गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

छत्तीसगढ़ में बैगा महिलाओं की नसबंदी...!

सुनील शर्मा 
 सुकरिया ने गरीबी के कारण कराई नसबंदी
छत्तीसगढ़ में बैगा आदिवासियों की नसबंदी के चौंकाने वाले मामले सामने आये है. राज्य में प्रतिबंध के बाद भी बैगा आदिवासियों की नसबंदी हो रही है और यह प्रतिबंधित कार्य सरकारी महकमे के शासकीय शिविरों और स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहा है.

गरीबी और अशिक्षा के जाल में जकड़े और विकास में पिछड़े अधिकांश बैगा परिवार नहीं जानते कि उनके लिए नसबंदी प्रतिबंधित है लेकिन स्वास्थ्य विभाग, जिसे इस संबंध में स्पष्ट निर्देश हैं,वह जान—समझकर इस पर रोक नहीं लगा रहा है.

बैगाओं की घटती जनसंख्या के कारण केंद्र सरकार ने 90 के दशक में एक आदेश के तहत छत्तीसगढ़ की पांच संरक्षित जनजातियों बैगा अबुझमाड़िया, बिरहोर, पहाड़ी कोरवा और कमार की नसबंदी को प्रतिबंधित कर दिया है.लेकिन इस प्रतिबंध का कोई भी असर नहीं हुआ है.

हाल ही में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर,कबीरधाम और नवगठित मुंगेली जिले में ऐसे कई मामले प्रकाश में आये हैं,जिसमें जान बूझकर बैगा महिलाओं की नसंबदी करा दी गई है. सरकारी अमले का है कि नवंबर 2011 में एक मामला मिलने के बाद इस पर पूरी तरह से कड़ाई बरती जा रही है .इसके बाद किसी भी बैगा की नसबंदी नहीं हुई है. मुंगेली के कलेक्टर त्रिलोक महावर का कहना है कि जब से मुंगेली जिला बना है, उनकी जानकारी में एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया है. लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है.

बैगा बहुल लोरमी के खंड चिकिस्ता अधिकारी डाक्टर सीएम पाटले बताते हैं कि पिछले कई वर्षों से सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में बैगा आदिवासियों की नसबंदी होती रही है लेकिन उनके आने के बाद ऐसा नहीं हो रहा है. श्री पाटले का कहना है कि नवंबर 2011 में मेरे चार्ज लेने के दूसरे ही दिन एक बैगा महिला की नसबंदी का मामला आया था लेकिन उसके बाद मैंने इस पूरी तरह रोक लगा दी है. इस संबंध में सभी को सख्त हिदायत भी दी गई है.

काहे का प्रतिबंध
 एक महीने पहले नसबंदी कराने वाली कमला बैगा.
डा. पाटले भले ही दावा कर रहे हैं कि अब किसी भी बैगा की नसबंदी नहीं हो रही है लेकिन सूदूरवर्ती गांवों में घूमने के बाद यह दावा खोखला साबित हो जाता है.मुंगेली जिले की डूड़वाडोंगरी की सुकरिया बैगा ने पिछले महीने इलाके की कुछ महिलाओं के साथ डिंडौरी जिले के गोरखपुर स्वास्थ्य केंद्र में नसबंदी कराई है.

सुकरिया कहती है—''पहले वह नसबंदी के लिए लोरमी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गई थी लेकिन जब वहां मना कर दिया गया तो वह फगनी और अन्य महिलाओं के साथ गोरखपुर चली गई. वहां आपरेशन के बाद एक हजार रुपए मिले और वहां खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम भी था.सुकरिया के पति बनिया बताते हैं कि उनकी पत्नी स्वास्थ्य विभाग की गाड़ी से गई थी.वहां से उन्हें लेने के लिए सूरजभान नामक आदमी भी आया था जो स्वास्थ्य कार्यकर्ता का पति है.

थोड़ी और पूछताछ करने पर पता चला कि सूरजभान अपनी स्वास्थ्य कार्यकर्ता पत्नी का लक्ष्य पूरा करने के लिए डूड़वाडोंगरी की फगनी के साथ मिलकर बैगा महिलाओं को नसबंदी के लिए मध्यप्रद्रेश के डिंडौरी जिले ले जाता है फगनी बैगा ने दस साल पहले नसबंदी कराई थी और तब से वह जैसे नसबंदी कराने वाली बैगा महिलाओं की आदर्श बन गई है.

किसी भी नसबंदी करानी हो तो वह फगनी से संपर्क करती है और फगनी खुद भी ऐसे महिलाओं की खोज करती है.फगनी बताती है कि उसके पति संचू बैगा ने उसे चेतावनी दी थी कि वह यदि नसबंदी नहीं कराएगी तो वह उसे छोड़ देगा. रिश्ता टूटने के डर से उसने नसबंदी कराई.

फगनी बताती है कि नसबंदी कराने वाली महिलाओं को बतौर प्रोत्साहन राशि 600 रुपए और उन्हें प्रोत्साहित करने वाले को 150 रुपए तो मध्यप्रदेश हितग्राही महिला को एक हजार और प्रोत्साहित करने वाले को चार सौ रुपए प्राप्त होते हैं.

महिलाओं को नसबंदी के लिए प्रेरित करती है फगनी बैगा.
फगनी कहती है कि बैगा परिवार बेहद गरीब है. अशिक्षा के कारण परिवार में बच्चों की संख्या बढ़ती जाती है लेकिन जब वे बड़े होते हैं तो उनके पालन-पोषण की समस्या होती है.इसलिए अधिकतर परिवार नसबंदी कराना चाहते हैं ताकि कम बच्चों का पालन-पोषण अच्छे से हो सके.

पिछले महीने मार्च में फगनी के साथ मंजूरहा की कमला पति जगतराम बैगा, शांति बैगा पति चैन सिंह बैगा, किसानीन पति पनका बैगा, बिराजो पति मेहतर बैगा और डूड़वाडोंगरी की लमिया पति विश्राम बैगा और सुकरिया पति बनिया बैगा और चकदा की कुंती बाई पति जेठू राम बैगा और मंगली पति लमतू बैगा मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के गोरखपुर नसबंदी कराने गये थे. इन सभी ने गरीबी को प्रमुख वजह बताया है.

डुड़वाडोंगरी की उजियारो पति बैसाखू बैगा और मंजूरहा की बयन पति बाबूलाल बैगा ने पिछले साल लोरमी में नसबंदी करवाई थी.बयन कहती है कि सरकार ने नसबंदी पर तो प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन हमारे विकास की उसे चिंता नहीं है. बच्चे पैदा तो हो जाएंगे लेकिन उनका पालन-पोषण नहीं हो सकता.

मंजूरहा गांव की कमला बैगा के तीन बच्चे पहले से ही हैं. जब चौंथा बच्चा पैदा हुआ तो घर की हालत देखते हुये उन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही नसबंदी का ऑपरेशन करा लिया. कमला बैगा कहती हैं- “बैगाओं की नसबंदी पर रोक का हमें पता है लेकिन नसबंदी न करायें तो इतने बड़े परिवार को पालना संभव नहीं है.”

यह रिपोर्ट 5 अप्रैल 2012 को दैनिक छत्तीसगढ़ के मुख्य पृष्ठ पर बतौर बैनर प्रकाशित हो चुकी है .

मंगलवार, 20 मार्च 2012

विस्थापितों के साथ धोखा हुआ है


अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघों को बचाने के नाम पर वहां सैकड़ों सालों से रहने वाले बैगा आदिवासियों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों को हटाने के नाम पर पिछले 2 सालों में तमाम नियम कायदे और कानून को ताक पर रख कर वन विभाग का जो जंगल राज चल रहा है, उसने इन बैगा आदिवासियों के सामने जीवन-मरन का प्रश्न पैदा कर दिया है. पुनर्वास के नाम पर वन विभाग ने बैगा आदिवासियों की जिंदगी जानवरों-सी कर दी है.इस पूरे मामले पर सुनील शर्मा
ने एक लंबी रिपोर्ट लिखी है जो पहले ही दो किस्तों में छप चुकी है...पेश है तीसरी किस्त... 

वन विभाग के अफसर ही क्यों, विभाग के मंत्री भी यहां का दौरा कर चुके हैं और उन्हें विस्थापन की तारीफ करते हुए इसे देश का सबसे अच्छा विस्थापन बताया था लेकिन जल्दा के चमरू का तो कुछ और ही कहना है-'' उसेंडी सर जब आये थे तो उन्होंने अधूरे काम पूरे कराने का वादा किया था लेकिन आज तक गांव में स्कूल भवन, अस्पताल, आंगनबाड़ी केंद्र नहीं बना. उन्होंने हल के लिए भैंसा देने की बात कहीं थी. भैसा की जगह पड़वा दिया गया, जो हल खींचने के योग्य नहीं था और उसमें से एक पड़वा तो कुछ ही दिनों बाद मर भी गया. तीन हजार में जमीन की ट्रेक्टर से जुताई करवाई पर अनाज भी उतना नहीं हुआ कि उसे परिवार का एक सदस्य भी साल भर खा सके. हमारे साथ धोखा हुआ है.''

इस गांव में समस्याओं का अंबार लगा है. इतवारी कुछ समझदारी की बातें करते हैं. वे कहते हैं-'' वैसे तो यहां कई परेशानियां है लेकिन अगर कोई दूर ही नहीं करना चाहे तो वह कैसे दूर होगी.” 

वन विभाग के अफसरों की पोल खोलते हुए वे कहते हैं कि यहां आरक्षित भूमि को खेती की जमीन बताकर ग्रामीणों को दिया गया है और खेत क्या वह जमीन के कुछ टुकड़े हैं जिसमें पेड़ और पत्थर है. गांव के सभी 74 परिवारों को भैसा जोड़ी मिलना था लेकिन 24  को आज तक नहीं मिला, जिन्हें मिला उन्हें भैंसा की जगह पड़वा दिया जिनमें से कइयों की मौत हो चुकी हैं. विस्थापितों ने मामले की शिकायत एसपी से की है लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

 गांव के मुखिया मरहूराम बताते हैं-''हमारे इलाके के रेंजर वर्मा जी को सब मालूम हैं. हमें तो ठगा गया है. भला दस लाख रुपए जैसा हुआ क्या है.'' वह बोलते-बोलते भावुक हो जाते हैं- ''हम अपने पुराने गांव से अपना देवी-देवता भी तो नहीं ला पाये हैं, उनका आशीर्वाद अब हमारे साथ नहीं है...शायद यही कारण है कि हमें ये दिन देखने पड़ रहे हैं. हमारे पास अब न हमारे देवता है और न पूजा स्थल है. देवताओं का प्रकोप हमें चैन से रहने नहीं दे रहा है.''

तीन में न तेरह में
राजीव गांधी जलाशय (खुड़िया) जाने वाले मार्ग पर दायीं तरफ कारी डोंगरी के ठीक पहले कभी जंगल हुआ करता था. यहां के पंद्रह हजार से भी अधिक पेड़ों को काटकर अचानकमार बाघ परियोजना से विस्थापित किये गये तीन गांवों बांकल, बोकराकछार और सांभरधसान को बसाया गया. 

विस्थापन के दो साल बाद भी ग्रामीण यहां खुद को नया महसूस करते हैं. इलाके के पुराने वाशिंदे उन्हें तवज्जो भी नहीं देते, उल्टा वे मानते हैं कि इन नये आगंतुकों के कारण उनके ग्राम पंचायत को मिलने वाली सुविधायें अब बांटनी पड़ रही है. संकट ये भी है कि इन आदिवासियों की बोली और रहन-सहन इन गांव वालों से बिल्कुल अलग है. 

सांभरधसान में 17 परिवार हैं. यहां के सेवाराम बैगा को भी पांच एकड़ जमीन कृषि भूमि बताकर दी गई है. पर वे बताते हैं -''मेरी क्या इस गांव में किसी की जमीन भी समतल नहीं है. उबड़-खाबड़ है, बीच में बड़े-बड़े पेड़ है और जमीन ऐसी है कि कितनी भी बारिश हो, पानी नहीं रूकता. ऐसे में फसल की अच्छी पैदावार होने का तो सवाल ही नहीं है. धान का पौधा सही रूप से विकसित नहीं हो पाता.''

बांकल के तीस परिवारों को विस्थापित किया जाना था लेकिन वहां 29 परिवारों को ही बसाया गया है. एक भवन जो कि हितग्राही को दिया जाना था, वहां वर्तमान में स्कूल संचालित है. इस गांव में भी सिंचाई, स्कूल भवन, स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी, बिजली जैसी अन्य सुविधाएं नहीं हैं. आदिवासी परेशान हैं और अपने पुराने गांव को छोड़कर नई जगह पर विस्थापित होने का दर्द उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देता है.

बांकल की सुंदरिया सत्तर साल की हैं और उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें इस बुढ़ापे में एक नई जगह पर आकर रहना होगा. लड़खड़ाती जुबान से वह कहती हैं-'' बने ता हावन साहब फेर इहा मन नइ लागय. कई झन तो इहा ले कमाय-खाय बर दिल्ली-आगरा कोती जावत हे त कई झन घलो जाये के सोचथे...मोर तो बुध सिरा गये हे...सरकारो ह तो घलो जेन कहे रहिसे ओला पूरा नई करिच...खेत म पथरा हे, रूख-राई हे, धान उपजय नहीं त काला खाबो...अइसन में का करी कुछ बुता-काम तो घलो नइ हे इहा.''  अपने जवाब में अनपढ़ सुंदरिया खुद ही कई सवाल खड़े करती हैं. पर उनके सवाल पेड़-पौधों से टकराकर वापस आ जाते हैं. 

बांकल में बैगा परिवारों के साथ गोड़ आदिवासी भी विस्थापित किये गये हैं. इन्हीं में से एक परिवार हैं रमेश का. रमेश को पिछले साल 25 बोरी धान यानी सात क्विंटल धान मिला था जिसकी कीमत पांच हजार छह सौ रुपए थी और पांच हजार रुपए खेती में खर्च हो गये. इस तरह जी-जान से परिवार सहित खेती करने के एवज में उन्हें मिले महज छह सौ रुपए...वह इसका क्या करें. इस साल भी खेती का बुरा हाल है. रमेश बताते हैं-''इस बार तो पिछली बार से भी कम धान होगा.'' रमेश के पास बीपीएल का कार्ड भी नहीं है, लिहाजा 35 किलो चावल भी नहीं मिलते. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि बाल-बच्चों को वे क्या खिलाएंगे ?

जीवन में पहली बार पलायन 
बांकल में भी जल्दा, बहाउड़, सांभरधसान, कूबा और बोकराकछार की तरह ही रोजगार की समस्या है. जिसके परिणामस्वरूप पलायन जैसी समस्या सामने आ रही है. यह पहला अवसर है, जब इस गांव के आदिवासी दिल्ली और आगरा जैसे शहरों में कमाने-खाने के लिए गये हैं. छत्तीसगढ़ में पलायन की समस्या कोई नई नहीं है लेकिन यह वन्यक्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों के लिए एकदम नया है.

मानसिंह के साथ पूरा गांव ही बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा हैं.मानसिंह बताते हैं कि-''अच्छी बारिश होने के बाद भी इस साल अनाज पिछले साल की तुलना में कम मिला. कारण है खेती की जमीन का सही न होना. हमारे सामने बेरोजगारी की समस्या है. अगर हम काम नहीं करेंगे तो हमारे बच्चे भूखों मर जायेंगे.''
गांव के अन्य ग्रामीणों की तरह वे भी मजदूरी करने आगरा या दिल्ली जाना चाहते हैं ताकि वे अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकें. गांव के पंद्रह से अधिक लोग दिल्ली-आगरा कमाने-खाने चले गये हैं और कई दूसरे लोग भी जाने की इच्छा रखते हैं. इस गांव की सूनी गलियां और घरों में लगे ताले मानसिंह की बातों की गवाही देते हैं.
रमेश बताते हैं कि बांकल के 29 परिवार से 14 लोग पलायन कर चुके हैं.दरवाजा के एक ठेकेदार के द्वारा अच्छी मजदूरी दिलाने का वायदा करने के बाद रामकुमार, रामनाथ, रामप्रसाद, रामस्वरूप, समलिया, शिवकुमार, शिवचरण, हीरा ,शिवप्रसाद,  अररूत, मालिकराम, अशोक और लमतू आगरा और दिल्ली चले गये हैं.सांभरधसान का श्यामलाल भी उनके साथ गया हैं. ये सभी बैगा हैं. इन्हें गये एक महीना हो गया है.
जहां एक ओर बांकल और सांभरधसान के बैगा आदिवासी आगरा और दिल्ली जैसे शहरों में विस्थापन से उभरी पीड़ा के बाद पलायन का दुख झेल रहे हैं, वहीं बोकराकछार के आदिवासी पहाड़ियों पर बांस काटते हुए परिवार के लिए रोजी-रोटी का इंतजाम कर रहे हैं. कभी-कभी तो वे अपने परिवार से पंद्रह-बीस दिन भी अलग रहते हैं और इस बीच घर की सारी जिम्मेदारी महिलाओं के जिम्में होती है.

बोकराकछार के आदिवासियों को बांस कटाई के दौरान जंगल में ही झोपड़ियां बनाकर रहना होता हैं और दिल्ली-आगरा पलायन करने वालों को भी रातें झुग्गियों में काटनी पड़ रही हैं. ऐसे में कथित रूप से उनके लिए तीन लाख तैंतीस हजार रुपए की लागत से बनाये गये पक्के मकान का क्या औचित्य है. उनके हिस्से तो अभी भी झोपड़ियां ही हैं. 

आदिवासियों की विवशता भरे जीवन में विस्थापन के बाद उभरी पलायन की पीड़ा एकदम नई है और ये उनके उपर थोपी गई है. ये दुख उनके हिस्से नहीं था पर अब वे इस परेशानी से दो-चार हो रहे हैं. बोकराकछार के बसोर बैगा अपना परिवार छोड़कर दिल्ली-आगरा नहीं जाना चाहते क्योंकि उन्हें डर हैं कि कहीं वहां वे भूखों न मर जाये.
वे कहते हैं-''यहां वे किसी तरह रोजी-मजदूरी करके अपना जीवन काट लेंगे लेकिन वहां गये और काम नहीं मिला तो वहां से वह लौट भी नहीं पायेंगे, क्योंकि पढ़-लिखे तो हैं नहीं.साहब दोगुना मजदूरी मिलेगा कहकर ठेकेदार यहां से ले जा रहा है लेकिन यदि नहीं मिला तो हम तो वहां बेमौत मर जायेंगे.''

हालांकि बसोर इस बात को भी स्वीकारते हैं कि यहां भी वे सुखी नहीं रह सकते, क्योंकि खेतों में धान की जगह मायूसी उपज रही है. वे कहते हैं-'' पांच एकड़ में धान की बोनी किया और बीजहा भी वापस नहीं हो रहा है तो ऐसे में तो भूखों मरना ही है. वन विभाग के अफसरों ने कहा था कि वे पांच साल तक उनका ख्याल रखेंगे. उनके बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य का इंतजाम करेंगे लेकिन वे तो आते तक नहीं. उन्होंने हमें छोड़ दिया.'' 

राजीव गांधी जलाशय के पास खुड़िया ग्राम से दो किलोमीटर दूर सुरही जाने वाले मार्ग पर बसाये गये बहाउड़ का हाल तो इन गांवों से भी बुरा है. यहां 66 परिवारों को बसाया गया है. जंगलों के बीच बना इनका आशियाना जितना खूबसूरत दिखाई देता है, वैसा अंदर से है नहीं.

दुखीराम अपने नाम की तरह ही यहां दुखी है और उनकी उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी तब फिर गया जब पांच एकड़ की जमीन में से केवल दो एकड़ में ही वे कृषि कार्य कर पाये और शेष में पैरा भी नहीं हुआ. 
ठुकुर बैगा इस गांव के बुर्जुग है और लोग उनकी बड़ी इज्जत करते हैं. उन्होंने अपने जीवन में कई कष्ट झेले हैं और अब उनकी भी हिम्मत उम्र के साथ ही जवाब दे रही है. वे बहाउड़ के साथ ही बोकराकछार, बांकल, सांभरधसान, कूबा और जल्दा के ग्रामीणों के संपर्क में हैं और कभी-कभार वहां आते-जाते रहते हैं. वे आदिवासियों के पलायन को दुखद बताते हैं.

वे कहते हैं-''साहब सत्तर साल की उम्र हो गई, कभी हम बाहर कमाने-खाने नहीं गये. अब हमारे ही बिरादरी के लोग बाहर जा रहे हैं. दोगुना मजदूरी मिलेगा कहकर कोई बाल-बच्चों के साथ तो कोई यहां छोड़कर पलायन कर रहे हैं. यह अच्छी बात नहीं है. यह हमारे लिए एकदम नया है और यह अच्छा संकेत नहीं है.

हमारे बुजुर्ग कहते थे कि कभी अपनी मिट्टी को छोड़कर किसी के बहकावे में कभी मत जाना, भले ही वहां सोना-चांदी ही क्यों न मिले लेकिन आजकल के बच्चों को कौन समझाये और उन्हें समझाए भी तो कैसे ? समझाने पर वे उल्टे पूछते हैं-हमारा परिवार पालोगे...क्या करें जुबान बंद हो जाती है...पता नहीं बहाउड़ वाले कब तक उनकी बात सुनते हैं...उसके बाद तो बूढ़ादेव ही जाने क्या होगा ?”

शनिवार, 21 जनवरी 2012

विस्थापन के नाम पर वन विभाग का जंगल राज


अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघों को बचाने के नाम पर वहां सैकड़ों सालों से रहने वाले बैगा आदिवासियों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों को हटाने के नाम पर पिछले 2 सालों में तमाम नियम कायदे और कानून को ताक पर रख कर वन विभाग का जो जंगल राज चल रहा है, उसने इन बैगा आदिवासियों के सामने जीवन-मरन का प्रश्न पैदा कर दिया है. पुनर्वास के नाम पर वन विभाग ने बैगा आदिवासियों की जिंदगी जानवरों-सी कर दी है. नेशनल फाउंडेशन फार इंडिया के फेलोशिप के तहत सुनील शर्मा ने विस्तार से विस्थापन के इस मुद्दे पर लिखा है.पेश है दूसरी किस्त:—

सुनील शर्मा, बिलासपुर

विस्थापितों की रकम कहां गई?

सबसे बड़ा छल तो यह हुआ कि विस्थापित किये गये आदिवासियों को कभी भी पुर्नवास की नीतियों के बारे में नहीं बताया गया. सच तो यह है कि विस्थापन के लिये वन विभाग के अधिकारियों ने अपनी ही पुनर्वास नीति को ताक पर रख दिया.

टाईगर रिजर्व में विस्थापन को लेकर वन विभाग की नीति कहती है कि विस्थापित होने वाले आदिवासियों को दो में से किसी एक तरीके से पुनर्वास का लाभ दिया जाये. पहला तो यह कि प्रत्येक विस्थापित परिवार को बैंक खाता खुलवा कर 10-10 लाख रुपये दे दिये जायें और दूसरा ये कि इसी दस लाख रुपये से उनके लिये मकान-जमीन की व्यवस्था की जाये. पुनर्वास के इस दूसरे तरीके में प्रत्येक परिवार को पचास हजार रुपए नगद, पक्का मकान, पांच एकड़ कृषि भूमि, सड़क, बिजली, सिंचाई की सुविधा, तालाब, ट्यूबवेल, पेयजल, अस्पताल, सामुदायिक भवन, आंगनबाड़ी, पूजा स्थल, श्मशानघाट सहित अन्य जरूरी सुविधाओं का इंतजाम विस्थापितों के लिए करना था.
नियमानुसार 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी युवाओं को एक स्वतंत्र परिवार की मान्यता देते हुये उन्हें पुनर्वास का लाभ दिया जाना था. लेकिन वन विभाग ने ऐसा नहीं किया. सवाल यही उठता है कि ऐसे युवाओं के लिये आयी 10-10 लाख रुपये की रकम कहां गई ? यह सवाल पूछने पर वन विभाग के अफसर कागजों को देखने के बाद ही स्थिति बताने का रटा-रटाया जवाब देते हैं.

जाहिर है, सारे नियम-कायदों को दरकिनार करते हुए बगैर ग्रामीणों के पुर्नवास की व्यवस्था किये वन विभाग ने उन्हें रातोंरात गाड़ियों में भरकर उनके सामान के साथ लाकर नई जगह पर छोड़ दिया. अभी उनके लिए मकान बनने की शुरूआत भी नहीं हुई थी. न खेत बने थे और न सड़क, न बिजली का ही इंतजाम था.

पानी की उपलब्धता के कारण तालाब के किनारे आदिवासी छाला झोपड़ी बनाकर रहने लगे और  इस तरह अपनी जमीन से बेदखल हुए  आदिवासियों के नये और अनोखे त्रासदीपूर्ण जीवन का आगाज हुआ.

तालाब के किनारे मौसमी बीमारियों और मच्छर से तो वे किसी तरह अपनी जान बचाते रहे लेकिन अपनी मिट्टी से अलग होने का दर्द उनकी आंखों में रह-रहकर उभरने लगा. उनमें से कुछ तो पुर्नवास स्थल को छोड़कर अपने मूल गांव भी गये पर वहां पहरा होने के कारण उनका पहले की तरह निवास संभव नहीं था. जो गये उन्हें खदेड़ दिया गया और अपमानित आदिवासी एक बार फिर झोपड़ियों में दिन गुजारने लगे.
चूंकि उनके लिए बनाये जा रहे मकान ठेकेदार द्वारा बनाये जा रहे थे इसलिए उन्हें भवन निर्माण में काम नहीं मिल रहा था, क्योंकि ठेकेदार अपने लोगों को मजदूरी पर रख रहा था. वन विभाग ने इन आदिवासियों को पेड़ काटने, मार्ग बनाने, तालाब बनाने जैसे काम करवाये पर ऐसा रोजगार पाने वाले आदिवासियों की संख्या कम ही है.

वन विभाग का दावा है कि प्रत्येक परिवार को रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत एक लाख रुपए का भुगतान किया गया है. लेकिन वन विभाग का यह आंकड़ा अपनी कहानी खुद कह देता है. अगर इन आदिवासियों को एक लाख रुपये का भुगतान किया जाता है तो 249 परिवारों के हिसाब से यह रकम दो करोड़ 49 लाख रुपए हो जाती है. लेकिन आदिवासियों के जॉब कार्ड में इतनी रकम कहीं नजर नहीं आती.

इति विस्थापन कथा

अचानकमार टाईगर रिजर्व से विस्थापित 249 परिवार लगातार पांच महीने तक इसी तरह अपना जीवन झोपड़ियों में व्यतीत करते रहे और उधर वन विभाग के अफसर मनमानीपूर्ण रवैया अपनाते हुए अपने हिसाब से उनके मकान बनवाते रहे. मकानों में घटिया और गुणवत्ताहीन सामग्री का इस्तेमाल किया गया, जो कैमरे पर रिकार्ड है.
भ्रष्टाचार की सारी सीमायें लांघते हुए मकानसड़क, पहुंच मार्ग, खेती के जमीन का समतलीकरण, मेड़ निर्माण और तालाबों का निर्माण होता रहा. किसी तरह उक्त निर्माण कार्य पूर्ण हुआ और विस्थापितों को उनका घर और खेती के लिए जमीन सौंप दी गई.

यहां यह बताना लाजिमी है कि जिन छह गांवों का विस्थापन किया गया, उसमें जल्दा के ग्रामीणों को कोटा लोरमी मार्ग में जूनापारा, कठमुड़ा के पास, कूबा को मरवाही वनमंडल के आमाडोब के पास तो बांकल, बोकराकछार, सांभरधसान को लोरमी ब्लाक के अंतर्गत ग्राम दरवाजा के पास बसाया गया, जो कि खुड़िया यानी राजीव गांधी जलाशय जाने वाले मार्ग पर स्थित है. बहाउड़ के ग्रामीणों को ग्राम खुड़िया के अंतर्गत खुड़िया से जंगल के रास्ते छपरवा जाने वाले मार्ग पर बसाया गया.

मकान और खेती के लिए जमीन मिलने पर ग्रामीणों ने राहत ली और पांच महीने की दुख-तकलीफ को वे भूल गये पर यहां भी परेशानियों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. विस्थापित करने से पहले वन विभागों द्वारा उनको किया गया वादा सब्जबाग साबित होने लगा. खेती-किसानी के दिनों में जब ग्रामीणों ने अपनी जमीन देखी तो वहां न सिंचाई की सुविधा थी और न ही हल के लिए बैल मिले. खेती की जमीन का इतनी उबड़-खाबड़ थी कि उसमें चलना भी मुश्किल था, ऐसे में उसमें पानी रुकने और खेती होने की उम्मीद ही नहीं थी.

शिकायत करने पर कुछ ग्रामीणों की जमीन को ट्रेक्टर से जुतवाया गया जबकि बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने खुद से ही पैसे देकर ट्रेक्टर जमीन जुतवाई. नि:शुल्क रासायनिक खाद का वितरण भी हुआ पर उसका लाभ भी कइयों को नहीं मिला. किसी तरह खेती शुरू हुई पर बारिश ने दगा दिया. खेती से उतना अनाज भी नहीं हुआ कि परिवार का एक आदमी उसे साल भर पकाकर खा सके. उन्हें पीडीएस का चावल नहीं मिलता तो उनके सामने भूखे मरने की नौबत आ जाती.
ग्रामीणों के यहां आने के  पहले दिन से ही शिक्षा और स्वास्थ्य का बुरा हाल रहा. आंगनबाड़ी,स्कूल,सामुदायिक भवन नहीं बने और न मंदिर न श्मशानघाट.

इन गांवों में आज भी उचित मूल्य की दुकान नहीं है और उन्हें बीपीएल का चावल लेने दूसरे गांव जाना पड़ता है. नये बने मकानों का हाल यह है कि पहली बरसात में ही छत के रास्ते से पानी कमरे के भीतर आने लगा.
वन विभाग के दावे के उलट इन 6 में से किसी भी गांव में अस्पताल नहीं है तो डाक्टर या नर्स के होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता लिहाजा ये अपनी बीमारियों का झोला छाप डाक्टर से इलाज कराने मजबूर है.

इसी तरह बिजली के तार तो है पर उनमें करंट नहीं है. लिहाजा रात का अंधेरा अभी भी उनके पुराने गांव की तरह ही अभी उनका पुराना साथी है. हां यदि कोई मंत्री या बाहर का बड़ा अधिकारी गांव का निरीक्षण करने आता है तो जरूर इनमें करंट दौड़ने लगता है.
विस्थापित सभी गांव पानी की समस्या से भी जूझ रहे है. पेयजल की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. हैंडपंप तो खुदवाये गये हैं लेकिन अधिकतर हमेशा बिगड़ी हालत में ही रहते हैं. इनके बच्चों के बदन पर आज भी चिथड़े दिखते हैं और साफ-सफाई से कोसों दूर होने के कारण ये बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं. विस्थापन के बाद इनके खातों में जमा कराया गया रुपया प्रति परिवार 50 हजार कब का खत्म हो गया है और अब इनके पास रोजगार का कोई इंतजाम नहीं है. 

नई जगह होने के कारण इन्हें कोई काम नहीं देना चाहता, वहीं महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में भी इन्हें काम नहीं मिल रहा है. शिक्षा का हाल यह है कि गांव के ही किसी के घर में स्कूल संचालित है, जिसमें गिनती के बच्चे क,,,घ रट रहे हैं और आने वाले संकट से बिल्कुल अनजान है.
यहां आकर कुछ बच्चों का जन्म जरूर हुआ है पर जो पुराने गांव में पैदा हुए है उनके लिए ये नया गांव ऐसा लग रहा है जैसे वे किसी और के घर में कुछ दिन रुकने के लिए आये हैं. नई जगह से न बड़े जुड़ाव महसूस कर पा रहे हैं और न बच्चे. ऐसे में विस्थापितों का जीवन अधर में दिखाई देता है.

जल्दा गांव के मरहूराम की उम्र करीबन 55 साल हैं. वे गांव के मुखिया हैं और वे अपने गांव वालों की दुर्दशा पर अफसोस जताते हुए कहते हैं -''दो डिस्मिल में पक्के का मकान, पांच डिस्मिल में बाड़ी, पांच एकड़ खेती की जमीन, सिंचाई की सुविधा, बिजली, पेयजल, स्कूल, टेलीफोन, धार्मिक पूजा स्थल, श्मशानघाट, तालाब, सड़क, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उचित मूल्य की दुकान, आंगनबाड़ी केंद्र और कई अन्य सुविधाओं को देने की बात कहकर यहां लाया गया लेकिन दो साल बाद भी हमें ये सुविधाएं नहीं मिलीं. अगर कोई हमारे खेत और मकान ले लेगा तो हम उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि हमारे पास तो जमीन और मकान का पट्टा भी नहीं है.

उल्लेखनीय है कि मरहूराम के गांव में ही पिछले साल मंगलू बैगा की मौत भूख के कारण हुई थी, जो अखबार की सुर्खियां तो बनी लेकिन आदिवासियों की आवाज अनसूनी रह गई. गांव के सरहू और धान बाई ने तो ईलाज के अभाव में दम तोड़ दिया. मरहूराम को इनकी मृत्यु का गहरा अफसोस है. गांव का मुखिया होने के नाते ग्रामीण उनसे बड़ी उम्मीदें रखते हैं लेकिन वह उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहें है. बकौल मरहूराम, अब उन्हें अपने मुखिया होने पर भी शर्म महसूस होने लगी है.
जल्दा गांव के विस्थापन के लिए सात करोड़ चालीस लाख रुपए मिले थे, जिसमें सभी 74 परिवारों को पचास-पचास हजार रुपए प्रोत्साहन राशि के रूप में मिले और शेष राशि सात करोड़ तीन लाख रुपए से पुर्नवास करने का दावा वन विभाग के अफसर करते हैं लेकिन साल भर के भीतर ही दीवारों पर आई दरार और बारिश में छतों से रिसकर मकान के भीतर पहुंचने वाले पानी की हर बूंद भ्रष्टाचार की दुहाई देता है.

इस गांव को 370 एकड़ कृषि भूमि देने का दावा विभाग के अफसर करते है लेकिन इस कृषि भूमि की हालत पर गांव के नौजवान वीर सिंह कहते हैं-''एक तो जंगल की जमीन हमें खेती करने दी गई है, उपर से खेत समतल नहीं होने के कारण इसमें अनाज नहीं उपजता. सिंचाई की सुविधा भी नहीं है और बिजली नहीं होने के कारण हमारे घरों में अंधेरा रहता है. बिजली की बात करने पर ठेकेदार पैसे मांगता है. हमारे पास तो पैसे नहीं है हम क्या करें ?''

होली राम को नई जगह से काफी उम्मीदें थी लेकिन किस तरह उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया, वे खुद ही बताते हैं- '' पुराने गांव में हमारे पास खेती की थोड़ी-सी जमीन थी, जिसमें हम मकई उपजाते थे. यहां आने पर हमें पांच एकड़ खेती की जमीन मिलने की उम्मीद थी और अधिकारियों ने कहा था कि वे आने वाले चार सालों तक उनकी जमीन को समतल करायेंगे. दूसरे साल ही नहीं आये तो अब शेष दो सालों का क्या भरोसा. साहब लोगों ने अस्पताल खोलने की बात कहीं थी, आज तक नहीं खुली.''

(एनएफआई की मीडिया फेलोशीप के तहत किये जा रहे अध्ययन का हिस्सा)