शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

जिंदगी के पन्ने


- सुनील  शर्मा 

जिंदगी  के कुछ पन्ने

मुड़े हुये होते हैं.

पर सच तो यह भी है कि

ये मुडक़र भी आपस में

जुड़े हुये होते हैं.


कुछ पन्नों पर कुछ लिखा होता है,

तो कुछ पन्ने कोरे ही रह जाते हैं.

पन्नों पर लिखकर उसे मिटाना

या उस पर लिखे हुये को छिपाना

21 वीं सदी में आसान हो गया है.


पर इस सदी में भी

जीवन के पन्नों पर लिखे को

मिटाना मुश्किल है.

मेरे जीवन के पन्नों पर भी काफी कुछ लिखा है

कभी फुर्सत मिली  तो जरूर बताउंगा....


( चांपा रेलवे स्टेशन पर शालीमार ट्रेन के रूकने के दौरान दिन बुधवार 2 फरवरी 2011 सुबह 10.20 बजे, कविता एक तस्वीर को देखकर बन गई जो तब कुछ ही देर पहले मैंने खींची थी )

शनिवार, 29 जनवरी 2011

सुनील सहित आठ को एनएफआई मीडिया फेलोशीप



 
 रविवार डॉट कॉम के संपादकीय विभाग में कार्यरत सुनील शर्मा को नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया ने 2011 की मीडिया फेलोशीप प्रदान की है. इस फेलोशीप के तहत सुनील शर्मा छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की स्थिति पर शोधपरक रिपोर्ट तैयार करेंगे.

नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया पिछले कई सालों से अलग-अलग भाषाओं में काम करने वाले पत्रकारों को यह फेलोशीप देती है. इस साल देश के आठ पत्रकारों और फोटोग्राफरों का चयन इस फेलोशीप के लिये किया गया है.

पिछले दिनों दिल्ली के इंडिया हैबीटेट सेंटर में संपन्न हुये एक कार्यक्रम में प्रख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा के हाथों सुनील को यह फेलोशीप दी गई.

सुनील के अलावा जिन पत्रकारों को यह फेलोशीप मिली है, उनमें मुंबई की सौम्या राय, गुवाहाटी के अरुप शांडिल्य, बांदा की मीरा देवी, रांची की अलोका, चेन्नई की निधि अदलखा, दिल्ली की रावलीन कौर और बैंगालुरू के छायाकार सेल्वा प्रकाश शामिल हैं.


 * रविवार डॉट कॉम से साभार 
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मीडिया फेलोशिप पाने वाले मेरे सभी साथियों.. अरुप,सौम्या,सेल्वा,अलोका,मीरा,निधि और रावलीन को मेरी बधाई और अशेष शुभकामनाएं.....आप सभी खूब बढ़िया काम करें और शोहरत हासिल करें.

-सुनील शर्मा 

रविवार, 16 जनवरी 2011

बुजुर्ग की उंगली


मेरे पिताजी भतीजे अंकित  के साथ.
सुनील शर्मा

पुल खत्म होते ही
सडक़ किनारे मैंने
मोटरसाइकिल रोक दी.
उतरे एक बुजुर्ग और
एक आठ साल का बच्चा.


बुजुर्ग की उंगली थामे
बच्चा
निर्भय होकर चलने लगा
सडक़ के किनारे-किनारे.
बुजुर्ग काफी सावधानी से बच्चे को
अपने साथ लेकर जा रहे थे.


मैं कुछ देर तक खामोश खड़ा देखता रहा.
वैसे कोई खास बात 

नहीं थी उस दृश्य में
फिर क्यों मैं देर तक निहारते रहा
उनको जाते हुए?


पहली बार मेरे भीतर एक चाह जगी
और उसके साथ एक पीड़ा भी.
बचपन में काश मैंने भी थामी होती
किसी बुजुर्ग की उंगली.
और चल पाता निर्भय होकर.
तो मेरे भीतर का रोज बढऩे वाला
डर इतना बड़ा न होता.


मुझे तो दादा की वह तस्वीर भी
याद नहीं जो बरसो पहले
देखी थी बुआ के घर पर.

बुआ कहते नहीं थकती थी,
उस पुरानी श्याम- श्वेत तस्वीर में
कितने सुंदर लगते थे दादाजी.


एक बार बहुत पूछने पर
पिताजी ने बताया था
अमावस के मेले में खिंचवाई थी
उन्होंने वह तस्वीर,
और फोटोग्राफर ने पैसे लेने की बजाय
उनके पाँव छू लिए थे .