बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

कहानी नरेंद्र की...

सुनील शर्मा. बिलासपुर
दर्द में तड़प उठता है नरेंद्र

16 साल का नरेंद्र रह-रहकर उठने वाले दर्द से बेतहाशा चीखने लगता है। वह न तो किसी से मिलना चाहता है और न ही उसे कोई चीज अच्छी लग रही है। गुस्से में वह गले के सपोर्ट के लिए लगे पट्टे को खींचने लगता है। थोड़ी-थोड़ी देर में उसकी आंखों से आंसू बहने लगता है। जुबान से तो कुछ भी नहीं बोल सकता, अपनी इन्हीं हरकतों से दर्द बयां करता है।

 पिछले पखवाड़ेभर से वह अस्पताल के बेड पर दर्द से कराह रहा है, लेकिन उसकी सुध लेने के लिए कोई नहीं आया। डॉक्टर बताते हैं कि वह अपने पैरों पर चल सका तो यह किसी करिश्मा से कम नहीं। उसके ठीक होने की उम्मीद सिर्फ एक फीसदी है।

गुरुकुल पेंड्रा में कक्षा दसवीं का छात्र नरेंद्र सिदार 15 सितंबर को जिम्नास्टिक के अभ्यास के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गया। जंप के दौरान वह सिर के बल गिरा और गले के पास रीढ़ की हड्डी टूट गई। गले की नस दबने के साथ ही क्षतिग्रस्त भी हो गई। गुरुकुल में उसे जिम्नास्टिक का अभ्यास पूर्व कबड्डी खिलाड़ी और व्यायाम शिक्षक आरसी यादव करा रहे थे। यादव सीनियर कोच हैं, लेकिन जिम्नास्ट के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। दरअसल, गुरुकुल में जिम्नास्ट कोच नहीं है। नतीजतन, एक गैर जानकार कोच की देखरेख में अभ्यास करते हुए नरेंद्र घायल हो गया।


 इतना ही नहीं, उसके इलाज में भी देर की गई। किसी तरह उसे अपोलो हास्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां उसका आपरेशन करने से मामूली सुधार हुआ, लेकिन इलाज के बढ़ते खर्च के कारण परिजनों ने उसे डिस्चार्ज करा लिया। पैरालिसिस से पीडि़त नरेंद्र अब गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग केंद्र अस्पताल में भर्ती है। डाक्टरों के मुताबिक उसे रिहेबलिटेशन के लिए रखा गया है। 

अब तक इलाज पर पौने तीन लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। गनियारी हास्पिटल में उसे अन्य मरीजों से अलग आपरेशन थिएटर से लगे हुए कमरे में रखा गया है। वहां उसकी हालत शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूप से खराब है। रह-रहकर उसे चोट की वह घटना याद आ जाती है और वह सिहर उठता है। 

आपरेशन के बाद उसके गले में पाइप और पट्टा लगा है। जिसे वह बार-बार खींचने की कोशिश करता है। उसकी स्थिति पागलों जैसी हो गई है। बेड पर हो या व्हील चेयर में वह अपनी हरकत जारी रखता है। किसी भी नए आदमी को देखकर तो उसकी हालत और खराब हो जाती है, वह चीखने-चिल्लाने लगता है। पिता खुलास और चचेरा भाई वीरेंद्र उसकी देखभाल के लिए अस्पताल में हैं। उसकी गंभीर हालत को देखकर उनका भी धीरज जवाब दे देता है। वे बारी-बारी से कमरे के बाहर आकर बैठ जाते हैं। 


उनके चेहरे पर भी चिंता की लकीरें खींच गई है, क्योंकि उन्हें नरेंद्र के पहले की तरह होने का भरोसा नहीं रहा। खुलास ने कहा कि डाक्टर ने उनसे कहा है कि नरेंद्र की हालत ठीक हो जाएगी, लेकिन उसे नहीं लगता कि ये सच है। डाक्टर ने उन्हें दिलासा देने के लिए ऐसा कहा है। वह पहले की तरह कभी नहीं हो पाएगा। कुछ ऐसा ही मानना वीरेंद्र का भी है। पिछले 13-14 दिनों से वह नरेंद्र के साथ है, लेकिन वह उनसे बात नहीं कर पाता। इशारों में वह बात करता है और चिल्लाकर उन्हें बताता है कि उसे बहुत दर्द है।

 पिता और भाई चाहकर भी उसे दिलासा नहीं दे पाते। गांव गढग़ोढ़ी में मां तितर बाई को अपने बेटे की चिंता सता रही है और अपने पति से फोन पर बात करते हुए वह रो पड़ती है। खुलास अपने भाग्य को कोसते हुए भगवान से नरेंद्र को स्वस्थ करने के लिए प्रार्थना कर रहा है।

भाई वीरेंद्र और पिता खुलास
समस्या म हावन... का करन

नरेंद्र जांजगीर-चांपा जिले के सक्ती के पास ग्राम गढग़ोढ़ी का रहने वाला है। गुरुकुल से पहले वह अमलडीहा में पढ़ता था। उसके घायल होकर अपोलो में भर्ती होने से उसका परिवार बैकफुट में आ गया है। उसके गरीब परिवार को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है।

 नरेंद्र के पिता खुलास राम ने दैनिक भास्कर को समस्याग्रस्त होने की जानकारी देते हुए बेटे के घायल होने पर दुख व्यक्त किया। उसने छत्तीसगढ़ी में कहा समस्या म तो हावन, का करन...सब किस्मत के खेल हे। भगवान बने-बने नइ रहेन देत हे...। डाक्टर मन कहत हे के ओखर नरी (गला) के हड्डी टूट गय हे। 


महीनों चलेगा इलाज, किस्मत से है जिंदा

गनियारी हास्पिटल के डाक्टर और नरेंद्र के केस को शुरू से ही देख रहे डा. रमन कटारिया का कहना है कि इलाज में महीनों लग सकते हैं। अभी उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। रिहेबलिटेशन के लिए उसे लाया गया है, जहां उसकी फिजियोथेरेपी सहित ट्रीटमेंट के कुछ अन्य तरीकों को आजमाया जा रहा है। अभी जितनी रिकवरी होनी थी वह हो चुकी है, अब छह महीने से सालभर तक स्लोवर रिकवरी के चांस है।

जब यह केस उनके पास आया था तो उन्होंने ही डा. शर्मा को नरेंद्र का ट्रीटमेंट करने कहा था। उसकी हालत इतनी खराब थी कि यदि उसे सिम्स से रायपुर भेजा जाता तो उसका बचना मुश्किल था। वह जिंदा है, यह उसकी बड़ी किस्मत है। यह एक गंभीर केस है, जिसे स्टाफ गंभीरता से ले रहा है।

चल सका तो चमत्कार

नरेंद्र का आपरेशन अपोलो हास्पिटल के न्यूरो सर्जन डॉ.सुनील शर्मा ने किया है। उन्होंने दैनिक भास्कर को बताया कि नरेंद्र की रिकवरी के 99 फीसदी चांस नहीं है। उसे बेहद गंभीर हाल में अपोलो लाया गया था। उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी, जबकि गले की नस दबने के साथ ही खराब भी हो गई थी। वह छाती भी नहीं फुला पा रहा था क्योंकि उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। यह अपनी तरह का एक गंभीर केस था। उसके परिजन और गुरुकुल स्टाफ को बताया गया कि आपरेशन के बाद भी नरेंद्र ठीक हो पाएगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता, लेकिन कोशिश की जा रही है। 

उनकी सहमति से आपरेशन किया गया। आपरेशन के दौरान उसके गले की नस को दुरुस्त किया गया है। साथ ही टूट चुकी रीढ़ की हड्डी को सपोर्ट दिया गया है। आपरेशन के बाद उसकी हालत में पहले से कुछ सुधार तो हुआ है, लेकिन चोट इतनी अधिक है कि आगे कुछ कहा नहीं जा सकता। वह शायद ही सामान्य लोगों की तरह अपना जीवन जी सके। अगर वह अपने पैरों पर चल सका तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।

इनका कहना है...
 

ऐसा नहीं है कि जिम्नास्ट के जानकार नहीं हैं। कई खिलाडिय़ों ने राज्य स्तरीय स्पर्धा में अपना जौहर दिखाया है। स्पोट्र्स में चोट लगना आम बात है। नरेंद्र के इलाज में विभाग और गुरुकुल स्टाफ ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब उसकी हालत ठीक है और उसका फिजियाथैरेपी होना है।
सीएल जायसवाल, संयुक्त संचालक, आदिम जाति विकास विभाग, बिलासपुर

मैं मानती हूं कि गुरुकुल में जिम्नास्ट का कोई स्पेशल कोच नहीं है, लेकिन सालों से बच्चे इसी तरह व्यायाम शिक्षक की निगरानी में प्रेक्टिस कर रहे हैं। उनके कार्यकाल में कभी कोई घटना नहीं हुई। नरेंद्र का गिरना एक सामान्य घटना है। मुझे इस बारे में ज्यादा नहीं पता इसलिए बेहतर होगा आप व्यायाम शिक्षक सुशील मिश्रा से बात करें।
प्रसन्ना बरला, प्राचार्य, गुरुकुल पेंड्रारो


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नरेंद्र की पूरी कहानी 29 सितंबर,1अक्टूबर को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई है।पेंड्रा एसडीएम सारांश मितर ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए है। देखना होगा कि नरेंद्र को न्याय मिलता है या एक बार फिर प्रशासन दोषियों पर कार्रवाई करने की बजाय उन्हें बचा लेगा।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

उतर गया जेनेरिक का जिन्न




सुनील शर्मा, बिलासपुर

जेनेरिक दवाइयों के जरिए महंगे इलाज को सस्ता बनाने का सरकारी दावा फेल होता नजर आ रहा है। राज्य में जेनेरिक दवा के नाम पर जेनेरिक-ब्रांडेड दवाओं की बिक्री की जा रही है। इनके एवज में दोगुने से अधिक कीमत ली जा रही है। इतना ही नहीं, सरकारी अस्पताल के मरीजों को झांसा देने के लिए रेडक्रास मेडिकल शॉप द्वारा इन दवाओं पर 40 फीसदी तक की छूट दी जा रही है।

 दवा में इतनी अधिक छूट मिलने से लोगों को यह पूरा माजरा समझ में नहीं आ रहा है। हमने बिलासपुर के रेडक्रास मेडिकल शॉप में पड़ताल की तो जेनेरिक दवा के नाम पर हो रही लूट का खुलासा हुआ। 

फिल्म अभिनेता आमिर खान के शो ‘सत्यमेव जयते’ के एक एपिसोड के बाद पूरे देश में मरीजों के लिए सस्ती दवाओं के रूप में जेनेरिक दवाइयां बेचने की मांग शुरू हुई है। इसी दौरान छत्तीसगढ़ में भी राज्य सरकार ने अंबिकापुर में जन औषधि केंद्र खोलकर वहां पहले से ही सस्ती दवा बिकने की बात प्रचारित की। लेकिन वहां जेनेरिक के नाम पर ब्रांडेड कंपनियों की दवा बेचने की शिकायत मिली। 

पिछले दिनों  जिला अस्पताल बिलासपुर  के  रेडक्रास मेडिकल शॉप में एक डाक्टर की पर्ची के आधार पर तीन दवाएं सिप्रोफ्लेक्सिन, डाइक्लोफिनेक और सिट्रेजीन मांगने पर इसी फार्मूले की सिप्रोडेक, रिएक्टिन और इंस्टेजिन टेबलेट दी गई। इन सभी को दुकानदार ने जेनेरिक दवा बताया। सिप्रोडेक-50 रुपए, रिएक्टिन 13.86 रुपए और इंस्टेजिन 20 रुपए सहित कुल 80 रुपए दुकानदार ने लिए। जबकि रैपर पर इनकी कीमत क्रमश: 64.02, 19.35 और 32 रुपए थी। दुकानदार ने 40 फीसदी छूट देने की बात कही। डिस्काउंट की आड़ में दुकानदार ने कई गुना अधिक कीमत की दवा थमा दी। हालांकि उसने बिल क्रमांक डीए-65618 में डिस्काउंट का जिक्र भी किया, लेकिन इस छूट के पीछे की असली कहानी कुछ और ही है। 

स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल दवाइयों का नया स्टाक नहीं आने का हवाला देते हुए इस मामले को अलग बता रहे हैं। आगे वे कहते हैं कि वर्तमान में रेडक्रास मेडिकल शॉप में पुराना स्टाक है। नया स्टाक आने पर नए सिरे से दर तय कर सस्ती दर पर जेनेरिक दवाइयां मरीजों को उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाएगा।

ऐसे ली जा रही अधिक कीमत

0 सरकार के ही जन औषधि केंद्र की सूची के मुताबिक सिप्रोफ्लेक्सिन 500 एमजी के 100 जेनेरिक टेबलेट की कीमत 215 रुपए है, जबकि दुकानदार ने जेनेरिक-ब्रांडेड के सिर्फ 10 टेबलेट देकर 50 रुपए ले लिए। तय दर के मुताबिक ये टेबलेट 21 रुपए के थे, यानी जेनेरिक की जो टेबलेट 2.15 रुपए में मिलती, वह 5 रुपए में बेची जा रही है।

0 डाइक्लोफिनेक सोडियम आईपी 50 एमजी की बात करें तो इसके 100 जेनेरिक टेबलेट का मूल्य 21 रुपए है और इसी फार्मूले की 10 टेबलेट देकर रेडक्रास मेडिकल शॉप ने 13.86 रुपए लिए, यानी कई गुना अधिक।
0 सिट्रेजीन की 100 जेनेरिक टेबलेट 99 रुपए में मिलती है, जबकि इसके 10 टेबलेट के लिए ही 20 रुपए लिए गए। 

...तो ब्रांडेड दवा ही सस्ती

जेनेरिक दवा के नाम पर जेनेरिक-ब्रांडेड दवा बेचकर लोगों को बेवकूफ ही बनाया जा रहा है। जानकारों के मुताबिक जेनेरिक ब्रांडेड के मुकाबले ब्रांडेड कंपनियों की दवाइयां सस्ती हैं। सिप्रोफ्लेक्सिन 500 एमजी में जीडस कंपनी के सिपोडेटक की कीमत 40.50 रुपए, लेबिन लेप्स कंपनी के सिपोलेब की 48 रुपए, नेटको के सिप्रोमेट की 45 रुपए, प्रोफिक के सिप्रोटम की 47 रुपए और मैक्लियोड्स कंपनी के कोफ्लाक्स के 10 टेबलेट की कीमत 39.68 रुपए है।

 इसी फार्मूले की जेनेरिक दवा देने की बात कहते हुए रेडक्रास मेडिकल शॉप ने 50 रुपए लिए, वह भी 40 फीसदी डिस्काउंट के साथ। जिस सिट्रेजीन फार्मूले की टेबलेट के लिए 20 रुपए लिए गए, उसकी ब्रांडेड कंपनी रिलायंस के सेटटॉप के टेबलेट की कीमत 9.50 रुपए, पिल के सिटीजेड की 16, बायो-माइक्रान के सेट्रिट की 14.90, इस्ट-वेस्ट के सेट्राजोल की 13 और भारतीय कंपनी खंडेलवाल के सेटनेज की कीमत सिर्फ 15 रुपए है। डाईक्लोफिनेक सोडियम आईपी 50 एमजी की ब्रांडेड दवा सिटाडेल कंपनी के डेलबिटोल के 10 टेबलेट की कीमत 7.42 रुपए, मूरेपेन के डिक्टो-डीटी की 7.50 तो इसी कंपनी के डाइक्लो की 9, जेबी केमिकल्स के ड्राइक्लोरेन की 10.92, इमक्योर के डाइक्लोमूव की कीमत 15 रुपए है। 

खोखले हुए दावे, मची है लूट

18 जून को रायपुर में हुई छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण विकास प्राधिकरण की पहली बैठक में मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने प्रदेश के सभी सरकारी जिला अस्पतालों में रेडक्रास सोसायटी की दवा दुकानों में शत-प्रतिशत जेनेरिक दवाइयां बेचने की बात कही थी। उन्होंने 15 दिनों के भीतर सभी रेडक्रास मेडिकल शॉप में जेनेरिक दवा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। अंबिकापुर के जिला अस्पताल में जेनेरिक दवा बिकने से मरीजों को लाभ होने का दावा किया गया था, लेकिन राज्य के दूसरे सबसे बड़े शहर और स्वास्थ्य मंत्री के गृह नगर में ही जेनेरिक दवा के नाम पर मरीजों से कई गुना अधिक कीमत ली जा रही है। 

ये है जेनेरिक दवा

ऐसी दवाएं जो बिना किसी प्रचार-प्रसार के अपने मूल केमिकल के नाम से जानी और बेची जाती हैं, उन्हें जेनेरिक दवा कहा जाता है। ये दवाएं किसी कंपनी से संबंधित नहीं होती, न ही इन पर किसी का पेटेंट राइट होता है। जेनेरिक दवाइयां जिस देश में बेची या बांटी जाती हैं, उस पर नियंत्रण वहां की सरकार का होता है। जेनेरिक दवाइयां दवा निर्माता के नाम से जानी जाती हैं और यह ब्रांडेड दवाओं से 30 से 40 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं। 

इलाज में प्रभावी है जेनेरिक दवा

डॉक्टरों के अनुसार सस्ती और सर्वश्रेष्ठ होने के कारण जेनेरिक दवाइयां इलाज में काफी प्रभावी होती हैं। इनकी कीमत ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले इसलिए कम होती हैं, क्योंकि उनका निर्माण या उत्पादन केवल फार्मूलेशन के आधार पर किया जाता है। जेनेरिक दवाओं में सारे तत्व (कम्पोजिशन) मौलिक दवाओं के समान होते हैं और ये विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक दवाओं के मानदंडों के अनुरूप होती हैं। ब्रांडेड दवा में अनुसंधान खर्च, प्रचार खर्च आदि का कमीशन जोडऩे के कारण उनकी कीमत सामान्य से अधिक हो जाती है। 

अक्टूबर से फ्री, अभी लूट

देशभर के शासकीय अस्पतालों में मरीजों को इस वर्ष अक्टूबर से मुफ्त में दवा देने की कोशिश केंद्र स्तर पर शुरू हो चुकी है। योजना आयोग ने इस मद में 2012-13 वित्तीय वर्ष के लिए 100 करोड़ रुपए दिए हैं। स्वास्थ्य योजनाओं के मद्देनजर मुफ्त दवा देने की योजना को स्वास्थ्य के क्षेत्र में ‘रियल गेम चेंजर’ के तौर पर देखा जा रहा है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत इस कार्यक्रम पर 28560 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इतने में देश की कुल आबादी के 22 प्रतिशत लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ ले सकते हैं। सरकार भले ही मुफ्त में दवा देने का दावा कर रही है, लेकिन वर्तमान में सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवा के नाम पर लूट मची है। इन अस्पतालों में मरीजों को चोट पर बांधने वाली पट्टी तक के लिए भटकना पड़ता है और सस्ती, डिस्काउंट वाली दवा देने के नाम पर उन्हें रेडक्रास मेडिकल शॉप पर लूटा जा रहा है। 



गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

छत्तीसगढ़ में बैगा महिलाओं की नसबंदी...!

सुनील शर्मा 
 सुकरिया ने गरीबी के कारण कराई नसबंदी
छत्तीसगढ़ में बैगा आदिवासियों की नसबंदी के चौंकाने वाले मामले सामने आये है. राज्य में प्रतिबंध के बाद भी बैगा आदिवासियों की नसबंदी हो रही है और यह प्रतिबंधित कार्य सरकारी महकमे के शासकीय शिविरों और स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहा है.

गरीबी और अशिक्षा के जाल में जकड़े और विकास में पिछड़े अधिकांश बैगा परिवार नहीं जानते कि उनके लिए नसबंदी प्रतिबंधित है लेकिन स्वास्थ्य विभाग, जिसे इस संबंध में स्पष्ट निर्देश हैं,वह जान—समझकर इस पर रोक नहीं लगा रहा है.

बैगाओं की घटती जनसंख्या के कारण केंद्र सरकार ने 90 के दशक में एक आदेश के तहत छत्तीसगढ़ की पांच संरक्षित जनजातियों बैगा अबुझमाड़िया, बिरहोर, पहाड़ी कोरवा और कमार की नसबंदी को प्रतिबंधित कर दिया है.लेकिन इस प्रतिबंध का कोई भी असर नहीं हुआ है.

हाल ही में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर,कबीरधाम और नवगठित मुंगेली जिले में ऐसे कई मामले प्रकाश में आये हैं,जिसमें जान बूझकर बैगा महिलाओं की नसंबदी करा दी गई है. सरकारी अमले का है कि नवंबर 2011 में एक मामला मिलने के बाद इस पर पूरी तरह से कड़ाई बरती जा रही है .इसके बाद किसी भी बैगा की नसबंदी नहीं हुई है. मुंगेली के कलेक्टर त्रिलोक महावर का कहना है कि जब से मुंगेली जिला बना है, उनकी जानकारी में एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया है. लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है.

बैगा बहुल लोरमी के खंड चिकिस्ता अधिकारी डाक्टर सीएम पाटले बताते हैं कि पिछले कई वर्षों से सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में बैगा आदिवासियों की नसबंदी होती रही है लेकिन उनके आने के बाद ऐसा नहीं हो रहा है. श्री पाटले का कहना है कि नवंबर 2011 में मेरे चार्ज लेने के दूसरे ही दिन एक बैगा महिला की नसबंदी का मामला आया था लेकिन उसके बाद मैंने इस पूरी तरह रोक लगा दी है. इस संबंध में सभी को सख्त हिदायत भी दी गई है.

काहे का प्रतिबंध
 एक महीने पहले नसबंदी कराने वाली कमला बैगा.
डा. पाटले भले ही दावा कर रहे हैं कि अब किसी भी बैगा की नसबंदी नहीं हो रही है लेकिन सूदूरवर्ती गांवों में घूमने के बाद यह दावा खोखला साबित हो जाता है.मुंगेली जिले की डूड़वाडोंगरी की सुकरिया बैगा ने पिछले महीने इलाके की कुछ महिलाओं के साथ डिंडौरी जिले के गोरखपुर स्वास्थ्य केंद्र में नसबंदी कराई है.

सुकरिया कहती है—''पहले वह नसबंदी के लिए लोरमी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गई थी लेकिन जब वहां मना कर दिया गया तो वह फगनी और अन्य महिलाओं के साथ गोरखपुर चली गई. वहां आपरेशन के बाद एक हजार रुपए मिले और वहां खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम भी था.सुकरिया के पति बनिया बताते हैं कि उनकी पत्नी स्वास्थ्य विभाग की गाड़ी से गई थी.वहां से उन्हें लेने के लिए सूरजभान नामक आदमी भी आया था जो स्वास्थ्य कार्यकर्ता का पति है.

थोड़ी और पूछताछ करने पर पता चला कि सूरजभान अपनी स्वास्थ्य कार्यकर्ता पत्नी का लक्ष्य पूरा करने के लिए डूड़वाडोंगरी की फगनी के साथ मिलकर बैगा महिलाओं को नसबंदी के लिए मध्यप्रद्रेश के डिंडौरी जिले ले जाता है फगनी बैगा ने दस साल पहले नसबंदी कराई थी और तब से वह जैसे नसबंदी कराने वाली बैगा महिलाओं की आदर्श बन गई है.

किसी भी नसबंदी करानी हो तो वह फगनी से संपर्क करती है और फगनी खुद भी ऐसे महिलाओं की खोज करती है.फगनी बताती है कि उसके पति संचू बैगा ने उसे चेतावनी दी थी कि वह यदि नसबंदी नहीं कराएगी तो वह उसे छोड़ देगा. रिश्ता टूटने के डर से उसने नसबंदी कराई.

फगनी बताती है कि नसबंदी कराने वाली महिलाओं को बतौर प्रोत्साहन राशि 600 रुपए और उन्हें प्रोत्साहित करने वाले को 150 रुपए तो मध्यप्रदेश हितग्राही महिला को एक हजार और प्रोत्साहित करने वाले को चार सौ रुपए प्राप्त होते हैं.

महिलाओं को नसबंदी के लिए प्रेरित करती है फगनी बैगा.
फगनी कहती है कि बैगा परिवार बेहद गरीब है. अशिक्षा के कारण परिवार में बच्चों की संख्या बढ़ती जाती है लेकिन जब वे बड़े होते हैं तो उनके पालन-पोषण की समस्या होती है.इसलिए अधिकतर परिवार नसबंदी कराना चाहते हैं ताकि कम बच्चों का पालन-पोषण अच्छे से हो सके.

पिछले महीने मार्च में फगनी के साथ मंजूरहा की कमला पति जगतराम बैगा, शांति बैगा पति चैन सिंह बैगा, किसानीन पति पनका बैगा, बिराजो पति मेहतर बैगा और डूड़वाडोंगरी की लमिया पति विश्राम बैगा और सुकरिया पति बनिया बैगा और चकदा की कुंती बाई पति जेठू राम बैगा और मंगली पति लमतू बैगा मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के गोरखपुर नसबंदी कराने गये थे. इन सभी ने गरीबी को प्रमुख वजह बताया है.

डुड़वाडोंगरी की उजियारो पति बैसाखू बैगा और मंजूरहा की बयन पति बाबूलाल बैगा ने पिछले साल लोरमी में नसबंदी करवाई थी.बयन कहती है कि सरकार ने नसबंदी पर तो प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन हमारे विकास की उसे चिंता नहीं है. बच्चे पैदा तो हो जाएंगे लेकिन उनका पालन-पोषण नहीं हो सकता.

मंजूरहा गांव की कमला बैगा के तीन बच्चे पहले से ही हैं. जब चौंथा बच्चा पैदा हुआ तो घर की हालत देखते हुये उन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही नसबंदी का ऑपरेशन करा लिया. कमला बैगा कहती हैं- “बैगाओं की नसबंदी पर रोक का हमें पता है लेकिन नसबंदी न करायें तो इतने बड़े परिवार को पालना संभव नहीं है.”

यह रिपोर्ट 5 अप्रैल 2012 को दैनिक छत्तीसगढ़ के मुख्य पृष्ठ पर बतौर बैनर प्रकाशित हो चुकी है .