बुधवार, 25 जुलाई 2012

उतर गया जेनेरिक का जिन्न




सुनील शर्मा, बिलासपुर

जेनेरिक दवाइयों के जरिए महंगे इलाज को सस्ता बनाने का सरकारी दावा फेल होता नजर आ रहा है। राज्य में जेनेरिक दवा के नाम पर जेनेरिक-ब्रांडेड दवाओं की बिक्री की जा रही है। इनके एवज में दोगुने से अधिक कीमत ली जा रही है। इतना ही नहीं, सरकारी अस्पताल के मरीजों को झांसा देने के लिए रेडक्रास मेडिकल शॉप द्वारा इन दवाओं पर 40 फीसदी तक की छूट दी जा रही है।

 दवा में इतनी अधिक छूट मिलने से लोगों को यह पूरा माजरा समझ में नहीं आ रहा है। हमने बिलासपुर के रेडक्रास मेडिकल शॉप में पड़ताल की तो जेनेरिक दवा के नाम पर हो रही लूट का खुलासा हुआ। 

फिल्म अभिनेता आमिर खान के शो ‘सत्यमेव जयते’ के एक एपिसोड के बाद पूरे देश में मरीजों के लिए सस्ती दवाओं के रूप में जेनेरिक दवाइयां बेचने की मांग शुरू हुई है। इसी दौरान छत्तीसगढ़ में भी राज्य सरकार ने अंबिकापुर में जन औषधि केंद्र खोलकर वहां पहले से ही सस्ती दवा बिकने की बात प्रचारित की। लेकिन वहां जेनेरिक के नाम पर ब्रांडेड कंपनियों की दवा बेचने की शिकायत मिली। 

पिछले दिनों  जिला अस्पताल बिलासपुर  के  रेडक्रास मेडिकल शॉप में एक डाक्टर की पर्ची के आधार पर तीन दवाएं सिप्रोफ्लेक्सिन, डाइक्लोफिनेक और सिट्रेजीन मांगने पर इसी फार्मूले की सिप्रोडेक, रिएक्टिन और इंस्टेजिन टेबलेट दी गई। इन सभी को दुकानदार ने जेनेरिक दवा बताया। सिप्रोडेक-50 रुपए, रिएक्टिन 13.86 रुपए और इंस्टेजिन 20 रुपए सहित कुल 80 रुपए दुकानदार ने लिए। जबकि रैपर पर इनकी कीमत क्रमश: 64.02, 19.35 और 32 रुपए थी। दुकानदार ने 40 फीसदी छूट देने की बात कही। डिस्काउंट की आड़ में दुकानदार ने कई गुना अधिक कीमत की दवा थमा दी। हालांकि उसने बिल क्रमांक डीए-65618 में डिस्काउंट का जिक्र भी किया, लेकिन इस छूट के पीछे की असली कहानी कुछ और ही है। 

स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल दवाइयों का नया स्टाक नहीं आने का हवाला देते हुए इस मामले को अलग बता रहे हैं। आगे वे कहते हैं कि वर्तमान में रेडक्रास मेडिकल शॉप में पुराना स्टाक है। नया स्टाक आने पर नए सिरे से दर तय कर सस्ती दर पर जेनेरिक दवाइयां मरीजों को उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाएगा।

ऐसे ली जा रही अधिक कीमत

0 सरकार के ही जन औषधि केंद्र की सूची के मुताबिक सिप्रोफ्लेक्सिन 500 एमजी के 100 जेनेरिक टेबलेट की कीमत 215 रुपए है, जबकि दुकानदार ने जेनेरिक-ब्रांडेड के सिर्फ 10 टेबलेट देकर 50 रुपए ले लिए। तय दर के मुताबिक ये टेबलेट 21 रुपए के थे, यानी जेनेरिक की जो टेबलेट 2.15 रुपए में मिलती, वह 5 रुपए में बेची जा रही है।

0 डाइक्लोफिनेक सोडियम आईपी 50 एमजी की बात करें तो इसके 100 जेनेरिक टेबलेट का मूल्य 21 रुपए है और इसी फार्मूले की 10 टेबलेट देकर रेडक्रास मेडिकल शॉप ने 13.86 रुपए लिए, यानी कई गुना अधिक।
0 सिट्रेजीन की 100 जेनेरिक टेबलेट 99 रुपए में मिलती है, जबकि इसके 10 टेबलेट के लिए ही 20 रुपए लिए गए। 

...तो ब्रांडेड दवा ही सस्ती

जेनेरिक दवा के नाम पर जेनेरिक-ब्रांडेड दवा बेचकर लोगों को बेवकूफ ही बनाया जा रहा है। जानकारों के मुताबिक जेनेरिक ब्रांडेड के मुकाबले ब्रांडेड कंपनियों की दवाइयां सस्ती हैं। सिप्रोफ्लेक्सिन 500 एमजी में जीडस कंपनी के सिपोडेटक की कीमत 40.50 रुपए, लेबिन लेप्स कंपनी के सिपोलेब की 48 रुपए, नेटको के सिप्रोमेट की 45 रुपए, प्रोफिक के सिप्रोटम की 47 रुपए और मैक्लियोड्स कंपनी के कोफ्लाक्स के 10 टेबलेट की कीमत 39.68 रुपए है।

 इसी फार्मूले की जेनेरिक दवा देने की बात कहते हुए रेडक्रास मेडिकल शॉप ने 50 रुपए लिए, वह भी 40 फीसदी डिस्काउंट के साथ। जिस सिट्रेजीन फार्मूले की टेबलेट के लिए 20 रुपए लिए गए, उसकी ब्रांडेड कंपनी रिलायंस के सेटटॉप के टेबलेट की कीमत 9.50 रुपए, पिल के सिटीजेड की 16, बायो-माइक्रान के सेट्रिट की 14.90, इस्ट-वेस्ट के सेट्राजोल की 13 और भारतीय कंपनी खंडेलवाल के सेटनेज की कीमत सिर्फ 15 रुपए है। डाईक्लोफिनेक सोडियम आईपी 50 एमजी की ब्रांडेड दवा सिटाडेल कंपनी के डेलबिटोल के 10 टेबलेट की कीमत 7.42 रुपए, मूरेपेन के डिक्टो-डीटी की 7.50 तो इसी कंपनी के डाइक्लो की 9, जेबी केमिकल्स के ड्राइक्लोरेन की 10.92, इमक्योर के डाइक्लोमूव की कीमत 15 रुपए है। 

खोखले हुए दावे, मची है लूट

18 जून को रायपुर में हुई छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण विकास प्राधिकरण की पहली बैठक में मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने प्रदेश के सभी सरकारी जिला अस्पतालों में रेडक्रास सोसायटी की दवा दुकानों में शत-प्रतिशत जेनेरिक दवाइयां बेचने की बात कही थी। उन्होंने 15 दिनों के भीतर सभी रेडक्रास मेडिकल शॉप में जेनेरिक दवा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। अंबिकापुर के जिला अस्पताल में जेनेरिक दवा बिकने से मरीजों को लाभ होने का दावा किया गया था, लेकिन राज्य के दूसरे सबसे बड़े शहर और स्वास्थ्य मंत्री के गृह नगर में ही जेनेरिक दवा के नाम पर मरीजों से कई गुना अधिक कीमत ली जा रही है। 

ये है जेनेरिक दवा

ऐसी दवाएं जो बिना किसी प्रचार-प्रसार के अपने मूल केमिकल के नाम से जानी और बेची जाती हैं, उन्हें जेनेरिक दवा कहा जाता है। ये दवाएं किसी कंपनी से संबंधित नहीं होती, न ही इन पर किसी का पेटेंट राइट होता है। जेनेरिक दवाइयां जिस देश में बेची या बांटी जाती हैं, उस पर नियंत्रण वहां की सरकार का होता है। जेनेरिक दवाइयां दवा निर्माता के नाम से जानी जाती हैं और यह ब्रांडेड दवाओं से 30 से 40 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं। 

इलाज में प्रभावी है जेनेरिक दवा

डॉक्टरों के अनुसार सस्ती और सर्वश्रेष्ठ होने के कारण जेनेरिक दवाइयां इलाज में काफी प्रभावी होती हैं। इनकी कीमत ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले इसलिए कम होती हैं, क्योंकि उनका निर्माण या उत्पादन केवल फार्मूलेशन के आधार पर किया जाता है। जेनेरिक दवाओं में सारे तत्व (कम्पोजिशन) मौलिक दवाओं के समान होते हैं और ये विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक दवाओं के मानदंडों के अनुरूप होती हैं। ब्रांडेड दवा में अनुसंधान खर्च, प्रचार खर्च आदि का कमीशन जोडऩे के कारण उनकी कीमत सामान्य से अधिक हो जाती है। 

अक्टूबर से फ्री, अभी लूट

देशभर के शासकीय अस्पतालों में मरीजों को इस वर्ष अक्टूबर से मुफ्त में दवा देने की कोशिश केंद्र स्तर पर शुरू हो चुकी है। योजना आयोग ने इस मद में 2012-13 वित्तीय वर्ष के लिए 100 करोड़ रुपए दिए हैं। स्वास्थ्य योजनाओं के मद्देनजर मुफ्त दवा देने की योजना को स्वास्थ्य के क्षेत्र में ‘रियल गेम चेंजर’ के तौर पर देखा जा रहा है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत इस कार्यक्रम पर 28560 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इतने में देश की कुल आबादी के 22 प्रतिशत लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ ले सकते हैं। सरकार भले ही मुफ्त में दवा देने का दावा कर रही है, लेकिन वर्तमान में सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवा के नाम पर लूट मची है। इन अस्पतालों में मरीजों को चोट पर बांधने वाली पट्टी तक के लिए भटकना पड़ता है और सस्ती, डिस्काउंट वाली दवा देने के नाम पर उन्हें रेडक्रास मेडिकल शॉप पर लूटा जा रहा है। 



गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

छत्तीसगढ़ में बैगा महिलाओं की नसबंदी...!

सुनील शर्मा 
 सुकरिया ने गरीबी के कारण कराई नसबंदी
छत्तीसगढ़ में बैगा आदिवासियों की नसबंदी के चौंकाने वाले मामले सामने आये है. राज्य में प्रतिबंध के बाद भी बैगा आदिवासियों की नसबंदी हो रही है और यह प्रतिबंधित कार्य सरकारी महकमे के शासकीय शिविरों और स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहा है.

गरीबी और अशिक्षा के जाल में जकड़े और विकास में पिछड़े अधिकांश बैगा परिवार नहीं जानते कि उनके लिए नसबंदी प्रतिबंधित है लेकिन स्वास्थ्य विभाग, जिसे इस संबंध में स्पष्ट निर्देश हैं,वह जान—समझकर इस पर रोक नहीं लगा रहा है.

बैगाओं की घटती जनसंख्या के कारण केंद्र सरकार ने 90 के दशक में एक आदेश के तहत छत्तीसगढ़ की पांच संरक्षित जनजातियों बैगा अबुझमाड़िया, बिरहोर, पहाड़ी कोरवा और कमार की नसबंदी को प्रतिबंधित कर दिया है.लेकिन इस प्रतिबंध का कोई भी असर नहीं हुआ है.

हाल ही में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर,कबीरधाम और नवगठित मुंगेली जिले में ऐसे कई मामले प्रकाश में आये हैं,जिसमें जान बूझकर बैगा महिलाओं की नसंबदी करा दी गई है. सरकारी अमले का है कि नवंबर 2011 में एक मामला मिलने के बाद इस पर पूरी तरह से कड़ाई बरती जा रही है .इसके बाद किसी भी बैगा की नसबंदी नहीं हुई है. मुंगेली के कलेक्टर त्रिलोक महावर का कहना है कि जब से मुंगेली जिला बना है, उनकी जानकारी में एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया है. लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है.

बैगा बहुल लोरमी के खंड चिकिस्ता अधिकारी डाक्टर सीएम पाटले बताते हैं कि पिछले कई वर्षों से सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में बैगा आदिवासियों की नसबंदी होती रही है लेकिन उनके आने के बाद ऐसा नहीं हो रहा है. श्री पाटले का कहना है कि नवंबर 2011 में मेरे चार्ज लेने के दूसरे ही दिन एक बैगा महिला की नसबंदी का मामला आया था लेकिन उसके बाद मैंने इस पूरी तरह रोक लगा दी है. इस संबंध में सभी को सख्त हिदायत भी दी गई है.

काहे का प्रतिबंध
 एक महीने पहले नसबंदी कराने वाली कमला बैगा.
डा. पाटले भले ही दावा कर रहे हैं कि अब किसी भी बैगा की नसबंदी नहीं हो रही है लेकिन सूदूरवर्ती गांवों में घूमने के बाद यह दावा खोखला साबित हो जाता है.मुंगेली जिले की डूड़वाडोंगरी की सुकरिया बैगा ने पिछले महीने इलाके की कुछ महिलाओं के साथ डिंडौरी जिले के गोरखपुर स्वास्थ्य केंद्र में नसबंदी कराई है.

सुकरिया कहती है—''पहले वह नसबंदी के लिए लोरमी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गई थी लेकिन जब वहां मना कर दिया गया तो वह फगनी और अन्य महिलाओं के साथ गोरखपुर चली गई. वहां आपरेशन के बाद एक हजार रुपए मिले और वहां खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम भी था.सुकरिया के पति बनिया बताते हैं कि उनकी पत्नी स्वास्थ्य विभाग की गाड़ी से गई थी.वहां से उन्हें लेने के लिए सूरजभान नामक आदमी भी आया था जो स्वास्थ्य कार्यकर्ता का पति है.

थोड़ी और पूछताछ करने पर पता चला कि सूरजभान अपनी स्वास्थ्य कार्यकर्ता पत्नी का लक्ष्य पूरा करने के लिए डूड़वाडोंगरी की फगनी के साथ मिलकर बैगा महिलाओं को नसबंदी के लिए मध्यप्रद्रेश के डिंडौरी जिले ले जाता है फगनी बैगा ने दस साल पहले नसबंदी कराई थी और तब से वह जैसे नसबंदी कराने वाली बैगा महिलाओं की आदर्श बन गई है.

किसी भी नसबंदी करानी हो तो वह फगनी से संपर्क करती है और फगनी खुद भी ऐसे महिलाओं की खोज करती है.फगनी बताती है कि उसके पति संचू बैगा ने उसे चेतावनी दी थी कि वह यदि नसबंदी नहीं कराएगी तो वह उसे छोड़ देगा. रिश्ता टूटने के डर से उसने नसबंदी कराई.

फगनी बताती है कि नसबंदी कराने वाली महिलाओं को बतौर प्रोत्साहन राशि 600 रुपए और उन्हें प्रोत्साहित करने वाले को 150 रुपए तो मध्यप्रदेश हितग्राही महिला को एक हजार और प्रोत्साहित करने वाले को चार सौ रुपए प्राप्त होते हैं.

महिलाओं को नसबंदी के लिए प्रेरित करती है फगनी बैगा.
फगनी कहती है कि बैगा परिवार बेहद गरीब है. अशिक्षा के कारण परिवार में बच्चों की संख्या बढ़ती जाती है लेकिन जब वे बड़े होते हैं तो उनके पालन-पोषण की समस्या होती है.इसलिए अधिकतर परिवार नसबंदी कराना चाहते हैं ताकि कम बच्चों का पालन-पोषण अच्छे से हो सके.

पिछले महीने मार्च में फगनी के साथ मंजूरहा की कमला पति जगतराम बैगा, शांति बैगा पति चैन सिंह बैगा, किसानीन पति पनका बैगा, बिराजो पति मेहतर बैगा और डूड़वाडोंगरी की लमिया पति विश्राम बैगा और सुकरिया पति बनिया बैगा और चकदा की कुंती बाई पति जेठू राम बैगा और मंगली पति लमतू बैगा मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के गोरखपुर नसबंदी कराने गये थे. इन सभी ने गरीबी को प्रमुख वजह बताया है.

डुड़वाडोंगरी की उजियारो पति बैसाखू बैगा और मंजूरहा की बयन पति बाबूलाल बैगा ने पिछले साल लोरमी में नसबंदी करवाई थी.बयन कहती है कि सरकार ने नसबंदी पर तो प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन हमारे विकास की उसे चिंता नहीं है. बच्चे पैदा तो हो जाएंगे लेकिन उनका पालन-पोषण नहीं हो सकता.

मंजूरहा गांव की कमला बैगा के तीन बच्चे पहले से ही हैं. जब चौंथा बच्चा पैदा हुआ तो घर की हालत देखते हुये उन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही नसबंदी का ऑपरेशन करा लिया. कमला बैगा कहती हैं- “बैगाओं की नसबंदी पर रोक का हमें पता है लेकिन नसबंदी न करायें तो इतने बड़े परिवार को पालना संभव नहीं है.”

यह रिपोर्ट 5 अप्रैल 2012 को दैनिक छत्तीसगढ़ के मुख्य पृष्ठ पर बतौर बैनर प्रकाशित हो चुकी है .

मंगलवार, 20 मार्च 2012

विस्थापितों के साथ धोखा हुआ है


अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघों को बचाने के नाम पर वहां सैकड़ों सालों से रहने वाले बैगा आदिवासियों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों को हटाने के नाम पर पिछले 2 सालों में तमाम नियम कायदे और कानून को ताक पर रख कर वन विभाग का जो जंगल राज चल रहा है, उसने इन बैगा आदिवासियों के सामने जीवन-मरन का प्रश्न पैदा कर दिया है. पुनर्वास के नाम पर वन विभाग ने बैगा आदिवासियों की जिंदगी जानवरों-सी कर दी है.इस पूरे मामले पर सुनील शर्मा
ने एक लंबी रिपोर्ट लिखी है जो पहले ही दो किस्तों में छप चुकी है...पेश है तीसरी किस्त... 

वन विभाग के अफसर ही क्यों, विभाग के मंत्री भी यहां का दौरा कर चुके हैं और उन्हें विस्थापन की तारीफ करते हुए इसे देश का सबसे अच्छा विस्थापन बताया था लेकिन जल्दा के चमरू का तो कुछ और ही कहना है-'' उसेंडी सर जब आये थे तो उन्होंने अधूरे काम पूरे कराने का वादा किया था लेकिन आज तक गांव में स्कूल भवन, अस्पताल, आंगनबाड़ी केंद्र नहीं बना. उन्होंने हल के लिए भैंसा देने की बात कहीं थी. भैसा की जगह पड़वा दिया गया, जो हल खींचने के योग्य नहीं था और उसमें से एक पड़वा तो कुछ ही दिनों बाद मर भी गया. तीन हजार में जमीन की ट्रेक्टर से जुताई करवाई पर अनाज भी उतना नहीं हुआ कि उसे परिवार का एक सदस्य भी साल भर खा सके. हमारे साथ धोखा हुआ है.''

इस गांव में समस्याओं का अंबार लगा है. इतवारी कुछ समझदारी की बातें करते हैं. वे कहते हैं-'' वैसे तो यहां कई परेशानियां है लेकिन अगर कोई दूर ही नहीं करना चाहे तो वह कैसे दूर होगी.” 

वन विभाग के अफसरों की पोल खोलते हुए वे कहते हैं कि यहां आरक्षित भूमि को खेती की जमीन बताकर ग्रामीणों को दिया गया है और खेत क्या वह जमीन के कुछ टुकड़े हैं जिसमें पेड़ और पत्थर है. गांव के सभी 74 परिवारों को भैसा जोड़ी मिलना था लेकिन 24  को आज तक नहीं मिला, जिन्हें मिला उन्हें भैंसा की जगह पड़वा दिया जिनमें से कइयों की मौत हो चुकी हैं. विस्थापितों ने मामले की शिकायत एसपी से की है लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

 गांव के मुखिया मरहूराम बताते हैं-''हमारे इलाके के रेंजर वर्मा जी को सब मालूम हैं. हमें तो ठगा गया है. भला दस लाख रुपए जैसा हुआ क्या है.'' वह बोलते-बोलते भावुक हो जाते हैं- ''हम अपने पुराने गांव से अपना देवी-देवता भी तो नहीं ला पाये हैं, उनका आशीर्वाद अब हमारे साथ नहीं है...शायद यही कारण है कि हमें ये दिन देखने पड़ रहे हैं. हमारे पास अब न हमारे देवता है और न पूजा स्थल है. देवताओं का प्रकोप हमें चैन से रहने नहीं दे रहा है.''

तीन में न तेरह में
राजीव गांधी जलाशय (खुड़िया) जाने वाले मार्ग पर दायीं तरफ कारी डोंगरी के ठीक पहले कभी जंगल हुआ करता था. यहां के पंद्रह हजार से भी अधिक पेड़ों को काटकर अचानकमार बाघ परियोजना से विस्थापित किये गये तीन गांवों बांकल, बोकराकछार और सांभरधसान को बसाया गया. 

विस्थापन के दो साल बाद भी ग्रामीण यहां खुद को नया महसूस करते हैं. इलाके के पुराने वाशिंदे उन्हें तवज्जो भी नहीं देते, उल्टा वे मानते हैं कि इन नये आगंतुकों के कारण उनके ग्राम पंचायत को मिलने वाली सुविधायें अब बांटनी पड़ रही है. संकट ये भी है कि इन आदिवासियों की बोली और रहन-सहन इन गांव वालों से बिल्कुल अलग है. 

सांभरधसान में 17 परिवार हैं. यहां के सेवाराम बैगा को भी पांच एकड़ जमीन कृषि भूमि बताकर दी गई है. पर वे बताते हैं -''मेरी क्या इस गांव में किसी की जमीन भी समतल नहीं है. उबड़-खाबड़ है, बीच में बड़े-बड़े पेड़ है और जमीन ऐसी है कि कितनी भी बारिश हो, पानी नहीं रूकता. ऐसे में फसल की अच्छी पैदावार होने का तो सवाल ही नहीं है. धान का पौधा सही रूप से विकसित नहीं हो पाता.''

बांकल के तीस परिवारों को विस्थापित किया जाना था लेकिन वहां 29 परिवारों को ही बसाया गया है. एक भवन जो कि हितग्राही को दिया जाना था, वहां वर्तमान में स्कूल संचालित है. इस गांव में भी सिंचाई, स्कूल भवन, स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी, बिजली जैसी अन्य सुविधाएं नहीं हैं. आदिवासी परेशान हैं और अपने पुराने गांव को छोड़कर नई जगह पर विस्थापित होने का दर्द उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देता है.

बांकल की सुंदरिया सत्तर साल की हैं और उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें इस बुढ़ापे में एक नई जगह पर आकर रहना होगा. लड़खड़ाती जुबान से वह कहती हैं-'' बने ता हावन साहब फेर इहा मन नइ लागय. कई झन तो इहा ले कमाय-खाय बर दिल्ली-आगरा कोती जावत हे त कई झन घलो जाये के सोचथे...मोर तो बुध सिरा गये हे...सरकारो ह तो घलो जेन कहे रहिसे ओला पूरा नई करिच...खेत म पथरा हे, रूख-राई हे, धान उपजय नहीं त काला खाबो...अइसन में का करी कुछ बुता-काम तो घलो नइ हे इहा.''  अपने जवाब में अनपढ़ सुंदरिया खुद ही कई सवाल खड़े करती हैं. पर उनके सवाल पेड़-पौधों से टकराकर वापस आ जाते हैं. 

बांकल में बैगा परिवारों के साथ गोड़ आदिवासी भी विस्थापित किये गये हैं. इन्हीं में से एक परिवार हैं रमेश का. रमेश को पिछले साल 25 बोरी धान यानी सात क्विंटल धान मिला था जिसकी कीमत पांच हजार छह सौ रुपए थी और पांच हजार रुपए खेती में खर्च हो गये. इस तरह जी-जान से परिवार सहित खेती करने के एवज में उन्हें मिले महज छह सौ रुपए...वह इसका क्या करें. इस साल भी खेती का बुरा हाल है. रमेश बताते हैं-''इस बार तो पिछली बार से भी कम धान होगा.'' रमेश के पास बीपीएल का कार्ड भी नहीं है, लिहाजा 35 किलो चावल भी नहीं मिलते. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि बाल-बच्चों को वे क्या खिलाएंगे ?

जीवन में पहली बार पलायन 
बांकल में भी जल्दा, बहाउड़, सांभरधसान, कूबा और बोकराकछार की तरह ही रोजगार की समस्या है. जिसके परिणामस्वरूप पलायन जैसी समस्या सामने आ रही है. यह पहला अवसर है, जब इस गांव के आदिवासी दिल्ली और आगरा जैसे शहरों में कमाने-खाने के लिए गये हैं. छत्तीसगढ़ में पलायन की समस्या कोई नई नहीं है लेकिन यह वन्यक्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों के लिए एकदम नया है.

मानसिंह के साथ पूरा गांव ही बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा हैं.मानसिंह बताते हैं कि-''अच्छी बारिश होने के बाद भी इस साल अनाज पिछले साल की तुलना में कम मिला. कारण है खेती की जमीन का सही न होना. हमारे सामने बेरोजगारी की समस्या है. अगर हम काम नहीं करेंगे तो हमारे बच्चे भूखों मर जायेंगे.''
गांव के अन्य ग्रामीणों की तरह वे भी मजदूरी करने आगरा या दिल्ली जाना चाहते हैं ताकि वे अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकें. गांव के पंद्रह से अधिक लोग दिल्ली-आगरा कमाने-खाने चले गये हैं और कई दूसरे लोग भी जाने की इच्छा रखते हैं. इस गांव की सूनी गलियां और घरों में लगे ताले मानसिंह की बातों की गवाही देते हैं.
रमेश बताते हैं कि बांकल के 29 परिवार से 14 लोग पलायन कर चुके हैं.दरवाजा के एक ठेकेदार के द्वारा अच्छी मजदूरी दिलाने का वायदा करने के बाद रामकुमार, रामनाथ, रामप्रसाद, रामस्वरूप, समलिया, शिवकुमार, शिवचरण, हीरा ,शिवप्रसाद,  अररूत, मालिकराम, अशोक और लमतू आगरा और दिल्ली चले गये हैं.सांभरधसान का श्यामलाल भी उनके साथ गया हैं. ये सभी बैगा हैं. इन्हें गये एक महीना हो गया है.
जहां एक ओर बांकल और सांभरधसान के बैगा आदिवासी आगरा और दिल्ली जैसे शहरों में विस्थापन से उभरी पीड़ा के बाद पलायन का दुख झेल रहे हैं, वहीं बोकराकछार के आदिवासी पहाड़ियों पर बांस काटते हुए परिवार के लिए रोजी-रोटी का इंतजाम कर रहे हैं. कभी-कभी तो वे अपने परिवार से पंद्रह-बीस दिन भी अलग रहते हैं और इस बीच घर की सारी जिम्मेदारी महिलाओं के जिम्में होती है.

बोकराकछार के आदिवासियों को बांस कटाई के दौरान जंगल में ही झोपड़ियां बनाकर रहना होता हैं और दिल्ली-आगरा पलायन करने वालों को भी रातें झुग्गियों में काटनी पड़ रही हैं. ऐसे में कथित रूप से उनके लिए तीन लाख तैंतीस हजार रुपए की लागत से बनाये गये पक्के मकान का क्या औचित्य है. उनके हिस्से तो अभी भी झोपड़ियां ही हैं. 

आदिवासियों की विवशता भरे जीवन में विस्थापन के बाद उभरी पलायन की पीड़ा एकदम नई है और ये उनके उपर थोपी गई है. ये दुख उनके हिस्से नहीं था पर अब वे इस परेशानी से दो-चार हो रहे हैं. बोकराकछार के बसोर बैगा अपना परिवार छोड़कर दिल्ली-आगरा नहीं जाना चाहते क्योंकि उन्हें डर हैं कि कहीं वहां वे भूखों न मर जाये.
वे कहते हैं-''यहां वे किसी तरह रोजी-मजदूरी करके अपना जीवन काट लेंगे लेकिन वहां गये और काम नहीं मिला तो वहां से वह लौट भी नहीं पायेंगे, क्योंकि पढ़-लिखे तो हैं नहीं.साहब दोगुना मजदूरी मिलेगा कहकर ठेकेदार यहां से ले जा रहा है लेकिन यदि नहीं मिला तो हम तो वहां बेमौत मर जायेंगे.''

हालांकि बसोर इस बात को भी स्वीकारते हैं कि यहां भी वे सुखी नहीं रह सकते, क्योंकि खेतों में धान की जगह मायूसी उपज रही है. वे कहते हैं-'' पांच एकड़ में धान की बोनी किया और बीजहा भी वापस नहीं हो रहा है तो ऐसे में तो भूखों मरना ही है. वन विभाग के अफसरों ने कहा था कि वे पांच साल तक उनका ख्याल रखेंगे. उनके बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य का इंतजाम करेंगे लेकिन वे तो आते तक नहीं. उन्होंने हमें छोड़ दिया.'' 

राजीव गांधी जलाशय के पास खुड़िया ग्राम से दो किलोमीटर दूर सुरही जाने वाले मार्ग पर बसाये गये बहाउड़ का हाल तो इन गांवों से भी बुरा है. यहां 66 परिवारों को बसाया गया है. जंगलों के बीच बना इनका आशियाना जितना खूबसूरत दिखाई देता है, वैसा अंदर से है नहीं.

दुखीराम अपने नाम की तरह ही यहां दुखी है और उनकी उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी तब फिर गया जब पांच एकड़ की जमीन में से केवल दो एकड़ में ही वे कृषि कार्य कर पाये और शेष में पैरा भी नहीं हुआ. 
ठुकुर बैगा इस गांव के बुर्जुग है और लोग उनकी बड़ी इज्जत करते हैं. उन्होंने अपने जीवन में कई कष्ट झेले हैं और अब उनकी भी हिम्मत उम्र के साथ ही जवाब दे रही है. वे बहाउड़ के साथ ही बोकराकछार, बांकल, सांभरधसान, कूबा और जल्दा के ग्रामीणों के संपर्क में हैं और कभी-कभार वहां आते-जाते रहते हैं. वे आदिवासियों के पलायन को दुखद बताते हैं.

वे कहते हैं-''साहब सत्तर साल की उम्र हो गई, कभी हम बाहर कमाने-खाने नहीं गये. अब हमारे ही बिरादरी के लोग बाहर जा रहे हैं. दोगुना मजदूरी मिलेगा कहकर कोई बाल-बच्चों के साथ तो कोई यहां छोड़कर पलायन कर रहे हैं. यह अच्छी बात नहीं है. यह हमारे लिए एकदम नया है और यह अच्छा संकेत नहीं है.

हमारे बुजुर्ग कहते थे कि कभी अपनी मिट्टी को छोड़कर किसी के बहकावे में कभी मत जाना, भले ही वहां सोना-चांदी ही क्यों न मिले लेकिन आजकल के बच्चों को कौन समझाये और उन्हें समझाए भी तो कैसे ? समझाने पर वे उल्टे पूछते हैं-हमारा परिवार पालोगे...क्या करें जुबान बंद हो जाती है...पता नहीं बहाउड़ वाले कब तक उनकी बात सुनते हैं...उसके बाद तो बूढ़ादेव ही जाने क्या होगा ?”