मंगलवार, 20 मार्च 2012

विस्थापितों के साथ धोखा हुआ है


अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघों को बचाने के नाम पर वहां सैकड़ों सालों से रहने वाले बैगा आदिवासियों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों को हटाने के नाम पर पिछले 2 सालों में तमाम नियम कायदे और कानून को ताक पर रख कर वन विभाग का जो जंगल राज चल रहा है, उसने इन बैगा आदिवासियों के सामने जीवन-मरन का प्रश्न पैदा कर दिया है. पुनर्वास के नाम पर वन विभाग ने बैगा आदिवासियों की जिंदगी जानवरों-सी कर दी है.इस पूरे मामले पर सुनील शर्मा
ने एक लंबी रिपोर्ट लिखी है जो पहले ही दो किस्तों में छप चुकी है...पेश है तीसरी किस्त... 

वन विभाग के अफसर ही क्यों, विभाग के मंत्री भी यहां का दौरा कर चुके हैं और उन्हें विस्थापन की तारीफ करते हुए इसे देश का सबसे अच्छा विस्थापन बताया था लेकिन जल्दा के चमरू का तो कुछ और ही कहना है-'' उसेंडी सर जब आये थे तो उन्होंने अधूरे काम पूरे कराने का वादा किया था लेकिन आज तक गांव में स्कूल भवन, अस्पताल, आंगनबाड़ी केंद्र नहीं बना. उन्होंने हल के लिए भैंसा देने की बात कहीं थी. भैसा की जगह पड़वा दिया गया, जो हल खींचने के योग्य नहीं था और उसमें से एक पड़वा तो कुछ ही दिनों बाद मर भी गया. तीन हजार में जमीन की ट्रेक्टर से जुताई करवाई पर अनाज भी उतना नहीं हुआ कि उसे परिवार का एक सदस्य भी साल भर खा सके. हमारे साथ धोखा हुआ है.''

इस गांव में समस्याओं का अंबार लगा है. इतवारी कुछ समझदारी की बातें करते हैं. वे कहते हैं-'' वैसे तो यहां कई परेशानियां है लेकिन अगर कोई दूर ही नहीं करना चाहे तो वह कैसे दूर होगी.” 

वन विभाग के अफसरों की पोल खोलते हुए वे कहते हैं कि यहां आरक्षित भूमि को खेती की जमीन बताकर ग्रामीणों को दिया गया है और खेत क्या वह जमीन के कुछ टुकड़े हैं जिसमें पेड़ और पत्थर है. गांव के सभी 74 परिवारों को भैसा जोड़ी मिलना था लेकिन 24  को आज तक नहीं मिला, जिन्हें मिला उन्हें भैंसा की जगह पड़वा दिया जिनमें से कइयों की मौत हो चुकी हैं. विस्थापितों ने मामले की शिकायत एसपी से की है लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

 गांव के मुखिया मरहूराम बताते हैं-''हमारे इलाके के रेंजर वर्मा जी को सब मालूम हैं. हमें तो ठगा गया है. भला दस लाख रुपए जैसा हुआ क्या है.'' वह बोलते-बोलते भावुक हो जाते हैं- ''हम अपने पुराने गांव से अपना देवी-देवता भी तो नहीं ला पाये हैं, उनका आशीर्वाद अब हमारे साथ नहीं है...शायद यही कारण है कि हमें ये दिन देखने पड़ रहे हैं. हमारे पास अब न हमारे देवता है और न पूजा स्थल है. देवताओं का प्रकोप हमें चैन से रहने नहीं दे रहा है.''

तीन में न तेरह में
राजीव गांधी जलाशय (खुड़िया) जाने वाले मार्ग पर दायीं तरफ कारी डोंगरी के ठीक पहले कभी जंगल हुआ करता था. यहां के पंद्रह हजार से भी अधिक पेड़ों को काटकर अचानकमार बाघ परियोजना से विस्थापित किये गये तीन गांवों बांकल, बोकराकछार और सांभरधसान को बसाया गया. 

विस्थापन के दो साल बाद भी ग्रामीण यहां खुद को नया महसूस करते हैं. इलाके के पुराने वाशिंदे उन्हें तवज्जो भी नहीं देते, उल्टा वे मानते हैं कि इन नये आगंतुकों के कारण उनके ग्राम पंचायत को मिलने वाली सुविधायें अब बांटनी पड़ रही है. संकट ये भी है कि इन आदिवासियों की बोली और रहन-सहन इन गांव वालों से बिल्कुल अलग है. 

सांभरधसान में 17 परिवार हैं. यहां के सेवाराम बैगा को भी पांच एकड़ जमीन कृषि भूमि बताकर दी गई है. पर वे बताते हैं -''मेरी क्या इस गांव में किसी की जमीन भी समतल नहीं है. उबड़-खाबड़ है, बीच में बड़े-बड़े पेड़ है और जमीन ऐसी है कि कितनी भी बारिश हो, पानी नहीं रूकता. ऐसे में फसल की अच्छी पैदावार होने का तो सवाल ही नहीं है. धान का पौधा सही रूप से विकसित नहीं हो पाता.''

बांकल के तीस परिवारों को विस्थापित किया जाना था लेकिन वहां 29 परिवारों को ही बसाया गया है. एक भवन जो कि हितग्राही को दिया जाना था, वहां वर्तमान में स्कूल संचालित है. इस गांव में भी सिंचाई, स्कूल भवन, स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी, बिजली जैसी अन्य सुविधाएं नहीं हैं. आदिवासी परेशान हैं और अपने पुराने गांव को छोड़कर नई जगह पर विस्थापित होने का दर्द उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देता है.

बांकल की सुंदरिया सत्तर साल की हैं और उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें इस बुढ़ापे में एक नई जगह पर आकर रहना होगा. लड़खड़ाती जुबान से वह कहती हैं-'' बने ता हावन साहब फेर इहा मन नइ लागय. कई झन तो इहा ले कमाय-खाय बर दिल्ली-आगरा कोती जावत हे त कई झन घलो जाये के सोचथे...मोर तो बुध सिरा गये हे...सरकारो ह तो घलो जेन कहे रहिसे ओला पूरा नई करिच...खेत म पथरा हे, रूख-राई हे, धान उपजय नहीं त काला खाबो...अइसन में का करी कुछ बुता-काम तो घलो नइ हे इहा.''  अपने जवाब में अनपढ़ सुंदरिया खुद ही कई सवाल खड़े करती हैं. पर उनके सवाल पेड़-पौधों से टकराकर वापस आ जाते हैं. 

बांकल में बैगा परिवारों के साथ गोड़ आदिवासी भी विस्थापित किये गये हैं. इन्हीं में से एक परिवार हैं रमेश का. रमेश को पिछले साल 25 बोरी धान यानी सात क्विंटल धान मिला था जिसकी कीमत पांच हजार छह सौ रुपए थी और पांच हजार रुपए खेती में खर्च हो गये. इस तरह जी-जान से परिवार सहित खेती करने के एवज में उन्हें मिले महज छह सौ रुपए...वह इसका क्या करें. इस साल भी खेती का बुरा हाल है. रमेश बताते हैं-''इस बार तो पिछली बार से भी कम धान होगा.'' रमेश के पास बीपीएल का कार्ड भी नहीं है, लिहाजा 35 किलो चावल भी नहीं मिलते. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि बाल-बच्चों को वे क्या खिलाएंगे ?

जीवन में पहली बार पलायन 
बांकल में भी जल्दा, बहाउड़, सांभरधसान, कूबा और बोकराकछार की तरह ही रोजगार की समस्या है. जिसके परिणामस्वरूप पलायन जैसी समस्या सामने आ रही है. यह पहला अवसर है, जब इस गांव के आदिवासी दिल्ली और आगरा जैसे शहरों में कमाने-खाने के लिए गये हैं. छत्तीसगढ़ में पलायन की समस्या कोई नई नहीं है लेकिन यह वन्यक्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों के लिए एकदम नया है.

मानसिंह के साथ पूरा गांव ही बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा हैं.मानसिंह बताते हैं कि-''अच्छी बारिश होने के बाद भी इस साल अनाज पिछले साल की तुलना में कम मिला. कारण है खेती की जमीन का सही न होना. हमारे सामने बेरोजगारी की समस्या है. अगर हम काम नहीं करेंगे तो हमारे बच्चे भूखों मर जायेंगे.''
गांव के अन्य ग्रामीणों की तरह वे भी मजदूरी करने आगरा या दिल्ली जाना चाहते हैं ताकि वे अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकें. गांव के पंद्रह से अधिक लोग दिल्ली-आगरा कमाने-खाने चले गये हैं और कई दूसरे लोग भी जाने की इच्छा रखते हैं. इस गांव की सूनी गलियां और घरों में लगे ताले मानसिंह की बातों की गवाही देते हैं.
रमेश बताते हैं कि बांकल के 29 परिवार से 14 लोग पलायन कर चुके हैं.दरवाजा के एक ठेकेदार के द्वारा अच्छी मजदूरी दिलाने का वायदा करने के बाद रामकुमार, रामनाथ, रामप्रसाद, रामस्वरूप, समलिया, शिवकुमार, शिवचरण, हीरा ,शिवप्रसाद,  अररूत, मालिकराम, अशोक और लमतू आगरा और दिल्ली चले गये हैं.सांभरधसान का श्यामलाल भी उनके साथ गया हैं. ये सभी बैगा हैं. इन्हें गये एक महीना हो गया है.
जहां एक ओर बांकल और सांभरधसान के बैगा आदिवासी आगरा और दिल्ली जैसे शहरों में विस्थापन से उभरी पीड़ा के बाद पलायन का दुख झेल रहे हैं, वहीं बोकराकछार के आदिवासी पहाड़ियों पर बांस काटते हुए परिवार के लिए रोजी-रोटी का इंतजाम कर रहे हैं. कभी-कभी तो वे अपने परिवार से पंद्रह-बीस दिन भी अलग रहते हैं और इस बीच घर की सारी जिम्मेदारी महिलाओं के जिम्में होती है.

बोकराकछार के आदिवासियों को बांस कटाई के दौरान जंगल में ही झोपड़ियां बनाकर रहना होता हैं और दिल्ली-आगरा पलायन करने वालों को भी रातें झुग्गियों में काटनी पड़ रही हैं. ऐसे में कथित रूप से उनके लिए तीन लाख तैंतीस हजार रुपए की लागत से बनाये गये पक्के मकान का क्या औचित्य है. उनके हिस्से तो अभी भी झोपड़ियां ही हैं. 

आदिवासियों की विवशता भरे जीवन में विस्थापन के बाद उभरी पलायन की पीड़ा एकदम नई है और ये उनके उपर थोपी गई है. ये दुख उनके हिस्से नहीं था पर अब वे इस परेशानी से दो-चार हो रहे हैं. बोकराकछार के बसोर बैगा अपना परिवार छोड़कर दिल्ली-आगरा नहीं जाना चाहते क्योंकि उन्हें डर हैं कि कहीं वहां वे भूखों न मर जाये.
वे कहते हैं-''यहां वे किसी तरह रोजी-मजदूरी करके अपना जीवन काट लेंगे लेकिन वहां गये और काम नहीं मिला तो वहां से वह लौट भी नहीं पायेंगे, क्योंकि पढ़-लिखे तो हैं नहीं.साहब दोगुना मजदूरी मिलेगा कहकर ठेकेदार यहां से ले जा रहा है लेकिन यदि नहीं मिला तो हम तो वहां बेमौत मर जायेंगे.''

हालांकि बसोर इस बात को भी स्वीकारते हैं कि यहां भी वे सुखी नहीं रह सकते, क्योंकि खेतों में धान की जगह मायूसी उपज रही है. वे कहते हैं-'' पांच एकड़ में धान की बोनी किया और बीजहा भी वापस नहीं हो रहा है तो ऐसे में तो भूखों मरना ही है. वन विभाग के अफसरों ने कहा था कि वे पांच साल तक उनका ख्याल रखेंगे. उनके बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य का इंतजाम करेंगे लेकिन वे तो आते तक नहीं. उन्होंने हमें छोड़ दिया.'' 

राजीव गांधी जलाशय के पास खुड़िया ग्राम से दो किलोमीटर दूर सुरही जाने वाले मार्ग पर बसाये गये बहाउड़ का हाल तो इन गांवों से भी बुरा है. यहां 66 परिवारों को बसाया गया है. जंगलों के बीच बना इनका आशियाना जितना खूबसूरत दिखाई देता है, वैसा अंदर से है नहीं.

दुखीराम अपने नाम की तरह ही यहां दुखी है और उनकी उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी तब फिर गया जब पांच एकड़ की जमीन में से केवल दो एकड़ में ही वे कृषि कार्य कर पाये और शेष में पैरा भी नहीं हुआ. 
ठुकुर बैगा इस गांव के बुर्जुग है और लोग उनकी बड़ी इज्जत करते हैं. उन्होंने अपने जीवन में कई कष्ट झेले हैं और अब उनकी भी हिम्मत उम्र के साथ ही जवाब दे रही है. वे बहाउड़ के साथ ही बोकराकछार, बांकल, सांभरधसान, कूबा और जल्दा के ग्रामीणों के संपर्क में हैं और कभी-कभार वहां आते-जाते रहते हैं. वे आदिवासियों के पलायन को दुखद बताते हैं.

वे कहते हैं-''साहब सत्तर साल की उम्र हो गई, कभी हम बाहर कमाने-खाने नहीं गये. अब हमारे ही बिरादरी के लोग बाहर जा रहे हैं. दोगुना मजदूरी मिलेगा कहकर कोई बाल-बच्चों के साथ तो कोई यहां छोड़कर पलायन कर रहे हैं. यह अच्छी बात नहीं है. यह हमारे लिए एकदम नया है और यह अच्छा संकेत नहीं है.

हमारे बुजुर्ग कहते थे कि कभी अपनी मिट्टी को छोड़कर किसी के बहकावे में कभी मत जाना, भले ही वहां सोना-चांदी ही क्यों न मिले लेकिन आजकल के बच्चों को कौन समझाये और उन्हें समझाए भी तो कैसे ? समझाने पर वे उल्टे पूछते हैं-हमारा परिवार पालोगे...क्या करें जुबान बंद हो जाती है...पता नहीं बहाउड़ वाले कब तक उनकी बात सुनते हैं...उसके बाद तो बूढ़ादेव ही जाने क्या होगा ?”

शनिवार, 21 जनवरी 2012

विस्थापन के नाम पर वन विभाग का जंगल राज


अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघों को बचाने के नाम पर वहां सैकड़ों सालों से रहने वाले बैगा आदिवासियों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों को हटाने के नाम पर पिछले 2 सालों में तमाम नियम कायदे और कानून को ताक पर रख कर वन विभाग का जो जंगल राज चल रहा है, उसने इन बैगा आदिवासियों के सामने जीवन-मरन का प्रश्न पैदा कर दिया है. पुनर्वास के नाम पर वन विभाग ने बैगा आदिवासियों की जिंदगी जानवरों-सी कर दी है. नेशनल फाउंडेशन फार इंडिया के फेलोशिप के तहत सुनील शर्मा ने विस्तार से विस्थापन के इस मुद्दे पर लिखा है.पेश है दूसरी किस्त:—

सुनील शर्मा, बिलासपुर

विस्थापितों की रकम कहां गई?

सबसे बड़ा छल तो यह हुआ कि विस्थापित किये गये आदिवासियों को कभी भी पुर्नवास की नीतियों के बारे में नहीं बताया गया. सच तो यह है कि विस्थापन के लिये वन विभाग के अधिकारियों ने अपनी ही पुनर्वास नीति को ताक पर रख दिया.

टाईगर रिजर्व में विस्थापन को लेकर वन विभाग की नीति कहती है कि विस्थापित होने वाले आदिवासियों को दो में से किसी एक तरीके से पुनर्वास का लाभ दिया जाये. पहला तो यह कि प्रत्येक विस्थापित परिवार को बैंक खाता खुलवा कर 10-10 लाख रुपये दे दिये जायें और दूसरा ये कि इसी दस लाख रुपये से उनके लिये मकान-जमीन की व्यवस्था की जाये. पुनर्वास के इस दूसरे तरीके में प्रत्येक परिवार को पचास हजार रुपए नगद, पक्का मकान, पांच एकड़ कृषि भूमि, सड़क, बिजली, सिंचाई की सुविधा, तालाब, ट्यूबवेल, पेयजल, अस्पताल, सामुदायिक भवन, आंगनबाड़ी, पूजा स्थल, श्मशानघाट सहित अन्य जरूरी सुविधाओं का इंतजाम विस्थापितों के लिए करना था.
नियमानुसार 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी युवाओं को एक स्वतंत्र परिवार की मान्यता देते हुये उन्हें पुनर्वास का लाभ दिया जाना था. लेकिन वन विभाग ने ऐसा नहीं किया. सवाल यही उठता है कि ऐसे युवाओं के लिये आयी 10-10 लाख रुपये की रकम कहां गई ? यह सवाल पूछने पर वन विभाग के अफसर कागजों को देखने के बाद ही स्थिति बताने का रटा-रटाया जवाब देते हैं.

जाहिर है, सारे नियम-कायदों को दरकिनार करते हुए बगैर ग्रामीणों के पुर्नवास की व्यवस्था किये वन विभाग ने उन्हें रातोंरात गाड़ियों में भरकर उनके सामान के साथ लाकर नई जगह पर छोड़ दिया. अभी उनके लिए मकान बनने की शुरूआत भी नहीं हुई थी. न खेत बने थे और न सड़क, न बिजली का ही इंतजाम था.

पानी की उपलब्धता के कारण तालाब के किनारे आदिवासी छाला झोपड़ी बनाकर रहने लगे और  इस तरह अपनी जमीन से बेदखल हुए  आदिवासियों के नये और अनोखे त्रासदीपूर्ण जीवन का आगाज हुआ.

तालाब के किनारे मौसमी बीमारियों और मच्छर से तो वे किसी तरह अपनी जान बचाते रहे लेकिन अपनी मिट्टी से अलग होने का दर्द उनकी आंखों में रह-रहकर उभरने लगा. उनमें से कुछ तो पुर्नवास स्थल को छोड़कर अपने मूल गांव भी गये पर वहां पहरा होने के कारण उनका पहले की तरह निवास संभव नहीं था. जो गये उन्हें खदेड़ दिया गया और अपमानित आदिवासी एक बार फिर झोपड़ियों में दिन गुजारने लगे.
चूंकि उनके लिए बनाये जा रहे मकान ठेकेदार द्वारा बनाये जा रहे थे इसलिए उन्हें भवन निर्माण में काम नहीं मिल रहा था, क्योंकि ठेकेदार अपने लोगों को मजदूरी पर रख रहा था. वन विभाग ने इन आदिवासियों को पेड़ काटने, मार्ग बनाने, तालाब बनाने जैसे काम करवाये पर ऐसा रोजगार पाने वाले आदिवासियों की संख्या कम ही है.

वन विभाग का दावा है कि प्रत्येक परिवार को रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत एक लाख रुपए का भुगतान किया गया है. लेकिन वन विभाग का यह आंकड़ा अपनी कहानी खुद कह देता है. अगर इन आदिवासियों को एक लाख रुपये का भुगतान किया जाता है तो 249 परिवारों के हिसाब से यह रकम दो करोड़ 49 लाख रुपए हो जाती है. लेकिन आदिवासियों के जॉब कार्ड में इतनी रकम कहीं नजर नहीं आती.

इति विस्थापन कथा

अचानकमार टाईगर रिजर्व से विस्थापित 249 परिवार लगातार पांच महीने तक इसी तरह अपना जीवन झोपड़ियों में व्यतीत करते रहे और उधर वन विभाग के अफसर मनमानीपूर्ण रवैया अपनाते हुए अपने हिसाब से उनके मकान बनवाते रहे. मकानों में घटिया और गुणवत्ताहीन सामग्री का इस्तेमाल किया गया, जो कैमरे पर रिकार्ड है.
भ्रष्टाचार की सारी सीमायें लांघते हुए मकान,  सड़क, पहुंच मार्ग, खेती के जमीन का समतलीकरण, मेड़ निर्माण और तालाबों का निर्माण होता रहा. किसी तरह उक्त निर्माण कार्य पूर्ण हुआ और विस्थापितों को उनका घर और खेती के लिए जमीन सौंप दी गई.

यहां यह बताना लाजिमी है कि जिन छह गांवों का विस्थापन किया गया, उसमें जल्दा के ग्रामीणों को कोटा लोरमी मार्ग में जूनापारा, कठमुड़ा के पास, कूबा को मरवाही वनमंडल के आमाडोब के पास तो बांकल, बोकराकछार, सांभरधसान को लोरमी ब्लाक के अंतर्गत ग्राम दरवाजा के पास बसाया गया, जो कि खुड़िया यानी राजीव गांधी जलाशय जाने वाले मार्ग पर स्थित है. बहाउड़ के ग्रामीणों को ग्राम खुड़िया के अंतर्गत खुड़िया से जंगल के रास्ते छपरवा जाने वाले मार्ग पर बसाया गया.

मकान और खेती के लिए जमीन मिलने पर ग्रामीणों ने राहत ली और पांच महीने की दुख-तकलीफ को वे भूल गये पर यहां भी परेशानियों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. विस्थापित करने से पहले वन विभागों द्वारा उनको किया गया वादा सब्जबाग साबित होने लगा. खेती-किसानी के दिनों में जब ग्रामीणों ने अपनी जमीन देखी तो वहां न सिंचाई की सुविधा थी और न ही हल के लिए बैल मिले. खेती की जमीन का इतनी उबड़-खाबड़ थी कि उसमें चलना भी मुश्किल था, ऐसे में उसमें पानी रुकने और खेती होने की उम्मीद ही नहीं थी.

शिकायत करने पर कुछ ग्रामीणों की जमीन को ट्रेक्टर से जुतवाया गया जबकि बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने खुद से ही पैसे देकर ट्रेक्टर जमीन जुतवाई. नि:शुल्क रासायनिक खाद का वितरण भी हुआ पर उसका लाभ भी कइयों को नहीं मिला. किसी तरह खेती शुरू हुई पर बारिश ने दगा दिया. खेती से उतना अनाज भी नहीं हुआ कि परिवार का एक आदमी उसे साल भर पकाकर खा सके. उन्हें पीडीएस का चावल नहीं मिलता तो उनके सामने भूखे मरने की नौबत आ जाती.
ग्रामीणों के यहां आने के  पहले दिन से ही शिक्षा और स्वास्थ्य का बुरा हाल रहा. आंगनबाड़ी,स्कूल,सामुदायिक भवन नहीं बने और न मंदिर न श्मशानघाट.

इन गांवों में आज भी उचित मूल्य की दुकान नहीं है और उन्हें बीपीएल का चावल लेने दूसरे गांव जाना पड़ता है. नये बने मकानों का हाल यह है कि पहली बरसात में ही छत के रास्ते से पानी कमरे के भीतर आने लगा.
वन विभाग के दावे के उलट इन 6 में से किसी भी गांव में अस्पताल नहीं है तो डाक्टर या नर्स के होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता लिहाजा ये अपनी बीमारियों का झोला छाप डाक्टर से इलाज कराने मजबूर है.

इसी तरह बिजली के तार तो है पर उनमें करंट नहीं है. लिहाजा रात का अंधेरा अभी भी उनके पुराने गांव की तरह ही अभी उनका पुराना साथी है. हां यदि कोई मंत्री या बाहर का बड़ा अधिकारी गांव का निरीक्षण करने आता है तो जरूर इनमें करंट दौड़ने लगता है.
विस्थापित सभी गांव पानी की समस्या से भी जूझ रहे है. पेयजल की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. हैंडपंप तो खुदवाये गये हैं लेकिन अधिकतर हमेशा बिगड़ी हालत में ही रहते हैं. इनके बच्चों के बदन पर आज भी चिथड़े दिखते हैं और साफ-सफाई से कोसों दूर होने के कारण ये बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं. विस्थापन के बाद इनके खातों में जमा कराया गया रुपया प्रति परिवार 50 हजार कब का खत्म हो गया है और अब इनके पास रोजगार का कोई इंतजाम नहीं है. 

नई जगह होने के कारण इन्हें कोई काम नहीं देना चाहता, वहीं महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में भी इन्हें काम नहीं मिल रहा है. शिक्षा का हाल यह है कि गांव के ही किसी के घर में स्कूल संचालित है, जिसमें गिनती के बच्चे क,ख,ग,घ रट रहे हैं और आने वाले संकट से बिल्कुल अनजान है.
यहां आकर कुछ बच्चों का जन्म जरूर हुआ है पर जो पुराने गांव में पैदा हुए है उनके लिए ये नया गांव ऐसा लग रहा है जैसे वे किसी और के घर में कुछ दिन रुकने के लिए आये हैं. नई जगह से न बड़े जुड़ाव महसूस कर पा रहे हैं और न बच्चे. ऐसे में विस्थापितों का जीवन अधर में दिखाई देता है.

जल्दा गांव के मरहूराम की उम्र करीबन 55 साल हैं. वे गांव के मुखिया हैं और वे अपने गांव वालों की दुर्दशा पर अफसोस जताते हुए कहते हैं -''दो डिस्मिल में पक्के का मकान, पांच डिस्मिल में बाड़ी, पांच एकड़ खेती की जमीन, सिंचाई की सुविधा, बिजली, पेयजल, स्कूल, टेलीफोन, धार्मिक पूजा स्थल, श्मशानघाट, तालाब, सड़क, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उचित मूल्य की दुकान, आंगनबाड़ी केंद्र और कई अन्य सुविधाओं को देने की बात कहकर यहां लाया गया लेकिन दो साल बाद भी हमें ये सुविधाएं नहीं मिलीं. अगर कोई हमारे खेत और मकान ले लेगा तो हम उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि हमारे पास तो जमीन और मकान का पट्टा भी नहीं है.”

उल्लेखनीय है कि मरहूराम के गांव में ही पिछले साल मंगलू बैगा की मौत भूख के कारण हुई थी, जो अखबार की सुर्खियां तो बनी लेकिन आदिवासियों की आवाज अनसूनी रह गई. गांव के सरहू और धान बाई ने तो ईलाज के अभाव में दम तोड़ दिया. मरहूराम को इनकी मृत्यु का गहरा अफसोस है. गांव का मुखिया होने के नाते ग्रामीण उनसे बड़ी उम्मीदें रखते हैं लेकिन वह उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहें है. बकौल मरहूराम, अब उन्हें अपने मुखिया होने पर भी शर्म महसूस होने लगी है.
जल्दा गांव के विस्थापन के लिए सात करोड़ चालीस लाख रुपए मिले थे, जिसमें सभी 74 परिवारों को पचास-पचास हजार रुपए प्रोत्साहन राशि के रूप में मिले और शेष राशि सात करोड़ तीन लाख रुपए से पुर्नवास करने का दावा वन विभाग के अफसर करते हैं लेकिन साल भर के भीतर ही दीवारों पर आई दरार और बारिश में छतों से रिसकर मकान के भीतर पहुंचने वाले पानी की हर बूंद भ्रष्टाचार की दुहाई देता है.

इस गांव को 370 एकड़ कृषि भूमि देने का दावा विभाग के अफसर करते है लेकिन इस कृषि भूमि की हालत पर गांव के नौजवान वीर सिंह कहते हैं-''एक तो जंगल की जमीन हमें खेती करने दी गई है, उपर से खेत समतल नहीं होने के कारण इसमें अनाज नहीं उपजता. सिंचाई की सुविधा भी नहीं है और बिजली नहीं होने के कारण हमारे घरों में अंधेरा रहता है. बिजली की बात करने पर ठेकेदार पैसे मांगता है. हमारे पास तो पैसे नहीं है हम क्या करें ?''

होली राम को नई जगह से काफी उम्मीदें थी लेकिन किस तरह उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया, वे खुद ही बताते हैं- '' पुराने गांव में हमारे पास खेती की थोड़ी-सी जमीन थी, जिसमें हम मकई उपजाते थे. यहां आने पर हमें पांच एकड़ खेती की जमीन मिलने की उम्मीद थी और अधिकारियों ने कहा था कि वे आने वाले चार सालों तक उनकी जमीन को समतल करायेंगे. दूसरे साल ही नहीं आये तो अब शेष दो सालों का क्या भरोसा. साहब लोगों ने अस्पताल खोलने की बात कहीं थी, आज तक नहीं खुली.''

(एनएफआई की मीडिया फेलोशीप के तहत किये जा रहे अध्ययन का हिस्सा)

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

अचानकमार में वन विभाग का जंगल राज

बैगा आदिवासियों का गैरकानूनी विस्थापन
 अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघों को बचाने के नाम पर वहां सैकड़ों सालों से रहने वाले बैगा आदिवासियों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों को हटाने के नाम पर पिछले 2 सालों में तमाम नियम कायदे और कानून को ताक पर रख कर वन विभाग का जो जंगल राज चल रहा है, उसने इन बैगा आदिवासियों के सामने जीवन-मरन का प्रश्न पैदा कर दिया है. पुनर्वास के नाम पर वन विभाग ने बैगा आदिवासियों की जिंदगी जानवरों-सी कर दी है. नेशनल फाउंडेशन फार इंडिया के फेलोशिप के तहत सुनील शर्मा ने विस्तार से विस्थापन के इस मुद्दे पर लिखा है.इस रिपोर्ट को लगातार चार दिनों तक चार किस्तों में 19,20,21 व 22 दिसंबर 2011 को दैनिक छत्तीसगढ़ ने प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया है.
पेश है पहली किस्त —


विस्थापन को लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को किस तरह ठेंगे पर रखा जाता है, इसे जानना-समझना हो तो आपको अचानकमार बाघ परियोजना से विस्थापन के नाम पर उजाड़े गये गांवों को जरुर देखना चाहिये. बाघ के नाम पर बरसों से जंगल के इलाके में रह रहे सैकड़ों बैगा आदिवासियों को केवल इसलिये गैरकानूनी तरीके से उजाड़ दिया गया क्योंकि वन विभाग के अफसरों को बजट में आवंटित पैसे आनन-फानन में खर्च करने थे. खर्च करने की यह हड़बड़ी क्यों थी, इसे वन विभाग के अफसरों से बेहतर कौन बता सकता है ! लेकिन वन विभाग के इस विस्थापन के लिये अपनाये गये मनमाने जंगल कानून की मार अब विस्थापित बैगा आदिवासी झेल रहे हैं. विस्थापन की तलवार 19 और गांवों पर लटक रही है और इन गांवों के हजारों आदिवासी विस्थापन का हाल देख कर डरे हुये हैं.

बीमार, बदहाल और तमाम जरुरी सुविधाओं से दूर इन आदिवासियों के विस्थापन के लिये बनाये गये चमकदार ब्रोशर और पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन भले राज्य और देश की राजधानी में इस विस्थापन के लिये जंगल विभाग को शाबाशी दिलवा दें लेकिन विस्थापन की असली कहानी बेहद भयावह है. इस इलाके में रहने वाले बैगाओं के लिये इतिहास में पहला अवसर है, जब उन्हें अपने को जिंदा रखने के लिये देश के दूसरे इलाकों में पलायन करना पड़ा.

दिसंबर 2009 में बिलासपुर के अचानकमार टाइगर रिजर्व के 6 गांवों के बैगाओं को आधी रात को ट्रकों में भर कर जंगल के इलाके में छोड़ दिया गया था. पुनर्वास की एक भी व्यवस्था किये बिना. कहा गया कि इन आदिवासियों को 10-10 लाख रुपये मिलेंगे. लेकिन अपने गांवों से उजाड़े जाने से पहले न तो पंचायत कानून के तहत पंचायत की बैठक की गयी और ना ही पुनर्वास कमेटी की बैठक. तत्कालीन कलेक्टर सोनमणी बोरा कहते रहे कि बिना पुनर्वास कमेटी की बैठक के किसी का विस्थापन नहीं होगा. यहां तक कि आदिवासियों का विस्थापन हो जाने के बाद भी जब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उन्हें ज्ञापन सौंपा तब भी वे यही दुहराते रहे. दूसरी और वन विभाग ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के उलट राज्य सरकार के किसी भी दूसरे विभाग से बिना संपर्क किये आदिवासियों के कथित पुनर्वास में पैसों की अफरा-तफरी और मनमाने तरीके से काम जारी रखा. आज दो साल बाद भी विस्थापित आदिवासियों को जमीन और मकान का पट्टा तक नहीं मिला है.

जंगल, बाघ और विस्थापन
वन क्षेत्रफल और वन राजस्व के हिसाब से छत्तीसगढ़ देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है. राज्य के 44 फीसदी हिस्से में यानी 59558 वर्ग किलोमीटर में जंगल है लेकिन अकेले अचानकमार टाईगर रिजर्व एरिया के महज छह वन्य ग्रामों के विस्थापन के लिए 1250 एकड़ जंगल की कटाई की गई है. अभी 19 वन्य गांवों का विस्थापन और होना है.

बिलासपुर और मरवाही फारेस्ट डिवीजन में स्थित अचानकमार टाईगर रिजर्व एरिया के अंतर्गत 625.195 वर्ग किलोमीटर कोर जोन, 287.822 वर्ग किलोमीटर बफर जोन सहित कुल एरिया 914.017 वर्ग किलोमीटर है.
कोर एरिया का 551.552 वर्ग किलोमीटर एरिया अचानकमार वन्यप्राणी अभ्यारण्य में आता है और 74.643 नान प्रोटेक्टेड एरिया है. 20 फरवरी 2009 को अचानकमार टाइगर रिजर्व एरिया का नोटिफिकेशन जारी हुआ और उसके बाद यहां के 25 में से छह गांव जल्दा, कूबा, सांभरधसान, बोकराकछार, बांकल, बहाउड़ के पहले चरण के विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हुई.

विस्थापन में न तो पुर्नवास नीति का पालन हुआ और न ही मानवता का ही ख्याल रखा गया. विशेष पिछड़ी जनजाति कहे जाने वाले बैगा आदिवासियों को धमकियां दी गई कि यदि उन्होंने उनकी बात नहीं मानी और वे यहां से जाने तैयार नहीं हुए तो फिर किसी भी घटना के लिए वे जिम्मेदार नहीं होंगे. कैमरे में रिकार्डेड बयान में आदिवासियों ने दावा किया कि जंगल के अधिकारियों ने आ कर धमकियां दी कि अगर गांव खाली नहीं किया तो यहां हाथी छोड़े जाएंगे और तुम सब मारे जाओगे.

आदिवासी डर गये और उन्होंने विस्थापित होना स्वीकार किया. बरसों से तिनका-तिनका कर जंगल के बीच बसाया आशियाना पलभर में उजड़ गया और आधे-अधूरे सामान के साथ परिवारों ने वहां से चले जाने में ही अपनी भलाई समझी.

आंकड़ों में पुनर्वास
विस्थापन और पुर्नवास पर गौर करें तो बांकल के तीस परिवारों के 127 लोगों को, बोकराकछार के 38 परिवारों के 136 , सांभरधसान के 17 परिवारों के 44 , जल्दा के 74 परिवारों के 258 , कूबा के 22 परिवारों के 52 तो बहाउड़ के 66 परिवारों के 254 लोगों को विस्थापित किया गया है. ऐसे में कुल विस्थापित परिवारों की संख्या 249और इनकी कुल जनसंख्या 866 है. इनमें अधिकांश परिवार बैगा आदिवासियों का है जबकि इनमें कुछ परिवार गोड़, उरांव और यादवों का भी है.

वन विभाग का दावा है कि सभी हितग्राही परिवारों को विस्थापित कर उनका नियमानुसार पुर्नवास किया गया है लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि अभी बीस की संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जो इससे वंचित हैं.
वंचित ग्रामीणों का कहना है कि उनके साथ वन विभाग ने धोखा किया है. टाईगर रिजर्व के लिए छह गांवों में निवास करने वाले परिवारों का सर्वे 2007-08 में किया गया था, जिसके मुताबिक करीब 270 परिवार चिन्हांकित किये गये थे, लेकिन 249 परिवारों का विस्थापन किया गया.

यह कैसे हुआ इस सवाल का जवाब देते हुए रामनारायण मरकाम बताते हैं- ''वन विभाग ने जब ग्रामीणों का विस्थापन किया तो उसने अपने ही द्वारा किये गये वर्ष 2007-08 के सर्वे को गलत बताते हुए वर्ष 2004-05 में हुए सर्वे का पालन किया. जिसके कारण कई परिवारों का विस्थापन नहीं हो सका. न उन्हें खेती की जमीन मिली और न मकान और न ही कोई अन्य सुविधा. जब उन्होंने इस मामले की शिकायत वन विभाग के अफसरों से की तो उन्होंने यह वायदा किया कि जब दूसरे चरण में पांच गांवों का विस्थापन होगा तब सभी वंचितों को शामिल कर लिया जाएगा. इसलिए वे शांत रहें.''

वंचित आदिवासियों को उस समय तो अफसरों की बात पर भरोसा हो गया लेकिन आज उन्हें इस बात का अहसास हो रहा है कि वे ठगे गये हैं. बांकल के लखन सिंह भी वंचितों में शामिल है और अपने पुराने गांव से बिछुड़ने और मकान और खेती के लिए जमीन नहीं मिलने के कारण वह शून्य में निहारते रहते हैं. वह अपने भाई सुकाल सिंह के साथ रहते हैं. सुकाल सिंह ने बताया कि उनका भाई पागल हो गया है और यहां आने से पहले वह सामान्य था. उसे मकान और जमीन नहीं मिलने पर गहरा सदमा लगा है.

लखन की तरह ही इसी गांव के बारी लाल, इतवारी, अर्जुन और रामनाथ को विस्थापन और पुर्नवास का लाभ नहीं मिला है. इतना ही नहीं बांकल के मुखिया महंगु के बेटे गिरधारी भी मकान और जमीन से वंचित है. सांभरधसान के भैयालाल और जनकराम बैगा, बोकराकछार के अनंदराम पिता गुलाब सिंह, अनंद राम पिता महेत्तर, प्रमोद पिता दुकालु राम,सुरेश और फूलबाई को उनका घर और जमीन नहीं मिली. फूलबाई अपने रिश्तेदार गरीबा के साथ रहती है जबकि अन्य वंचित या तो पलायन कर गये या फिर अपने रिश्तेदारों के घर किसी तरह रह रहे हैं.

कूबा और बहाउड़ के वंचितों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. बहाउड़ में दाउ सिंह, समार सिंह, इतवारी सहित अन्य कुछ लोग अपना अधिकार नहीं पा सके हैं. इन्हें वन अधिकार अधिनियम 2006 का हवाला देते हुए उनके अधिकार से वंचित कर दिया गया है, जबकि इनका आरोप है कि उनके साथ वन विभाग के अफसरों ने जान-बूझकर ऐसा किया है. उनका जीवन अधर में लटक रहा है. न उनके पास रहने के लिए मकान है और न खेती के लिए जमीन. वे न तो वापस अपने गांव लौट सकते हैं और न नये गांव में उनका ठिकाना रहा, ऐसे में आखिर वे जायें तो जायें कहा. कुछ दिनों तक रिश्तेदारों के यहां दिन काटने के बाद अब उन्होंने भी उनसे मुंह फेर लिया है, ऐसे में वे परेशान और दुखी है. वे मानते हैं कि यदि सबसे अधिक किसी का नुकसान हुआ है तो उनका.

लेकिन जिनका कथित पुनर्वास हुआ, उनके हिस्से भी वन विभाग के कागजी वायदे ही आये. वन अधिकार अधिनियम 2006 के मुताबिक विस्थापित परिवारों को जमीन का पट्टा वैसे भी दिया जाना था लेकिन आज तक उन्हें न घर का पट्टा मिला और न खेती की जमीन का. हद तो यह हो गई कि आदिवासियों को विस्थापन करने पेशा एक्ट का उल्लंघन किया गया. वन विभाग का दावा है कि इसके लिए ग्राम सभा की सहमति ली गई है लेकिन ग्रामीण इस बात से इनकार करते हैं.

विस्थापन के पहले न तो जिला पुर्नवास समिति की बैठक हुई और न ही जिला प्रशासन के अधिकारियों से कोई चर्चा की गई. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के अनुसार पहले दिन से जिला प्रशासन को विस्थापन और पुर्नवास में शामिल करना था लेकिन वन विभाग ने ऐसा नहीं किया. यही कारण है कि शासन की योजनाओं का लाभ आदिवासियों को आज भी नहीं मिल रहा है.

पूरे देश में महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना का लाभ लोगों को मिल रहा है लेकिन बेरोजगारी की मार झेल रहे आदिवासी दूर-दराज जंगलों में या तो बांस कटाई या अन्य कार्य करने मजबूर है या फिर दिल्ली-आगरा जैसे शहरों में पलायन कर रहे हैं.


         



-सुनील शर्मा 
(एनएफआई की मीडिया फेलोशीप के तहत किये जा रहे अध्ययन का हिस्सा)
जारी...