शुक्रवार, 18 मार्च 2011

आंगन में चिडिय़ों का घोसला




वह बया का घोसला नहीं था जिसकी सुंदरता और घास के छोटे-बड़े तिनकों की बुनावट मुझे आकर्षित करती, फिर भी मैं अब घोसले के बहुत करीब था.....


मंदार का पेड़ उतना बड़ा नहीं होता, बमुश्किल वह पांच-छह फीट का पेड़ था. उसकी पतली टहनियों की जोड़ पर ही वह घोसला था. अभी मैं पूरी तरह घोसले के करीब पहुंचा भी नहीं था कि आक्रमण के खतरे से एक साथ कई चिडिय़ा चीख उठी.

यह जानने के बाद भी कि चिडिय़ों का समूह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता मैं खुद को सहमने से नहीं रोक पाया. खैर मैंने अपने पांव वहीं रोक लिये और बैठकर रोटी खाने लगा, हालांकि अब रोटियों में वह स्वाद नहीं रहा जो थोड़ी देर पहले तक था. अब वह न गरम थी और न ही मेरा मन उन्हें खाने को ही कर रहा था. मां और भाभी से खाने-पीने के मामले में कोताही बरतने के नाम से मिलने वाले मिश्रित डांट से बचने के लिये रोटी के चंद टुकड़े मैंने निगल लिये.

मुझे शहर लौटने में देर भी हो रही थी लेकिन रह-रहकर मेरा ध्यान उस घोसले पर चला जाता था जो कुछ ही दिनों पहले गौरेया के परिवार ने मंदार पुष्प के पेड़ पर बना लिया था. हालांकि शुरु में यह भाभी और भैया को नागवार गुजरा. हो भी क्यों न जो एक-एक इंच जमीन के लिये पड़ोसियों से मनमुटाव कर लेने वाला संस्कार जो उनके भीतर है, फिर वे शरारती और आंगन में अक्सर गंदगी फैलाने वाले चिडिय़ों का घोसला कैसे बर्दाश्त करते. फिर देखा-देखी कुछ और परिवारों ने अपना घोसला अलग-अलग पेड़ों पर तान दिया. आंगन में न तो पेड़-पौधों की कमी थी और न ही तिनको की.

पूछने पर भाभी ने नाराजगी से बताया कि अब आधा दर्जन से अधिक घोसले हो गये है. हालांकि मुझे यह जानकर अच्छा लगा पर यह कहते हुये भाभी ने ऐसा मुंह बनाया जैसे कोई किसी चोर की शिकायत थानेदार से करता है. बात इतनी होती तब भी ठीक थी, भाभी ने तो पूरा घोसला कथा ही सुना डाली और यह भी बताया कि चिडिय़ों की गंदगी साफ करते-करते अब उनकी कमर भी दुखने लगी है.

भाभी के कमर में दर्द होने की बात जानकर मुझे
चिडिय़ों पर थोड़ा गुस्सा आया और मैंने सहानुभूतिपूर्ण निगाहों से भाभी की ओर देखते हुये कहा कि - '' यह तो बहुत गलत बात है, भला इन चिडिय़ों की बीट आप क्यों साफ करों?'' उन्होंने तपाक से कहा- '' तो क्या तुम साफ करने आओगे.'' पर मैं और भाभी दोनों ही जानते थे कि यह मैंने झूठ-मूठ ही कहा था, सच तो यह है कि मुझे चिडिय़ों से काफी लगाव है. 

अचानक ही मुझे बचपन के दिन याद आ गये. जब मामा गांव में पढ़ाई के दौरान चिडिय़ों की चोरी करने वाले एक एक शिकारीनुमा लडक़े से मेरा झगड़ा हो गया था और नौबत मारपीट तक की आ गई थी. अगर उस दिन मामाजी बीच में न आते तो पता नहीं हाथ में रखा पत्थर से उसका सिर ही फोड़ देता. खैर मामला शांत हो गया.

आज भी जब मैं मामा गांव जाता हूं तो लगता है कि पुराने पीपल की खोह से अब तोते निकलकर आसमान की सैर पर निकलने ही वाले है. पर अब तोते वहां है और न ही कोई और चिडिय़ा. एक बार तोतों के गायब होने के बारे में नानी ने बताया था कि दस-बारह साल पहले एक शिकारी ने वहां अपना अड्डा जमा लिया. कुछ तोते जाल में फंस गये और बाकी तोतों ने अपने पुरखों के आशियाने को हमेशा के लिये अलविदा कह दिया.

मैं सोचता हूं कि  नौकरीपेशा तबादला होने जब पर एक शहर से दूसरे शहर और एक मकान से दूसरे मकान कैसे जाते हैं और वहां कैसे उनका मन लगता है और चिडिय़ों का जब घोसला टूटता होगा तो उन्हें कैसा लगता होगा.

मेरा मन तो 12-15 सालों में भी शहर में नहीं लगा. आज भी बेर खाना, आम-अमरूद की चोरी, नदी के पानी में छलांग लगाना और तालाब में तैरते-तैरते दोस्तों के साथ अपनी आंख को रक्तिम कर लेने जैसे अनेक सुनहरी यादों से खुद का पीछा नहीं छुड़ा सका हूं. तभी तो मौका मिलते ही बगैर खर्च की परवाह किये गांव की ओर मोटरसाइकिल की हैंडिल घूमा देता हूं. गांव जाने में जितनी खुशी होती है उतनी ही तकलीफ गांव से वापस शहर आने में होती है, लगता है हमेशा के लिये लौट आउ शहर से.

मैं बता चुका हूं कि मुझे उस दिन शहर आने की बड़ी जल्दी थी और मैं जल्दी ही आना भी चाहता था ताकि समय पर आफिस पहुंचकर पेडिंग काम निपटा सकूं. एक कमरे में जाकर मैं कपड़े पहनने लगा. जब मैं बालों पर कंघी फेर रहा था तभी एक बार फिर चिडिय़ों की चहचहाहट ने मेरे ह्दय वीणा की स्वरलहरियों को झंकृत कर दिया. कंघी करना छोड़ मैं फिर चिडिय़ों और उनके द्वारा बड़े ही मेहनत से बनाये गये घोसलों को देखने लगा.

दो दिन तक गांव में रहने के दौरान सबसे ज्यादा मुझे चिडिय़ों और उनके घोसलों ने प्रभावित किया था. पता नहीं क्यों इन्हें देखकर मैं अपना सारा तनाव भूल जा रहा था. शहर की भागमभाग और रेलमपेल जीवन से घबराये मेरे मन को चिडिय़ों के समधुर संगीत ने जैसे स्थिर करने का कार्य किया था. चिडिय़ों के छोटे-छोटे बच्चे अपनी मां को आंगन में उड़ते देख रहे थे और मैं खुद को उनके परिवार का सदस्य समझने लगा. उस क्षण एक बार भी मुझे मेरे लैपटाप, मोबाइल या मोटरसाइकिल की याद नहीं आई. मेरा आफिस, सिनेमाहाल या खूबसूरत लड़कियों का  चेहरा भी ध्यान नहीं आया. दोस्त-यार की गपशप, पत्रकारिता या आलोक भैया और रामकुमार भैया के साथ अक्सर पी जाने वाली काफी हाउस की खुशबुदार दिव्य चाय भी विस्मृत हो गई.

घोसलों को देखते ही अनायास मैं चौंक उठा. उन घोसलों में एक घोसला केवल तिनके से नहीं बना था. तिनके मटमैले, सूखे हरे रंग के ही नहीं थे बल्कि घोसले के नीचे का हिस्सा किसी सफेद सामग्री से निर्मित था. मैंने सफेद घोसला कभी नहीं था इसलिए मेरा चौंकना स्वाभाविक था. पास जाकर देखने पर भाभी द्वारा चिडिय़ों के काफी शरारती होने की बात पर विश्वास हो गया. चिडिय़ों ने रूई की बाती का बड़ा हिस्सा अपने घोसले पर खर्च कर दिया था.

दरअसल भैया और पिताजी तीर्थ स्थान पर दीप प्रज्जवलित करने के लिये दो लाख बाती बना रहे है और इन दिनों उनका काम तीव्र गति से जारी है. दरअसल गर्मी का दिन होने के कारण खेती में कोई खास काम नहीं है और यजमान भी इक्का-दुक्का ही आते है. कम ही लोग गर्मी में सत्यनारायण कथा सुनने का साहस कर पाते हैं. ऐसे में कोई खास काम उनके पास नहीं है. घर में रोज ही दोपहर का खाना खाने के बाद बाती बनाने का काम शुरू हो जाता है. रुई से बाती बनाते हुये जब वे बोर हो जाते है या थक जाते है तो किसी आने-जाने वाले या आपस में ही गप्पें मारने लगते हैं और इसी बीच उनसे नजरें बचाकर चिडिय़ा बाती उड़ा लाते हैं जिनसे अपने घोसला निर्माण का अधूरा काम पूरा कर डालते है.

चिडिय़ों की इस हरकत का जिक्र मैंने किसी से नहीं किया, क्यों मुझे लगता था कि यदि यह बात भाभी-भैया या पिताजी का पता चल गई तो चिडिय़ों का यह रहना मुश्किल हो जायेगा. मैं क्यों भला चिडिय़ों को कोप का भाजन बनाता. और वैसे भी रुई की बाती पता नहीं कब तीर्थ जायेगी और कब जलेगी, अभी चिडिय़ों का आशियाना तो उससे बन जा रहा हैं और उन्हें खाने के लिये कीड़े-मकोड़े और रहने के लिये एक ब्राह्मण परिवार का घर मिल गया है, जहां उनके साथ खेलने के लिये चार साल की छोटी बच्ची भी है जो उन्हें रोटी के टुकड़े देना नहीं भूलती.

जिस कमरे में अनाज रखा है उसमें एक खिडक़ी भी है और उस खिडक़ी से बेधडक़ चिडिय़ों को अनाज के दाने  ले जाते भी मैंने देखा. मैंने इस बात का जिक्र भी किसी से नहीं किया. क्योंकि मैं इस बार अधिक दिनों के लिये गांव में छुट्टी बिताना चाहता हूं पर उन चिडिय़ों का वहां होना भी जरूरी है. यदि उनकी चोरी पकड़ी गई तो घोसला टूटते देर नहीं लगेगी.

आखिर हम मनुष्य जो ठहरे, हमें लगता है कि सारी धरती हमारी है पर हम भूल जात हैं कि यह धरती हमसे कहीं अधिक उनकी है जिसके कारण प्रकृति का संतुलन बना हुआ है और जिनके कारण  धरती की उर्वराशक्ति बनी हुई है. फसल चट करने वाले कीड़ों को खाकर उन्हें खत्म करने वाली चिडिय़ा यदि कुछ दिन या हमेशा घर-आंगन, बाड़ी, खेत-खलिहान के हिस्से पर अपने से घोसला बनाकर अपना परिवार बसाना चाहे, रहना चाहे तो क्या उन्हें इतना भी अधिकार नहीं है. मानवता का अर्थ मनुष्य मात्र के प्रति अपना धर्म निभाना नहीं बल्कि हमें संपूर्ण प्राणियों के प्रति सद्भावना रखने की सीख दी जाती है. 


जैव विविधता बोर्ड की प्रतिभा सिंह कहती हैं कि ‘आजकल केमिकल्स और कीटनाशक दवाओं के बढते प्रयोग और प्रदूषण भी प्रभाव डाल रहे हैं.’’

कई अन्य जानकार लोग कहते हैं कि गौरैया चिड़िया बहुत संवेदनशील पक्षी हैं और मोबाइल फोन तथा उनके टावर्स से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन से भी उसकी आबादी पर असर पड़ रहा है.

आज इतना ही.
-सुनील  शर्मा 

1 टिप्पणी:

  1. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए आपका आभार. आपका ब्लॉग दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर हो, आपकी लेखन विधा प्रशंसनीय है. आप हमारे ब्लॉग पर भी अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "अनुसरण कर्ता" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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