रविवार, 26 सितंबर 2010

तोते का चरित्र हनन


सुनील शर्मा

किसी भी व्यक्ति के चरित्र को लेकर बात करना एक आम बात है और वैसे भी
यह निंदा रस का सबसे प्रमुख तत्व माना जाता है. इस बात पर मैं भी यकीन करता है. मनुष्य के चरित्र की चर्चाएं तो समझ में आती है लेकिन जब तोते के चरित्र को लेकर चर्चा हो तब यह विषय बिल्कुल भी
समझ में आने वाला नहीं है.
यह
कई
मायने में दिलचस्प भी हो जाता है.
मेरे मित्र और जाने-माने चित्रकार, फोटोग्राफर और कवि रमण किरण ने रविवार 26 सितंबर को काफी हाउस में ''तोते का चरित्र हनन'' विषय पर परिचर्चा आयोजित कर जैसे मुझे चौंका ही दिया.

स्वाभाविक रूप से उनका अभि
न्न मित्र और उनकी मासिक पत्रिका जंगल बुक का पूर्व कार्यकारी संपादक होने के नाते मैं परिचर्चा में उपस्थित था. पूर्व में भी वे ऐसी कई परिचर्चाओं का आयोजन कर चुके हैं, जिनके केंद्र में पशु-पक्षी रहे हैं.

परिचर्चा में उम्मीद के मुताबिक गिने-चुने कुल दस लोग उपस्थित थे. सच कहूं तो मुझे इतने लोगों के आने की भी उम्मीद नहीं थी. खैर परिचर्चा की शुरुआत औपचारिक रूप से रमण किरण जी ने नेचर क्लब के सदस्य अर्जुन भोजवानी जी का स्वागत कर किया और उनका इस कार्य में अरपा विकास कार्यक्रम के महामंत्री और पर्यावरण प्रेमी अनिल तिवारी ने दिया. पता चला कि श्री भोजवानी राजनीति के अलावा समय निकालकर ऐसे बहेलियों को भी सबक सिखाते रहे हैं, जो तोता-मैना और अन्य पक्षियों का अवैध व्यापार करते हैं. अब तक करीब वे हजारों पक्षियों को बहेलियों की चंगुल से आजाद कराकर उन्हें आसमान के हवाले कर चुके हैं, जो कि उनका अधिकार भी है.

इस परिचय के बाद परिचर्चा के उद्देश्य पर चर्चा करते हुए और कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए रमण किरण जी ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी में बताया कि 17 सितंबर को अखबारों में खबर आई कि कोलंबिया के बारानक्विला शहर में पुलिस ने एक तोते को इसलिए गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उसने तस्करों और चोरों को भगाने में उनकी सहायता की. वहां के स्थानीय समाचार पत्र एल हेराल्ड
के मुताबि गंभीर शिकायत मिलने पर 300 पुलिस अधिकारियों ने एक योजना के तहत एक घर पर बुधवार को छापेमारी की थी. पुलिस को यह सूचना मिली थी कि घर में चोर और नशीले पदार्थों के तस्कर छिपे हुए हैं.

पुलिस अधिकारियों ने जब घर में दबिश दी तब उन्हें एक आवाज सुनाई दी, जिसमें कहा गया-भागो, भागो नहीं तो बिल्ली तुम्हें पकड़ लेगी. बाद में पुलिस अधिकारियों ने पाया कि ऐसा लोरेंजा नाम के एक तोते ने किया था. अपराधियों ने उसे इसी काम के बाकायदा प्रशिक्षित किया था. तोते द्वारा सतर्क किये जाने के बाद चार को छोडक़र शेष अपराधी भाग निकले. पुलिस ने तोते को गिरफ्ता
कर एक ऐसी संस्था के हवाले कर दिया जो पशु-पक्षियों के संरक्षण का काम देखती है. पुलिस ने चार अपराधियों के साथ 250 चाकू और एक हजार पैकेट नशीले पदार्थ बरामद किये. पुलिस का कहना है कि तस्करों ने लोरेंजा की तरह ही करीब 1700 तोतों को ट्रेंड किया है.

रमण किरण जी ने कहा कि इस खबर के बाद तोते की प्रजाति पर पूरे विश्व में संकट के बादल छा गये हैं. अब जहां पुलिस वाले तोतों को पकड़ रहे हैं, वहीं इस निरपराध पक्षी का उपयोग नशीले पदार्थों के तस्कर करने लगे हैं जो कि दुखद है. इससे तोते के पवित्र चरित्र का हनन हो रहा हैं. उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ में तोते का
जो स्थान है, वह कहीं नहीं है, क्योंकि यहां सुआ गीत से लेकर पौराणिक कथाओं में भी तोता एक प्रमुख पात्र की भूमिका निभाता आया है. उन्होंने उपस्थित वक्ताओं से आग्रह किया कि तोता के संरक्षण एवं संवद्र्धन के लिये वे अपने विचार प्रकट करें.

पर्यावरण प्रेमी और कन्या महाविद्यालय की प्राध्यापिका डा. कावेरी दाभडक़र ने कहा कि मनुष्य और पशु-पक्षियों का संबंध आदिकाल से ही रहा है. दुख की बात तो यह है कि मनुष्य शुरू से ही पशु-पक्षियों का उपयोग अपने निहित स्वार्थ के लिए करता आ रहा है. अब स्थिति विकट होती जा रही है. कोलंबिया की घटना की निंदा करते हुये उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में पशु-पक्षियों के शिकार की घटनायें बढ़ रही है और सभी को मिलकर प्रयास करना होगा कि इस प जल्दी से जल्दी रोक लगाई जाये. लोक जीवन में तोता के महत्व को बताते हुए उन्होंने इसे ब्राह्मण बताया. उन्होंने कहा कि जाति से नहीं बल्कि सच्चाई का प्रतीक तोता होता हैं. यदि तोता का संरक्षण नहीं किया गया तो यहां भी कोलंबिया की तरह घटना होगी.

तोता को सीधा और सरल पक्षी बताते हुये शहर के जाने-माने साहित्यकार और पर्यावरणप्रेमी डा. विनय कुमार पाठक ने कहा कि छत्तीसगढ़ में सुआ गीत की गायन परंपरा वर्षों से है. यह सिद्ध करता है कि इस पक्षी से हमारा पुराना और गहरा संबंध है.

यह संदेशवाहक की भूमिका निभाता रहा है और यह आदमी की हुबहू नकल करने में माहिर हैं
. तोते को हम जैसा सिखायेंगे वह वैसा ही सिखेगा. यदि कोई इस पक्षी का इस्तेमाल गलत कार्य में करता है तो इसके लिये वह दोषी नहीं है. तोता निर्दोष है. कोलंबिया पुलिस को अपनी इस हरकत के लिये शर्मिंदा होना चाहिये. कोलंबिया की घटना से सबक लेने की जरूरत है.

पर्यावरण प्रेमी अनिल तिवारी ने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुये कहा कि जब वे पहली कक्षा में थे तो तोता पर एक कविता पाठ 16 में थी. वह कविता आज भी उन्हें याद है. कविता पाठ करने के बाद उन्होंने कहा कि तोता कई पौराणिक कथाओं का पात्र है और मनुष्य का एक तरह से साथी भी है. अलिफ लैला की कहानियों में भी तोता है और हमारे देश की पुरातन कथाओं में भी. तोता के साथ ही मैना को भी महत्वपूर्ण पक्षी बताते हुये उन्होंने मांग की कि इ पक्षियों के शिकार और इनको पिंजरे में बंद करने वालों, इन्हें बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिये. इन्हें जेल भेजना चाहिये और उनसे पूछना चाहिये कि हवालात के भीतर कैद होकर वे कैसा महसूस कर रहे हैं.

अर्जुन भोजवानी ने इस दौरान अपने कई अनुभव बताये. उन्होंने कहा कि वे पिछले कई वर्षों से प्रयास कर रहे हैं कि बहेलियों
द्वारा मासूम पक्षियों का शिकार न किया जाये, इनकी बिक्री न की जाये और लोग इन्हे पिंजरों में कैद करके न रखे. उन्होंने हाल ही की गई अपनी 20 दिवसीय यात्रा का अनुभव बताते हुये कहा कि वे हिमाचल प्रदेश और पंजाब में देखकर आये है कि वहां कोई पक्षियों को पिंजरों में कैद करके नहीं रखता. पक्षी घरों में आते हैं और दाना चुगकर फिर से आसमान की सैर में निकल जाते है. उन्होंने शहर और पूरे प्रदेश में भी इस तरह का वातावरण निर्मित करने के लिये प्रयास करने पर बल दिया.

अपोलो में पदस्थ मित्र सीएम मिश्रा ने अपने शैक्षणिक जीवन की याद करते हुए कहा कि विशिष्ट हिंदी विषय के साथ अध्ययन करते हुए उन्होंने तोते के बारे में एक बात पढ़ी थी. तब से ही तोता उनके लिए काफी महत्व रखता है. उन्होंने तोतों का इस्तेमाल हथियार और नशीली दवाओं के लिए होने को दुखद बताया. साथ ही यह आश्वासन दिया कि जब भी तोतों के संरक्षण और संवद्र्धन के लिए उन्हें बुलाया जायेगा वे उपस्थित हो जायेंगे और हर संभव मदद करेंगे.

इस अवसर पर मौजू
द अधिवक्ता मित्र राजेश दुबे ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मित्रों, रिश्तेदारों को जो तोता व अन्य पक्षियों को पिंजरों में कैद करके रखते हैं, को हतोत्साहित करना चाहिये और उनके इस कार्य की सार्वजनिक रूप से निंदा करनी चाहिये, ताकि वे लज्जित होकर ऐसा न करें. ऐसा करके हम मासूम पक्षियों की बड़ी मदद कर सकते हैं, क्योंकि जब लोग खरीदेंगे ही नहीं तो उन्हें बेचने के लिए बहेलिये उनको पकड़ेंगे क्यों.

अधिवक्ता साथी मनोज
अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने इंटरनेट के माध्यम से पता किया है कि कोलंबिया में तोता बहुत ही आम पक्षी माना जाता है. वहां की कथाओं व आम जीवन में तोता को कोई स्थान प्राप्त नहीं है. वहां हमे मेल के जरिये यह संदेश भेजना चाहिये कि तोता को पुलिस द्वारा इस तरह गिरफ्तार किया जाना ठीक नहीं है. उन्होंने वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 की कुछ उन धाराओं का भी उल्लेख किया जिनका संबंध पक्षियों के शिकार व पकडऩे से हैं. इस अवसर पर कोरबा से आये प्राध्यापक उमेश प्रसाद साहू, अधिवक्ता रमेश मिश्रा भी उपस्थित थे.

इस परिचर्चा के बाद देर तक हम आपस में चर्चा करते रहे. परिचर्चा का विषय काफी छोटा लग रहा था लेकिन जब परिचर्चा शुरू हुई तब जैसे इस विषय ने एक बड़ा आकार ले लिया. इस परिचर्चा के दौरान ही तोते के विषय में कई ऐसी बातें जानने मिली, जो शायद आप भी नहीं जानते होंगे, जैसे यह एक पत्नीव्रती पक्षी है. तोता झुंड में रहता है. नर और मादा एक जैसे होते हैं. हरा तोता सबसे अधिक प्रसिद्ध होता है जो
अफ्रीका से लेकर लालसागर होता हुआ भारत, बर्मा, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तक पाया जाता है चूंकि ये सारे इलाके गर्म कहे जाते हैं. मादा (तोता) एक से बारह तक सफेद अंडे देती है और हमारे देश में तोते हर प्रांत व वनाच्छादित क्षेत्रों में पाये जाते हैं.

मैं चाहता हूं कि आप यह संकल्प
लें कि आज के बाद आप तोते को पालने वालों, तोते को प्रशिक्षण देने वालों, तोतों के प्रदर्शन हेतु इसके चिडिय़ाघरों में रखने का विरोध करेंगे. साथ ही बहेलियों को तोतों को बेचने के लिए ले जाते हुए देखेंगे तो वन विभाग के अधिकारियों को या अर्जुन भोजवानी या रमण किरण(मो.-9300327324)को सूचित करेंगे.

तोते
को गुनहगार पंछी प्रमाणित होने से बचाने के लिये सरकार, वन विभाग, पक्षी प्रेमी, प्रकृति पे्रमियों को सावधान हो जाना चाहिये ताकि इस प्रजाति को बचाया जा सकें.


यहां एक बच्चे की कविता पेश करते हुऐ मुझे खुशी हो रही है, नि:संदेह कविता का शीर्षक तोता ही है-

डाल पर बैठा तोता , हमने देखा वह पका आम खाता.....
मै
नीचे बैठा वह ऊपर बैठा,
उस आम के लिए मै एठा......

बैठा सोचू कि यह आम मुझे ही मिले, इसका रस मेरे पेट में जाकर टहले....
बार बार तोता मेरी ओर देखता , मुझे देखकर ठाँव ठाँव कर गता......
तब
तक आम गिरा वह नीचे,
उसे उठाने दौड़ा मैं उसके पीछे......
जैसे
ही उसको पाया धुल कर मैं ने खाया ,
उसको खाने में बड़ा मजा आया.....
तब तक तोता रोया इतनी जोर से, पेड़ के सारे आम गिरे उसके इस शोर से .....

सारे
आमो को हमने उठाया,
फिर जाकर घर में सबके साथ में खाया......

--आशीष कुमार कक्षा ७













ढेला, कचरा, घुरवा और न जाने क्या-क्या !



सुनील शर्मा

उनकी आंखों में अजीब सा दर्द झलकता है. ऐसा अक्सर तब होता है, जब उन्हें कोई उनका नाम लेकर पुकारता है. एक ओर जहां अधिकांश लोग अपने बच्चों का नामकरण देवी-देवताओं, महापुरुषों तथा अन्य ख्यातिलब्ध हस्तियों के नाम पर करते हैं, वहीं अंधविश्वास की जड़े गांवों में इस हद तक जमी हुई है कि लोग अपनी संतानों की रक्षा के लिए उनका बुरा से बुरा नाम रखने से भी नहीं कतराते. हालांकि इनमें उनका दोष नहीं है.


प्रदेश सहित जिले में आज भी ऐसी परंपराये मौजूद है जिनके कारण लोग अपने बच्चों का नाम घुरवा, कचरा, ढेला आदि रखते हैं. बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो उन्हें अपने ही नाम के कारण शर्मिंदा होना पड़ता है. इन्हीं नामों की
वजह से वे न चाहते हुए भी हीनभावना का शिकार हो जाते हैं.

जब तक वे अपने नाम का अर्थ जानने लायक होते हैं, उनका नाम चलन में आ गया होता है. और वे न अपना नाम बदल पाते हैं और न ही बदलवा पाते हैं. ऐसे मामले ज्यादातर लड़कियों से जुड़े होते हैं, क्योंकि आज भी ग्रामीण समाज लड़कियों को हीन भावना से देखता है. घुरवा, कचरा, ढेला, बिटावन, मेलन, फेकन सहित कई ऐसे नाम लड़कियों के ही होते हैं.

नाम के कारण उन्हें जीवन
भर प्रताडि़त होना पड़ता है. बचपन से ही जहां उनका मजाक उड़ाया जाता है, वहीं जब वे बड़ी होती है तो इसी नाम के साथ उनकी पहचान जुड़ चुकी होती है. स्कूल के रजिस्टर से लेकर राशन कार्ड और मतदाता परिचय पत्र में भी यहीं नाम चलता है.

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण या शहरी समाज में किसी भी जाति द्वारा आज भी शादी के बाद लड़कियों का नाम नहीं बदला जाता. यदि छत्तीसगढ़ में ऐसा होता कि लडक़ी का नाम शादी के बाद उसके ससुराल में बदल दिया जाता जैसे कि महाराष्ट्रीयन परिवारों में आमतौर पर देखने को मिलता है, तो शायद ऐसे नामों वाली लड़कियों को कुछ राहत जरूर मिलती.

ऐसे ही नाम वाली महिलाओं से जब चर्चा की गई तो उनका कहना था कि कई बार जब लोग उनका नाम पुकारते हैं तो लगता है कि
वे उन्हें गाली दे रहे हैं. अब ऐसा क्यों उन्हें लगता है, वे खुद नहीं जानती, लेकिन उन्हें दुख पहुंचता है. अपनो के द्वारा दिये दर्द को वे बार-बार बयान भी तो नहीं कर सकती. कई बार नाम को लेकर उनका झगड़ा भी अपनी सहेलियों या पड़ोसियों से हो जाता है.

भले ही देश और प्रदेश को विकास की राह में अग्रसर बताया जा रहा हो लेकिन यह दुखद ही है कि आज भी ऐसे नाम रखने का सिलसिला गांवों में बदस्तूर जारी है. इ
सकार प्रमाण प्राइमरी स्कूलों के हाजिरी रजिस्टरों में मिल जायेगा. ग्रामीण क्षेत्र मेंहर स्कूल में ऐसे तिरस्कृत नाम दर्जनों की संख्या में है. महिला एवं बाल विकास विभाग महिलाओं और बच्चों के विकास की बात करता है लेकिन ऐसे नामों के चलते महिलाओं को होने वाली पीड़ा का उन्हें अंदाजा भी नहीं है.

ग्रामीण क्षेत्रों में घुरवा और कचरा जैसे नामों का रखा जाना यह बताता है कि आज भी गांवों से शिक्षा कितनी दूर है. ग्रामीण आज भी अशिक्षा और अंधविश्वास की मजबूत जड़ में जकड़े हुये है. उन्हें इनसे निकाल पाना कठिन है.

जिन्हें जरा भी गांवों
के बारे में जानकारी है, वे ऐसे नाम वाले एक-दो को तो जानते ही होंगे. आज भी ऐसे नाम रखे जाते हैं. पाठकों की तसल्ली के लिए पेश है कुछ उदाहरण.

लोरमी ब्लाक के प्राइमरी स्कूल देवरहट में तितरा सूर्यवंशी पिता पुन्नूलाल, प्राइमरी स्कूल बोईरपारा में कक्षा पांचवीं में पढऩे वाली महेतरीन पिता लतेल केंवट, ठगिया पिता राधे कश्यप, प्राइमरी स्कूल सिलपहरी में नकछेद, मेलन साहू पहली, प्राइमरी स्कूल नहरीभाठा में दुखु राम, ढेलगू सूर्यवंशी सहित लगभग हर गांव के हर स्कूल में ऐसे दर्जनों नाम मिल जायेंगे.

चिढ़ाते हैं मेरा नाम ले
कर

बिलासपुर रतनपुर मार्ग पर कछार नामक गांव में रहने वाली 8 वर्षीय लडक़ी ढेला कहती है कि उसकी सहेलियां उसके नाम को लेकर उसे चिढ़ाती है. गतौरी के विद्यामंदिर में पढऩे वाली कचरा बाई सूर्यवंशी कहती है कि उसे अपने नाम को लेकर बहुत दुख लगता है.

होना पड़ता है शर्मिंदा

केवल बच्चों को खराब लगता है, जो बड़े हो चुके हैं, उन्हें भी अपने इस तरह का नाम होने के कारण खराब लगता है और शर्मिंदा होना पड़ता है. अब कछार की कचराबाई साहू और सेंदरी की कचरा बाई सूर्यवंशी को ही ले. दोनों आंगनबाड़ी कार्यकर्ता है. विभागीय बैठक में जब उन्हें अधिकारी कचरा कहकर पुकारता है तो अन्य कार्यकर्ता उनकी ओर देखने लगते हैं और वे हंसने लगती है.

नहीं बदल पाई नाम

कोनी निवासी घुरवा ने सात साल की उम्र में नाम बदलने का प्रयास किया. उसने घरवालों और लोगों से कहा कि उसे सरोजनी कहकर पुकारे लेकिन लोगों ने उसकी एक न सुनी और आज भी लोग उसे घुरवा कहकर पुकारते हैं. आज भले ही उसकी शादी हो चुकी है और वह अपने परिवार के साथ खुश है लेकिन उसे इस बात का अफसोस है कि वह अपना नाम नहीं बदल सकी. कुछ ऐसी ही कहानी टेकर व कछार की कचरा बाई और घुरवा बाई का भी है.

बदल सकते हैं नाम

दुर्ग जिले के शिक्षाधिकारी बीएल कुर्रे कहते हैं कि सामाजिक रीति-रिवाजों में जकड़े होने के कारण यह अब भी चलन में है. बच्चे बड़े होकर बोर्ड परीक्षा होने के पहले अपना नाम बदल सकते हैं. हमारे पास शासन की ओर से यह आदेश नहीं है कि हम स्कूलों में शिक्षकों को यह कहे कि वे एडमिशन के समय बच्चों का अच्छा नाम दर्ज करें. जो मां-बाप कहते हैं वहीं नाम बच्चों का लिखा जाता है.

बिल्कुल न मिले बढ़ावा

छत्तीसगढ़ अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डा.दिनेश मिश्र कहते है कि ऐसा अंधविश्वास के कारण होता है. नवजात शिशु को मौत से बचाने और लोगों को बुरी नजर से दूर रखने के लिए ऐसे उपेक्षित नाम रखे जाते हैं, जिन्हें कोई पसंद नहीं करता. हालांकि पहले की अपेक्षा अब लोगों में इसे लेकर जागरूकता आयी है. पहले गांवों में साफ-सफाई न होने के कारण बीमारियां होती थी और नवजात शिशु की मौत हो जाती थी. ऐसा एक-दो बार होने के बाद लोग इस तरह का नाम रखकर एक तरह से शिशु की मौत की रक्षा करने का प्रयास करते थे. हालांकि यह तर्कहीन और अंधविश्वासपूर्ण कार्य है जिसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिये.

अभी भी है अंधविश्वास

मनोवैज्ञानिक डा. पीके तिवारी का मानना है कि ये एक तरह का टोटका है, नींबू-मिर्च से बड़ा अंधविश्वास है. अशिक्षा व दूरदर्शी सोच नहीं होने के कारण अक्सर ग्रामीण ऐसा नाम रखते हैं. सुंदर बच्चे को किसी की बुरी नजर से बचाने और शिशुओं की लगातार मृत्यु के बाद ऐसे नाम रखने का चलन गांवों में आज भी देखने को मिलता है. हालांकि इस तरह के कार्य कोई ठोस आधार नहीं है. एक परिवार जब ऐसा करता है तो दूसरे परिवार पर इसका मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है.



शनिवार, 25 सितंबर 2010

अयुद्धा जन्मभूमि में मजहबी युद्ध


कनक तिवारी

राम भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े योद्धा हैं. रावण से उनका युद्ध एक सामंतवादी, अत्याचारी, बौद्धिक अहंकारी साम्राज्यवाद की ताकत से था. राम ने भील, वानर, दलित, किन्नर, आदिवासी की मदद से उन राक्षसी मूल्यों का नाश किया जो आज फिर अमरीकी सरमाएदारों की छत्रछाया में पनप रहे हैं.



सुप्रीम कोर्ट ने देश को राहत देते हुए एक बार फिर जनता के विवेक को झकझोरने की ऐतिहासिक कोशिश की है. हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथी उस पर भी फब्तियां कस रहे हैं. सभी पक्ष इस संवेदनशील धार्मिक-सांस्कृतिक मसले को राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं. राम इस पूरे मुद्दे के केंद्र में रखे जाते हैं, लेकिन उनका केवल कंधा इस्तेमाल किया जाता है. उनके विवेक, ज्ञान, कर्म और धर्म मीमांसा का भारतीय लोकतंत्र के लिए कोई अर्थ नहीं रह गया है.

एक-एक कर प्याज के छिलकों की तरह यदि तर्कों की बखिया उधेड़ी जाए तो आश्चर्यजनक परिणाम सामने आते हैं.

1. इसमें कहां शक है कि राम का चरित्र भारत में ही पैदा हुआ है. बाल्मीकि संभवत: पहले कवि हैं जिनकी कल्पना या आंखों देखे विवरण से राम का चरित्र लिखा गया है. इतिहास के पास राम का कोई प्रामाणिक ब्यौरा नहीं है. इतिहास लेखन की वैसी कोई परंपरा भारत में नहीं रही है. फिर भी राम को एक मिथक, अवतार या प्रतीक पुरुष मानने के बदले उन्हें अयोध्या में मनुष्य के रूप में जन्मा माना जा रहा है.

2. इसमें भी कोई शक नहीं है कि नए धर्म के रूप में जन्में इस्लाम के अनुयायी सम्राट बाबर भारत में कोई पांच सौ वर्ष पहले आए. बाबर के नाम पर ही बाबरी मस्जिद अयोध्या में बनाई गई थी. वहां पहले राम मंदिर होने की बात कही जा रही है, जिसे मुगल बादशाह के काल में तोड़ दिया जाने का आरोप है.

3. अंगरेजी सल्तनत के भारत में रहते हिन्दू-मुस्लिम पक्षों के विवाद गहराया और अदालती कार्रवाई शुरू भी हुई. अंगरेज ही तो भारत में हिंदू-मुसलमान झगड़ों को लगातार हवा देता रहा है. उसने इस बड़े विवाद का बड़ा फायदा उठाया.

4. राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में कांग्रेस में घुसे संघ परिवारीय तत्वों ने उनसे राम मंदिर के ताले खुलवाकर ऐतिहासिक गलती करवाई. ऐसी ही गलती युवा प्रधानमंत्री से शाहबानो के मामले में संसद के जरिए भी करवाई गई. साफ है कांग्रेस, हिन्दू और मुस्लिम फिरकापरस्तों के सामने घुटने टेकते आई है.

5. पहले भी राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट को राय देने के लिए यह मामला रेफर किया था. सुप्रीम कोर्ट ने कोई राय नहीं देते हुए रेफरेन्स को लौटा दिया था. जस्टिस वर्मा ने ही शिवसेना वाले मामले में हिन्दुत्व को लेकर दक्षिणपंथियों के लिए सहूलियत वाला फैसला दिया था.

6. मौजूदा प्रकरण लखनऊ बेंच में ठीक हालत में नहीं था. एक न्यायाधीश शर्मा ने तो यह भी आरोप लगाया कि उनसे कुछ मुद्दों पर दूसरे दो जजों ने सलाह ही नहीं ली. जस्टिस शर्मा 30 सितंबर को रिटायर भी हो जाएंगे.



7. रमेशचंद्र त्रिपाठी नामक सज्जन यदि इस मामले में कभी पक्षकार नहीं रहे हों तो क्या फर्क पड़ता है. संविधान के अनुच्छेद 21 तथा 32 सहित मूल अधिकारों के परिच्छेद में प्रत्येक भारतीय को अधिकार है कि, वह अपने तथा देशवाशियों के मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाए. इस सिलसिले में हिन्दू-मुस्लिम कठमुल्ला तत्व एक स्वर से त्रिपाठी पर आरोप लगा रहे हैं.

8. सुप्रीम कोर्ट ने अब तक इस विवाद में फूंक-फूंककर ही कदम रखे हैं. वह रवैया जारी है. जस्टिस गोखले ने अंधेरे में तीर मारने की शैली में टिप्पणी जरूरी की है, यद्यपि वह सद्भावनापूर्ण है. दोनों पक्ष पहले से कह रहे हैं कि समझौता अब संभव नहीं है क्योंकि जब पचास, साठ वर्षों में पक्षकारों में समझौता नहीं हो सका तो अब क्या होगा? क्या पुरानी पक्षकार जीवित भी हैं? क्या ऐसी लड़ाइयां सदियों तक चलनी है?

9. संघ परिवार और सुन्नी बोर्ड दोनों हाईकोर्ट से फैसले चाहते हैं, जिसका वे पालन भी करना चाहते हैं? क्या ऐसा वे कर पाएंगे? यदि फैसला मुसलमानों के पक्ष में होता तो बिहार के चुनावों में भाजपा को फायदा नहीं होता? यदि हिन्दुओं के पक्ष में होता तो कश्मीर में क्या होता? आतंकवादी क्या करते? क्या धार्मिक और राजनीतिक नेता कट्टरपंथी तत्वों और अनुयायियों को बेकाबू कर पाते?

10. सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल इतने ज्ञानी क्यों हैं कि उन्होंने मामला पहले फौजदारी बेंच को भेज दिया, फिर बेंच ने ही उसे लौटा दिया. इतने गंभीर मामले में भी यह हालत है जैसी सुरेश कलमाड़ी की कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर है.

11. 28 सितंबर को सभी पक्ष क्या जवाब पेश भी कर पाएंगे या और वक्त मांगेंगे? क्या सुप्रीम कोर्ट 29 सितंबर को ही मामला हाईकोर्ट को भेज पाएगा? क्या रिटायर होने वाले न्यायाधीश शर्मा उसी दिन अंतिम फैसला लिख भी पाएंगे? सुप्रीम कोर्ट ने यदि कुछ सलाह दे दी तो क्या होगा?

*रविवार से साभार