गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

आठवीं पास मनीराम ने छेड़ी फेसबुक पर जंग


सुनील शर्मा.बिलासपुर

शायद यह पहला मामला है जब किसी ग्रामीण
 महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना
(मनरेगा) के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने और इसका विरोध करने के उद्देश्य से सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर अपना एकाउंट बनाया है।

खुद मुंगेली जिले के लोरमी ब्लाक के ग्राम बोईरपारा के 34 वर्षीय मनीराम कैवर्त ने नवंबर 2012 के पहले कभी इसके बारे में नहीं सोचा था। लेकिन उसने अगली पीढ़ी के भविष्य के लिए मनरेगा के खिलाफ जंग छेडऩे का मन बनाया। तभी आर्थिक कारणों से उसे गांव छोडऩा पड़ा।

मनरेगा में मजदूरी नहीं मिली तो वह काम की तलाश में भटकता हुआ गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी कोनी पहुंचा जहां उसके रिश्तेदार की मदद से रोजी-मजदूरी का काम मिला। कुछ दिनों बाद उसने अपने मित्रों से संपर्क कर अपनी इच्छा बताई। मित्रों ने उन्हें फेसबुक और इसके व्यापक परिणाम से अवगत कराया। मनीराम ने अपने एक दोस्त की मदद से 19 नवंबर 2012 को फेसबुक पर अपना एकाउंट बनाया लेकिन उसने अपना इमेल आइडी मनी बोईरपारा ही रखा ताकि गांव का नाम उससे किसी भी तरह अलग न हो पाए। गांव का नाम थोड़ा अलग होने के बाद भी उसने इसकी चिंता नहीं की।

 इसके बाद उसने एक-एक कर कई खुलासे किए। उसने दस्तावेज के साथ गांव में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े निर्माण कार्यों की तस्वीर भी शेयर की। फेसबुक पर मनी के विधायक सौरभ सिंह,पिछड़ा वर्ग अध्यक्ष सोमनाथ यादव,समाजवादी आनंद मिश्रा के साथ ही राजनीति,शिक्षा,पत्रकारिता और युवा जगत के 122 मित्र है। उसके शेयर पर अब कमेंट भी आने लगा है। मनीराम को उम्मीद है कि उसका आदर्श गांव बनाने का सपना एक दिन जरूर पूरा होगा और इसमें फेसबुक उसकी मदद करेगा।

ये किया शेयर

0 19 नवंबर 2012 को मनीराम ने सांसद निधि से स्वीकृत पांच लाख के सीसी रोड के प्रगति प्रतिवेदन की छायाप्रति की तस्वीर शेयर कर बताया कि काम शुरू ही नहीं हुआ है।
0 उसने दिसंबर में आरटीआई द्वारा सूचना मांगने पर धमकी मिलने की बात शेयर की।
0 सजग ने उसे हौसलाभरा पत्र भेजा जिसे भी उसने शेयर किया।
0 22 जनवरी को गांव की पांच तस्वीरे शेयर की-1-गोशाला बन चुके पंचायत भवन,2- खेल मैदान में भ्रष्टाचार की जानकारी देता युवक ,3-गुणवत्ताहीन निर्माणाधीन प्रधानपाठक कक्ष,4-सरपंच के देवर द्वारा श्मशान भूमि पर कब्जा कर बना मकान,5-पंचायत के एक भवन पर कब्जा।

सजग ने दिया हौसला

आरटीआई के तहत सूचना मांगने पर धमकी मिलने से परेशान मनीराम ने फेसबुक पर इसे सांझा किया तो तो सोशल एंड ज्यूडिशयल एक्शन ग्रुप(सजग) ने मनीराम को एक पत्र लिखा। सजग के संयोजक विनोद व्यास ने सूचना के अधिकार को लेकर मनीराम द्वारा किए जा रहे कार्यों की प्रशंसा करते हुए  किसी भी तरह के समाज विरोधी लोगों से डरे बिना समाज को बेहतर बनाने की दिशा में काम करते रहने का हौसला दिया। यह भी कहा कि सजग के साथी हमेशा उनके साथ है।

ऐसे मिली प्रेरणा

13 अक्टूबर 2012 को केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के निर्देश पर सेंटर फॉर इकानामिक एंड सोशल स्टडीज की सेंट्रल टीम गांव का सर्वे करने पहुंची तो उन्होंने युवा मनीराम से गांव में मनरेगा के कार्यों को लेकर देर तक चर्चा की। मनीराम ने उन्हें भ्रष्टाचार की जानकारी दी तो उन्होंने इसके लिए उन्हें आवाज उठाने कहा। इसी दिन से युवा ग्रामीण ने मनरेगा में भ्रष्टाचार करने वालों को सबक सिखाने का मन बनाया।

मित्रों मैं गांव का एक गरीब किसान हूं और महज आठवीं तक ही पढ़ सका हूं । मुझे अपने ग्रामीण होने पर गर्व है लेकिन दुख इस बात का है कि वहां भ्रष्टाचार ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। मनरेगा में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लडऩे के लिए अपने मित्र के सुझाव और सहयोग से मैंने फेसबुक ज्वाइन किया है...उम्मीद है आप सभी से मुझे मदद मिलेगी। 
                                                                                                     मनीराम कैवर्त,फेसबुक पर

शनिवार, 2 मार्च 2013

आस्कर में बिलासपुर का नाम

सुनील शर्मा. बिलासपुर
विनीत चतुर्वेदानी


मशहूर विदेशी निर्देशक आंग ली की फिल्म लाईफ ऑफ पाई ने चार आस्कर अवार्ड जीतकर पूरी दुनिया को चौंका दिया है लेकिन कम ही लोगों को पता है कि इस फिल्म में बिलासपुर का भी योगदान है। चार में से एक अवार्ड बेस्ट विजुअल के लिए मिला है जिसमें मैच मूवर की भूमिका निभाने वाले संतोष डे और विनीत चतुर्वेदानी कुछ साल पहले शहर में विजुअल इफेक्ट की पढ़ाई कर चुके हैं।

2006-07 में एरीना मल्टीमीडिया में विजुअल इफेक्ट की पढ़ाई करने संतोष डे और विनीत चतुर्वेदानी आए थे। उन्होंने मन लगाकर यहां पढ़ाई की। पूरे एक साल विजुअल इफेक्ट के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने के बाद इन प्रतिभाशाली छात्रों को हॉलीवुड की नामी कंपनी रिदम एंड ह्यूज ने नौकरी दी। वहां भी इनका प्रदर्शन जारी रहा।
संतोष डे

विजुअल इफेक्ट में अपनी स्किल का बखूबी उपयोग करने वाले इन दो नौजवानों को उस समय लाईफ ऑफ पाई में ब्रेक मिला जब प्रोड्यूसर ने रिदम एंड ह्यूज के साथ फिल्म के विजुअल्स के लिए कांट्रेक्ट किया। फिल्म की अधिकांश शूटिंग भारत में हुई और इसमें स्पेशल विजुअल इफेक्ट में संतोष और विनीत ने अपनी कला का कौशल दिखाया। 


एक मंझे हुए मैच मूवर की भूमिका निभाते हुए उन्होंने अपना काम तल्लीनता से किया। यहीं वजह है कि फिल्म को विजुअल के लिए भी आस्कर मिला। रिदम एंड ह्यूज के दो स्टूडियो हैदराबाद व मुंबई में हैं। संतोष और विनीत हैदराबाद स्टूडियो में कार्यरत है।

एरीना मल्टीमीडिया के संचालक संदीप गुप्ता कहते हैं कि संतोष और विनीत शुरू से टैलेंटेड है। 2006-07 बैच में वे जब यहां विजुअल इफेक्ट की स्टडी के लिए आए थे तभी उन्हें लगता था कि ये एक दिन बड़ा मुकाम हासिल करेंगे। उनका अनुमान सही निकला। फिल्म को बेस्ट विजुअल के लिए आस्कर का अवार्ड मिलना उनके लिए भी गर्व की बात है क्योंकि उनके संस्था में पढ़े स्टूडेंट की उसमें प्रमुख भूमिका रही है। 

विजुअल्स में मैच मूवर की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है.पूरा भरोसा है कि आगे भी वे इसी तरह तरक्की करते रहेंगे। संतोष और विनीत की उपलब्धि से वर्तमान में अध्ययनरत स्टूडेंट्स का हौसला बढ़ा है। वे भी संतोष और विनीत की तरह अपना मुकाम हासिल करना चाहते हैं।
                                                                                      -  
संदीप गुप्ता,संचालक, एरीना मल्टीमीडिया


   भाई अनुपम सिंह (दैनिक भास्कर) को सादर आभार.

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

कहानी नरेंद्र की...

सुनील शर्मा. बिलासपुर
दर्द में तड़प उठता है नरेंद्र

16 साल का नरेंद्र रह-रहकर उठने वाले दर्द से बेतहाशा चीखने लगता है। वह न तो किसी से मिलना चाहता है और न ही उसे कोई चीज अच्छी लग रही है। गुस्से में वह गले के सपोर्ट के लिए लगे पट्टे को खींचने लगता है। थोड़ी-थोड़ी देर में उसकी आंखों से आंसू बहने लगता है। जुबान से तो कुछ भी नहीं बोल सकता, अपनी इन्हीं हरकतों से दर्द बयां करता है।

 पिछले पखवाड़ेभर से वह अस्पताल के बेड पर दर्द से कराह रहा है, लेकिन उसकी सुध लेने के लिए कोई नहीं आया। डॉक्टर बताते हैं कि वह अपने पैरों पर चल सका तो यह किसी करिश्मा से कम नहीं। उसके ठीक होने की उम्मीद सिर्फ एक फीसदी है।

गुरुकुल पेंड्रा में कक्षा दसवीं का छात्र नरेंद्र सिदार 15 सितंबर को जिम्नास्टिक के अभ्यास के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गया। जंप के दौरान वह सिर के बल गिरा और गले के पास रीढ़ की हड्डी टूट गई। गले की नस दबने के साथ ही क्षतिग्रस्त भी हो गई। गुरुकुल में उसे जिम्नास्टिक का अभ्यास पूर्व कबड्डी खिलाड़ी और व्यायाम शिक्षक आरसी यादव करा रहे थे। यादव सीनियर कोच हैं, लेकिन जिम्नास्ट के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। दरअसल, गुरुकुल में जिम्नास्ट कोच नहीं है। नतीजतन, एक गैर जानकार कोच की देखरेख में अभ्यास करते हुए नरेंद्र घायल हो गया।


 इतना ही नहीं, उसके इलाज में भी देर की गई। किसी तरह उसे अपोलो हास्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां उसका आपरेशन करने से मामूली सुधार हुआ, लेकिन इलाज के बढ़ते खर्च के कारण परिजनों ने उसे डिस्चार्ज करा लिया। पैरालिसिस से पीडि़त नरेंद्र अब गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग केंद्र अस्पताल में भर्ती है। डाक्टरों के मुताबिक उसे रिहेबलिटेशन के लिए रखा गया है। 

अब तक इलाज पर पौने तीन लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। गनियारी हास्पिटल में उसे अन्य मरीजों से अलग आपरेशन थिएटर से लगे हुए कमरे में रखा गया है। वहां उसकी हालत शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूप से खराब है। रह-रहकर उसे चोट की वह घटना याद आ जाती है और वह सिहर उठता है। 

आपरेशन के बाद उसके गले में पाइप और पट्टा लगा है। जिसे वह बार-बार खींचने की कोशिश करता है। उसकी स्थिति पागलों जैसी हो गई है। बेड पर हो या व्हील चेयर में वह अपनी हरकत जारी रखता है। किसी भी नए आदमी को देखकर तो उसकी हालत और खराब हो जाती है, वह चीखने-चिल्लाने लगता है। पिता खुलास और चचेरा भाई वीरेंद्र उसकी देखभाल के लिए अस्पताल में हैं। उसकी गंभीर हालत को देखकर उनका भी धीरज जवाब दे देता है। वे बारी-बारी से कमरे के बाहर आकर बैठ जाते हैं। 


उनके चेहरे पर भी चिंता की लकीरें खींच गई है, क्योंकि उन्हें नरेंद्र के पहले की तरह होने का भरोसा नहीं रहा। खुलास ने कहा कि डाक्टर ने उनसे कहा है कि नरेंद्र की हालत ठीक हो जाएगी, लेकिन उसे नहीं लगता कि ये सच है। डाक्टर ने उन्हें दिलासा देने के लिए ऐसा कहा है। वह पहले की तरह कभी नहीं हो पाएगा। कुछ ऐसा ही मानना वीरेंद्र का भी है। पिछले 13-14 दिनों से वह नरेंद्र के साथ है, लेकिन वह उनसे बात नहीं कर पाता। इशारों में वह बात करता है और चिल्लाकर उन्हें बताता है कि उसे बहुत दर्द है।

 पिता और भाई चाहकर भी उसे दिलासा नहीं दे पाते। गांव गढग़ोढ़ी में मां तितर बाई को अपने बेटे की चिंता सता रही है और अपने पति से फोन पर बात करते हुए वह रो पड़ती है। खुलास अपने भाग्य को कोसते हुए भगवान से नरेंद्र को स्वस्थ करने के लिए प्रार्थना कर रहा है।

भाई वीरेंद्र और पिता खुलास
समस्या म हावन... का करन

नरेंद्र जांजगीर-चांपा जिले के सक्ती के पास ग्राम गढग़ोढ़ी का रहने वाला है। गुरुकुल से पहले वह अमलडीहा में पढ़ता था। उसके घायल होकर अपोलो में भर्ती होने से उसका परिवार बैकफुट में आ गया है। उसके गरीब परिवार को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है।

 नरेंद्र के पिता खुलास राम ने दैनिक भास्कर को समस्याग्रस्त होने की जानकारी देते हुए बेटे के घायल होने पर दुख व्यक्त किया। उसने छत्तीसगढ़ी में कहा समस्या म तो हावन, का करन...सब किस्मत के खेल हे। भगवान बने-बने नइ रहेन देत हे...। डाक्टर मन कहत हे के ओखर नरी (गला) के हड्डी टूट गय हे। 


महीनों चलेगा इलाज, किस्मत से है जिंदा

गनियारी हास्पिटल के डाक्टर और नरेंद्र के केस को शुरू से ही देख रहे डा. रमन कटारिया का कहना है कि इलाज में महीनों लग सकते हैं। अभी उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। रिहेबलिटेशन के लिए उसे लाया गया है, जहां उसकी फिजियोथेरेपी सहित ट्रीटमेंट के कुछ अन्य तरीकों को आजमाया जा रहा है। अभी जितनी रिकवरी होनी थी वह हो चुकी है, अब छह महीने से सालभर तक स्लोवर रिकवरी के चांस है।

जब यह केस उनके पास आया था तो उन्होंने ही डा. शर्मा को नरेंद्र का ट्रीटमेंट करने कहा था। उसकी हालत इतनी खराब थी कि यदि उसे सिम्स से रायपुर भेजा जाता तो उसका बचना मुश्किल था। वह जिंदा है, यह उसकी बड़ी किस्मत है। यह एक गंभीर केस है, जिसे स्टाफ गंभीरता से ले रहा है।

चल सका तो चमत्कार

नरेंद्र का आपरेशन अपोलो हास्पिटल के न्यूरो सर्जन डॉ.सुनील शर्मा ने किया है। उन्होंने दैनिक भास्कर को बताया कि नरेंद्र की रिकवरी के 99 फीसदी चांस नहीं है। उसे बेहद गंभीर हाल में अपोलो लाया गया था। उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी, जबकि गले की नस दबने के साथ ही खराब भी हो गई थी। वह छाती भी नहीं फुला पा रहा था क्योंकि उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। यह अपनी तरह का एक गंभीर केस था। उसके परिजन और गुरुकुल स्टाफ को बताया गया कि आपरेशन के बाद भी नरेंद्र ठीक हो पाएगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता, लेकिन कोशिश की जा रही है। 

उनकी सहमति से आपरेशन किया गया। आपरेशन के दौरान उसके गले की नस को दुरुस्त किया गया है। साथ ही टूट चुकी रीढ़ की हड्डी को सपोर्ट दिया गया है। आपरेशन के बाद उसकी हालत में पहले से कुछ सुधार तो हुआ है, लेकिन चोट इतनी अधिक है कि आगे कुछ कहा नहीं जा सकता। वह शायद ही सामान्य लोगों की तरह अपना जीवन जी सके। अगर वह अपने पैरों पर चल सका तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।

इनका कहना है...
 

ऐसा नहीं है कि जिम्नास्ट के जानकार नहीं हैं। कई खिलाडिय़ों ने राज्य स्तरीय स्पर्धा में अपना जौहर दिखाया है। स्पोट्र्स में चोट लगना आम बात है। नरेंद्र के इलाज में विभाग और गुरुकुल स्टाफ ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब उसकी हालत ठीक है और उसका फिजियाथैरेपी होना है।
सीएल जायसवाल, संयुक्त संचालक, आदिम जाति विकास विभाग, बिलासपुर

मैं मानती हूं कि गुरुकुल में जिम्नास्ट का कोई स्पेशल कोच नहीं है, लेकिन सालों से बच्चे इसी तरह व्यायाम शिक्षक की निगरानी में प्रेक्टिस कर रहे हैं। उनके कार्यकाल में कभी कोई घटना नहीं हुई। नरेंद्र का गिरना एक सामान्य घटना है। मुझे इस बारे में ज्यादा नहीं पता इसलिए बेहतर होगा आप व्यायाम शिक्षक सुशील मिश्रा से बात करें।
प्रसन्ना बरला, प्राचार्य, गुरुकुल पेंड्रारो


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नरेंद्र की पूरी कहानी 29 सितंबर,1अक्टूबर को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई है।पेंड्रा एसडीएम सारांश मितर ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए है। देखना होगा कि नरेंद्र को न्याय मिलता है या एक बार फिर प्रशासन दोषियों पर कार्रवाई करने की बजाय उन्हें बचा लेगा।