें यह नहीं कहा कि वे पत्रकारिता के पेशे में आये!

थोड़े ही दिनों बाद वकालत का पेशा छोडक़र वे पत्रकारिता के पेशे में कूद पड़े. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि मेरे साथी के उस मिथ्याकथन पर ही यकीन कर वे पत्रकारिता में यह सोचकर आ गये कि हर महीने 15-20 हजार का जुगाड़ इधर-उधर से हो जायेगा लेकिन कहीं न कहीं उनके मन में लालच तो था. हो सकता है थोड़ी बहुत वैसे ही छानबीन उन्होंने पत्रकारिता की की होगी जिस तरह दहेज की लालच में लडक़ेवाले करते हैं.

जैक लगाकर पत्रकारिता के पेशे में आ तो गये लेकिन शुरूआत में ही आटा-दाल का भाव पता चल गया. दिक्कत और पेश आती अगर पिताजी सरकारी मुलाजिम न होते. उन्होंने शुरू में ही एक-दो मामले ऐसे पकड़े, जिनमें संपादक के साथ उनकी जेब भी हरी-भरी हो जाती लेकिन संपादक महोदय गलती से सिद्धांतवादी, आदर्शवादी, ईमानदार निकले. ऊपर से अच्छे पत्रकार भी रह चुके थे सो जानते थे कि किस तरह नवेले पत्रकार दलाली खाने के चक्कर में रहते है. उन्होंने नवेले पत्रकार को सेटिंग का कोई मौका न देते हुए धड़ाधड़ समाचार छाप दिया. जिसके खिलाफ मामला था, उसके हाथ पांव फूल गये और उसके खिलाफ शुरूआती कार्रवाई भी हो गई.

संपादक बदले तो उनकी तकदीर ने भी पलटा मारा. इसमें क्या आश्चर्य क्योंकि घूरे के दिन भी बदलते है. सदाचारी, ईमानदार, सिद्धांतवादी संपादक के आसन को जब परम भ्रष्ट और चापलुसी पसंद व्यक्ति ने सुशोभित किया तो इस कहानी के मुख्य पात्र ने चापलूसी के सारे रिकार्ड तोड़ दिए और चापलूस पत्रकारों की फेहरिस्त में अव्वल स्थान प्राप्त कर खुद को गौरान्वित महसूस किया. इंक्रीमेंट भी अच्छी मिली और फिर तो तोड़ी-बोड़ी में बंटवारा भी होने लगा.

फिलहाल यह सिलसिला जारी है. भगवान करें दैनिक अखबार में कार्यरत इस उप संपादक बनाम चापलूस पसंद पत्रकार साथी को अक्ल आये और उन्हें समझ आये कि पत्रकारिता वह नहीं जो वो कर रहे हैं, पत्रकारिता वह है जो वो करना नहीं चाहते.

लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ में आ चुकी दरारों के लिए ऊ पर में जिनका जिक्र किया गया है, वैसे ही लाखों पत्रकार जिम्मेदार है. उनका लालच, पैसे को लेकर उनका हवस और समय से पहले सब कुछ हासिल कर लेने की उनकी बेमतलब की ख्वाहिश ने इस पेशे की पवित्रता को अपवित्रता में बदल दिया है. मैं यह बिल्कुल नहीं कहता कि इस पेशे में शुरू में बुराई नहीं थी. रही होगी. पर आज पानी सिर के ऊपर चला गया है. दंतेवाड़ा से लेकर दिल्ली तक पत्रकारिता रूपी स्तंभ की दरारें पड़ चुकी है.

यह सर्वोदित है कि लोकतंत्र में राजनीतिक निष्क्रियता और उदासीनता के साथ ही इसके अहयोग की भावना के कारण कोई भी लड़ाई मुश्किल है लेकिन ऐसी स्थिति में यदि कलम भी बिक जाये और अखबारों के संपादक सरकार को मोटी रकम देने वाली किसी कंपनी के बोर्ड आफ डायरेक्टर की तरह बोले तो इस देश का क्या होगा? देश की जनता जो अखबार में लिखे हुए को सच मानती है और टीवी में दिखाई जाने वाली हर घटना उनके लिए सही है, क्या उसे मीडिया के ये कपूत गुमराह नहीं कर रहे हैं. रामानंद के सीरियल रामायण के प्रसारण के दौरान टीवी पर नारियल और फूल चढ़ाने वाले देश के लोगों को अभी भी समझ नहीं है कि '' अरूण गोविल राम नहीं है केवल राम की भूमिका निभा रहा है और दीपिका सीता नहीं है.''

भोली जनता यह सब नहीं जानती. वह नहीं जानती कि अपनी जेब में हरी-हरी नोट ठूंसने के लिए विदेशी कंपनी के साथ मिली-भगत कर अखबारों के मालिक बेईमान और ईमानदार संपादकों से स्वाइन फ्लू से होने वाली मौत की दहशत छपवाते हैं. लोगों को नहीं पता कि पत्रकारों की दलाली कथा किस मोड़ पर पहुंच चुकी है.

अधिकांश लोगों को आज भी यह मालूम नहीं कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं कमीशन बन चुका है और पत्रकारिता के पेशे से जुड़ा व्यक्ति दलाल की भूमिका निभा रहा है. जो ईमानदार है उन्हें बड़े अखबारों में नौकरी नहीं मिलती है और जो बेईमान है वे अपनी कंपरियों द्वारा दी जाने वाली काकटेल पार्टियों में दारू पी रहे हैं.


पर इन सब के बीच आज भी पत्रकारिता जीवित है. यह सच है कि बेईमानी का रास्ता आसान होता है पर लंबा नहीं है. यह भी झूठ नहीं कि लाख-दो लाख बेईमानों के कारण पत्रकारिता का यह पेशा इतना भी गंदा नहीं हुआ है जहां काम करना मुश्किल हो. आज भी ईमानदार, निष्ठावन, देशभक्त, निष्पक्ष और खरी-खरी लिखने वाले पत्रकार बड़ी संख्या में देश के भीतर मौजुद है.

आज भी आलोक तोमर और उनके जैसे कई पत्रकारों की कलम आग उगलती है. आलोक प्रकाश पुतुल सहित कई ऐसे पत्रकार भी है जो शांतिपूर्ण तरीके से अपना काम करते हैं. ऐसे सभी साथियों को मेरा प्रणाम और साधुवाद व बेईमान पत्रकारों के लिए मन में दया का भाव और ईश्वर से दोनों हाथ जोडक़र केवल यह प्रार्थना कि भगवान उन्हें सद्बुद्धि दे.

1 टिप्पणी:

  1. निश्चित ही आपकी बातों में गहराई है आपने पत्रकारिता को बड़े नजदीक से जाना है आपके बातों का समर्थन करते हुए पत्रकारिता के पहले पायदान पर दाएँ पैर का अंगूठा रखने वाला मुझ जैसा छात्र यही कहेगा
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    पत्रकारिता में जो कूद चुके हैं
    उस पर न जायेगी जुदा रह कोई
    बस भीड़ के साथ ही दलदल में उतरना होगा


    मुझे गर्व है की मेरे पत्रकारिता के दिनों की शुरुआती दोर के डेली डायरी में बतोर गुरु आपका नाम लिखा है .......................

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