शनिवार, 4 सितंबर 2010

एक पुरस्कार और सौ इफ्तिखार



अभिषेक श्रीवास्तव

एनडीटीवी की नीता शर्मा को साल के सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टर का पुरस्कारमिलने की खबर बुधवार को आई, तो सबसे पहले इफ्तिखारगिलानी का चेहरा आंखों में घूम गया. अभी पिछले 25 को ही तोकांस्टिट्यूशन क्लब के बाहर यूआईडी वाली मीटिंग में वह दिखे थे.

वैसा ही निर्दोष चेहरा, हमेशा की तरह विनम्र चाल और कंधे पर झोला... शायद. खबर आते ही एक एक वरिष्ठसहकर्मी उछले थे, ''गजब की रिपोर्टर है भाई... उसकी दिल्ली पुलिस में अच्छी पैठ है.'' जब मैंने इफ्तिखार काजिक्र किया, तो उन्होंने अजीब-सा मुंह बना लिया.

एक रिपोर्टर की ''दिल्ली पुलिस में अच्छी पैठ'' का होना क्या किसी दूसरे रिपोर्टर के लिए जेल का सबब बन सकताहै? टीवी देखने वाले नीता शर्मा को जानते हैं तो प्रेस क्लब और आईएनएस पर भटकने वाले गिलानी को. लेकिनटीवी और अखबारों के न्यूजरूम में कैद लोग शायद यह नहीं जानते कि अगर हिंदुस्तान टाइम्स में रहते हुए नीताशर्मा ने गलत रिपोर्टिंग नहीं की होती, तो शायद गिलानी को तिहाड़ में उस हद तक प्रताड़ना नहीं झेलनी पड़तीजिसके लिए 'अमानवीय' की संज्ञा भी छोटी पड़ जाती है.

गिलानी की लिखी पुस्तक 'जेल में कटे वे दिन' पढ़ जाएं, तो जानेंगे कि इसी दिल्ली में कैसे एक पत्रकार खुद अपनीही बिरादरी का शिकार बनता है. गिलानी की कहानी में खलनायक नीता शर्मा उतनी नहीं, जितने वे पत्रकार हैंजिन्होंने उन्हें पुरस्कांर दिया है, जिन्होंने खबरें लाने को पुलिस का भोंपू बनने का पर्याय समझ लिया है, जिनपत्रकारों ने कभी जाना ही नहीं कि आखिर आईएनएस-प्रेस क्लब और पुलिस हेडक्वार्टर के बीच की कड़ी उन्हीं केबीच जगमगाते कुछ चेहरे हैं.

हिंदू के पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने नीता शर्मा के बारे में जो लिखा है, उसे जरा देखें: ''जहां तक उस क्राइमरिपोर्टर का सवाल है जिसने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा फीड की गई स्टोरी को छापा, उसने कभी कोईमाफी नहीं मांगी. एक सहकर्मी की शादी में इस रिपोर्टर से मेरा परिचय 2004 में हुआ. मैंने जब उससे कहा किइफ्तिखार गिलानी के मामले में उसने जो हिट काम किया है, उसे लेकर मेरी कुछ आपत्तियां हैं, तो उसने कहा, 'मैंकिसी इफ्तिखार गिलानी को नहीं जानती.'

मैं नाराज तो जरूर हुआ, लेकिन सोचा कि उसे एक सलाह दे ही डालूं, 'जिन पुलिस अधिकारियों ने उस स्टोरी कोप्लांट करने में तुम्हारा इस्तेमाल किया, वे तो अपनी प्रतिष्ठा बचा कर निकल लिए, लेकिन जो तुमने किया, वहहमेशा एक पत्रकार के रूप में तुम्हारी प्रतिष्ठा पर दाग की तरह बना रहेगा, जब तक कि तुम इफ्तिखार से माफीनहीं मांग लेती.'
सिद्धार्थ आगे लिखते हैं: ''नीता शर्मा की स्टो्री पुलिस के लिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह ठीक ऐसे समय में आई, जब अनुहिता मजूमदार और इफ्तिखार के अन्य मित्रों द्वारा तैयार एक याचिका खबरों में थी. 10 जून को इस बारेमें एक छोटी-सी खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में आई थी और पुलिस आईबी को तुरंत अहसास हो गया कि किसीभी किस्म की पत्रकारीय एकजुटता को सिर उठाते ही कुचल देना उनके लिए जरूरी है.

संपादकों पर दबाव बनाया जा सकता था (और वे झुके हुए ही थे) लेकिन इफ्तिखार के पक्ष में किए जा रहे प्रचारअभियान के खिलाफ इससे बेहतर क्या हो सकता था कि उसी के द्वारा फर्जी स्वीकारोक्ति करवाई जाए कि वहआईएसआई का एजेंट रहा है.

तुरंत ऐसी खबरों की बाढ़ गई और अधिकांश भारतीय मीडिया में कलंकित करने वाली रिपोर्टें आने लगीं जिसमेंइफ्तिखार पर एक षडयंत्रकारी और आतंकवादी, तस्कर और जिहादी, यौन दुष्कर्मी और भारतीय जनता पार्टी केसांसद कभी खुद पत्रकार रहे बलबीर पुंज के शब्दों में 'पत्रकार होने का लाभ ले रहे एक जासूस' होने के आरोपलगाए जाने लगे.''

ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत सात महीने जेल में रहे कश्मीर टाइम्स के तत्कालीन ब्यूरो प्रमुख इफ्तिखारगिलानी के मामले में रिपोर्टिंग के स्तर पर सिर्फ नीता शर्मा ने, बल्कि आज तक के दीपक चौरसिया और दैनिकजागरण आदि अखबारों ने भी गड़बड़ भूमिका अदा की.

मन्निका चोपड़ा ने गिलानी से एक इंटरव्यू लिया था (जो अब भी सैवंती नैनन की वेबसाइट ' हूट' पर मौजूद है) जिसमें गिलानी ने बताया था कि दीपक चौरसिया ने उनके घर से लाइव रिपोर्ट किया कि गिलानी फरार हो गए हैं, जबकि वह घर में ही थे. दीपक चौरसिया ने 'सनसनीखेज खबर' दी कि पुलिस ने गिलानी के पास से एक लैपटॉपबरामद किया, जिसमें अकाट्य सबूत हैं. गिलानी ने साक्षात्कार में कहा, 'मेरे पास लैपटॉप है ही नहीं.'

इस साक्षात्कार के कुछ अंश देखें:

''दैनिक जागरण ने लगातार अपमानजनक रिपोर्टें छापीं और इसकी कीमत मुझे तिहाड़ जेल में चुकानी पड़ीक्योंकि अधिकतर कैदी उसी अखबार को पढ़ते थे. तीन हत्या़ओं के आरोप में कैद एक अपराधी ने मुझ पर हमलाकर दिया यह कहते हुए कि मैं भारतीय नहीं हूं, गद्दार हूं. उसने इन रिपोर्टों को पढ़ा था. कुछ हिंदी और उर्दू केअखबार खबर का शीर्षक लगा रहे थे, 'इफ्तिखार गिरफ्तार, अनीसा फरार'. (अनीसा इफ्तिखार की पत्नी हैं).

''लेकिन असल चीज जिसने मुझ पर और मेरे परिवार पर सबसे ज्यादा असर डाला, वह 11 जून को हिंदुस्तानटाइम्स में छपी चार कॉलम की स्टोरी थी जो कहती थी कि मैं आईएसआई का एजेंट हूं. यह खबर नीता शर्मा केनाम से थी. आश्चर्यजनक रूप से रिपोर्टर ने मेरे हवाले से बताया कि मैंने एक सेशन कोर्ट में सुनवाई के लिए पेशहोते वक्त स्वीकार कर लिया है कि मैं एजेंट हूं और मैंने गैर-कानूनी काम किए हैं. बाद में एक पुलिस अधिकारी नेमुझसे पूछा कि क्या मैंने किसी रिपोर्टर से बात की थी, तो मैंने इनकार कर दिया.

इसने वास्तव में मेरे परिवार को और मुझे काफी दुख पहुंचाया. अगले ही दिन मेरी पत्नी ने एचटी की कार्यकारी औरसंपादकीय निदेशक शोभना भरतिया से इसकी शिकायत की और कहा कि यह सब गलत है, उन्हें माफी मांगनीचाहिए. अखबार ने अगले दिन माफी छापी.''

सिर्फ एचटी ने ही नहीं, गिलानी के रिहा होने पर कई पत्रकारों ने उनसे माफी मांगी, खेद जताया. सिर्फ नीता शर्माउन्हें भूल गईं और कामयाबी की सीढि़यां चढ़ते हुए एनडीटीवी पहुंच गईं. आज वह सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टर भी बन गई हैं.

गिलानी पत्रकार हैं, सो मामला सामने गया. कौन जाने, कितने लोग होंगे जिन्होंने इस तरह की रिपोर्टिंग केकारण पुलिस का दंश झेला होगा और झेल रहे होंगे.

सिद्धार्थ वरदराजन ने नीता शर्मा से मुलाकात में जो कहा, वह छह साल पहले की बात है. उन्हें उम्मीद नहीं रहीहोगी कि गिलानी वाले मामले पर गलत रिपोर्टिंग में जिस व्यक्ति को वह 'पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठा पर एक दाग' झेलने की बात कह रहे थे, उसे आज मीडिया पुरस्कार देगा. लेकिन क्या गिलानी के मामले में नीता शर्मा ने जोकुछ लिखा था, उसे पत्रकारिता माना जाना चाहिये ?

पत्रकार तो इफ्तिखार हैं, जिन्होंने हुर्रियत नेता गिलानी का दामाद होने के बावजूद अपनी कलम की रोशनाई पररिश्ते् की धुंध कभी नहीं छाने दी, जबकि नीता शर्मा जैसे मीडियाकर्मी उस चरमराती लोकतांत्रिक मूल्य व्यवस्थाके लोग हैं जिसके पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे खंभे पिघल कर आज एक खौफनाक साजिश के दमघोंटू धुएं मेंतब्दील हो चुके हैं- जिसमें हर मुसलमान आतंकवादी दिखता है, हर असहमत माओवादी और हर वंचित अपराधी.

आलोक तोमर की प्रतिक्रिया

अभिषेक ने जो लिखा है वह भी लिखा जाता तो भी नीता शर्मा और उनकी तरह के पुलिस की खबरें प्लांट करनेवाले तथाकथित अपराध संवाददाताओं की चांदी हैमैं कई को जानता हूं जिनके थानों से हफ्ते बंधे हुए हैंनीताशर्मा के बारे में पता नहींनीता से ज्यादा गुस्सा उस ज्यूरी पर आना चाहिए जिसमें विनोद मेहता के नेतृत्व मेंकई बड़े नाम हैं और उन्हें एक सही अच्छा संवाददाता नज़र नहीं आयाइफ्तिखार गिलानी की गिनती हमेशा उनपत्रकारों में होती है जो जन्म और संस्कार से कश्मीरी होने के बावजूद भारत विरोधी या आलगाववाद समर्थक नहींहैंमगर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल किसी को कुछ भी बना सकती है और झूठ बोलने में तो दिल्ली पुलिस काजवाब ही नहीं हैआप मेरी कहानी भी सुन लीजिए

दिल्ली पुलिस का एक मुख्य हवलदार हुआ करता था केके पॉल उसका बेटा वकील था (अब भी है) उस समय बापकेके पॉल के जिम्मे जिन अपराधियों को सज़ा दिलवाने की जिम्मेदारी हुआ करती थी उनके सपूत अमित पॉलउनके वकील हुआ करते थेबाप का असर काम आता था और अमित पॉल ने बड़े बड़े ठगों, हत्यारों औरजालसाजों को जमानतें दिलवाईंबड़ी तगड़ी फीस मिलती थी..

ज़ाहिर है कि एक जूनियर वकील को मोटा पैसा मिले तो उसकी औकात के हिसाब से फीस उसकी और बाकी मालउसके बाप का..यही सब छापा था और पॉल सफाई देने के लिए तैयार नहीं थेइसके बाद डेनमार्क के पैगम्बर वालेहरामीपन भरे कार्टूनों को बनाने और प्रकाशित करने की मानसिकता के खिलाफ एक छोटी-सी टिप्पणी लिखी तोस्पेशल सेल वाले उठा ले गएअदालत से झूठ बोला कि बाहर दंगा हो रहा है और सीधे तिहाड़ पहुंचा दिया

वहां हाई सिक्योरिटी में और उसी वार्ड में जहां गिलानी रहे थेआतंकवादियों और हत्यारों के साथ बंद कर दियागयाऔर तो और उस मीडिया समूह के मालिक विजय दीक्षित को भी अंदर कर दिया गयाउनका कसूर ये थाकि उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय से माफी मांगी थीस्टार टीवी, आजतक और जीटीवी ने तो पुलिस हिरासत मेंमुझसे फोन पर बात की मगर थाने से मुश्किल से एक किलोमीटर दूर एनडीटीवी में यही नीता शर्मा बकवास कररही थी (मुझे बाद में पता लगा) कि मेरे डेनमार्क के उस अखबार से (जहां पैगम्बर वाले कार्टून छपे थे) सीधे संबंधहैं

वाशिंगटन से लेकर फ्रांस और लंदन से लेकर जोहानिसबर्ग के प्रेस क्लब भारत के राष्ट्रपति और गृहमंत्री को इसगिरफ्तारी के खिलाफ पत्र भेज रहे थेमेरे पास वकील को देने के लिए पैसे भी नहीं थेमगर एनडीटीवी और एकअखबार ने लिखा कि आलोक तोमर के पास करोड़ों रुपए का एक मकान है जो विवादास्पद कमाई से खरीदा गयाहैएक अखबार के संपादक एक टीवी चैनल पर बैठकर सवाल कर रहे थे कि आलोक तोमर को पत्रकार मानताकौन हैमेरे घर पर भी छापा पड़ा था और सबकुछ तितर-बितर कर दिया गया था

ऑफिस के सारे कम्प्यूटर जांच के लिए पुलिस उठा ले गई थीएक तरफ स्वर्गीय प्रभाष जोशी और स्वर्गीयकमलेश्वर बिना किसी समन के अदालत में हाजिर होकर मेरे निर्दोष होने की कसम उठाने के लिए तैयार थेदूसरी तरफ नीता जैसे पत्रकार मुझे पेशेवर आतंकवादी साबित करने पर तुले हुए थे.
इफ्तिखार गिलानी उम्र में छोटे हैं और मुझसे ज्यादा वक्त उन्होंने तिहाड़ में काटा हैकायदे से इस देश केप्रधानमंत्री वाजपेयी को या कम से कम चकाचक कपड़े पहनने वाले गृहमंत्री आडवाणी को गिलानी के चरणों परगिर कर माफी मांगनी चाहिए थी. गिलानी का कसूर सिर्फ ये था कि वो कश्मीरी हैं और दिल्ली पुलिस औरखासतौर पर स्पेशल सेल हर कश्मीरी को शक की निगाह से देखती है.

गिलानी से अनुरोध है कि तिहाड़ जेल में ही बंद सैकड़ों निर्दोष कश्मीरियों को आजाद कराने की मुहिम चलाएं औरमेरी जितनी औकात होगी मैं साथ देने के लिए तैयार हूं. आखिर में अभिषेक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

aloktomar@hotmail.com, नई दिल्ली

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

छत्तीसगढ़, जीडीपी और कुल्हाड़ीघाट



दिवाकर मुक्तिबोध, रायपुर से

छत्तीसगढ़ सरकार इस बात से प्रसन्न हो सकती है कि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़ों में उसने बाजी मारी है. 11.49 प्रतिशत की उसकी विकास दर देश में सर्वोच्च है. इस मामले में उसने विकसित गुजरात को भी पीछे छोड़ दिया है.

यही नहीं प्रति व्यक्ति औसत आय दस वर्षों में तिगुनी हो गयी है. वर्ष 2000-2001 में औसत आय 10 हजार रुपए थी, जो 2009-10 में बढ़कर 34 हजार 483 रुपए हो गयी. निश्चय ही ये आंकड़े सरकार को सुकून देने वाले हैं. लेकिन खुशी के इन लम्हों के बीच उसे विश्व बैंक की उस रिपोर्ट का भी अध्ययन कर लेना चाहिए जिसमें दुनिया के देशों में गरीबी का मूल्यांकन किया गया है. इस रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ को सबसे गरीब राज्य बताया गया है, जहां 45 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करते हैं. राज्य की यह है असलियत.

दरअसल जीडीपी में छलांग लगाने का अर्थ है अमीरों का और अमीर होना, पूंजी का केन्द्रीयकरण तथा उसका कुछ ही लोगों की तिजोरी में बंद होना. यदि सरकार इसे ही उपलब्धि मानती है तो ठीक है लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि राज्य के आर्थिक संसाधनों का यदि कोई वर्ग बेतहाशा दोहन कर रहा हैं तो वह अभिजात्य वर्ग ही है.


इस वर्ग में वे नौकरशाह और राजनेता भी शामिल हैं, जो राज्य के विकास के लिए राजकोष से निकलने वाले धन में बटमारी करते हैं. राज्य के इन दस वर्षों में भ्रष्टाचार के ऐसे-ऐसे उदाहरण सामने आए हैं कि आंखें फट जाएं. ये वो घटनाएं हैं, जो पकड़ में आई हैं. जिनका पर्दाफाश नहीं हुआ, उस बारे में अनुमान लगाया जा सकता है.

बहरहाल तमाम कमियों, अभावों को छोड़ दें तो जीडीपी दर में वृद्धि उत्साहवर्द्धक तो है ही. लेकिन कुछ क्षेत्रों, खासकर औद्योगिक क्षेत्रों के विकास से काम नहीं चलेगा. सरकार को सबसे पहले गरीबों पर ध्यान देना चाहिए. इस बारे में दावे बड़े-बड़े किए जाते हैं किंतु सच्चाई ठीक विपरीत है.

केन्द्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं के बावजूद गरीबी दूर होना तो दूर गरीब और गरीब होते जा रहे हैं. यह चिंता का विषय है. इससे साफ जाहिर है, सरकार ठीक से काम नहीं कर रही है जबकि योजना आयोग राज्य सरकार को धन देने में कमी नहीं करता. अभी हाल में उसने 13 हजार 230 करोड़ रुपए स्वीकृत किए हैं. यकीनन यह राशि कम नहीं होती.

बीते दस वर्षों में राज्य में धन का अथाह प्रवाह हुआ है. कहां गया यह पैसा? इतने पैसों में तो राज्य के 19 हजार 720 गांवों में से कुछ हजार की शक्ल तो बदल ही जानी चाहिए थी? लेकिन कितनों की बदली? राज्य के मुखिया हर साल गर्मी में हफ्ते-दस दिन के ग्राम सम्पर्क अभियान पर निकलते हैं. भरी दोपहरी में गांवों का दौरा करते हैं. ग्रामीणों से बातचीत करते हैं.

उनकी समस्याओं को देखने-समझने की कोशिश करते हैं. उनके दौरों के बाद सरकारी दफ्तरों में शिकायतों एवं आवेदनों का अंबार लग जाता है. सरकारी तौर पर ऐलान होता है कि समस्यायें निपटायी जा रही हैं, विकास कार्य शुरू हो गए हैं. तस्वीर बदल जाएगी. लेकिन हकीकत यह है कि तस्वीरें जस की तस हैं. उन पर धुंध छायी हुई है. फलत: किसी गांव की शक्ल उजली नहीं दिखती.

अगर बैठकों एवं सम्पर्क अभियानों से ही कष्ट दूर होता तो छत्तीसगढ़ के सभी गांवों में बहार आ जाती. वे पंजाब को मात देते, हरियाणा से आगे निकल जाते.


जरा गौर करें गांव की मोटी-मोटी आवश्यकताएं क्या हैं? कृषि के लिए पानी, बिजली, निस्तारी के लिए तालाब, स्वास्थ्य के लिए अस्पताल, पढ़ाई के लिए स्कूल, पीने के पानी के लिए सामान्य बंदोबस्त अर्थात नलकूप अथवा कुएं तथा गांवों का एक-दूसरे से सड़क सम्पर्क तथा इन सबका स्थायी बंदोबस्त. यानी गांव की मूलभूत आवश्यकताएं यदि पूर्ण हैं तो अभावग्रस्तता कायम नहीं रहनी चाहिए.


अभी दिक्कत यह है कि कुछ सौ गांवों में स्कूल भवन हैं तो शिक्षक नहीं, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं तो दवाइयां और डॉक्टर नहीं. नलकूप हैं तो पानी नहीं, पेयजल की व्यवस्था है तो पानी शुद्ध नहीं, राशन दुकान है तो राशन नहीं या वे समय पर खुलती नहीं. यानी व्यवस्थाएं हैं पर व्यवस्थित संचालन नहीं. इन दस वर्षों में इसमें कोई सुधार हुआ हो, ऐसा नहीं लगता.

मुख्यमंत्री ग्राम सम्पर्क अभियान के बावजूद उन प्रवासी गांवों की भी स्थिति कोई खास नहीं बदली. अब तो ग्रामसभाओं की भी शुरूआत हो चुकी है. यानी प्रत्येक छोटे-बड़े गांव में ग्रामीणों की बैठक. बैठकों का वार्षिक कैलेंडर बन गया है. ग्रामीण बताएंगे अपना कष्ट तथा बैठक में उपस्थित सरकारी अधिकारी उन्हें दूर करेंगे. किंतु अगर बैठकों एवं सम्पर्क अभियानों से ही कष्ट दूर होता तो छत्तीसगढ़ के सभी गांवों में बहार आ जाती.

वे पंजाब को मात देते, हरियाणा से आगे निकल जाते. फिर छत्तीसगढ़ पिछड़ा नहीं कहलाता. पर ऐसा नहीं है. व्यवस्थागत दोषों एवं भ्रष्टाचार की वजह से मंजिल अभी कोसों दूर दिख रही है.अब कुल्हाड़ीघाट को ही लें. रायपुर जिले के मैनपुर विकासखंड का गांव. यहां कमार आदिवासी बसते हैं. समूचा छत्तीसगढ़ जानता है कि 25 बरस पूर्व 17 जुलाई 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ इस गांव का दौरा किया था. ग्रामीणों से रूबरू हुए थे. उनकी बातें सुनी थी, हालातों का जायजा लिया था. उनकी वजह से कुल्हाड़ीघाट रातों रात प्राथमिकता की सूची में आ गया.

किंतु क्या हुआ? कमार अभी भी उसी अवस्था में जी रहे हैं. इस छोटे से आदिवासी गांव में विकास की कोई किरण नहीं पहुंची. खबरों के मुताबिक वहां अभी भी आदिवासियों के घासफूस के ही मकान हैं, सरकारी कार्यालय खुले भी तो कर्मचारियों के अभाव में उसमें ताले जड़े हुए हैं.
अस्पताल भवन अधूरा पड़ा है. नालों पर बनी पुलिया टूटी हुई है. बरसात के दिनों में गांव का टापू बनना तय है. कुल मिलाकर गांव अभी भी अभावग्रस्त हैं, जबकि आदिवासियों का विकास राज्य सरकार का संकल्प है.


राजीव गांधी प्रवास के इन ढाई दशकों में इस गांव ने कई सरकारें देखीं, कांग्रेस की भी और भाजपा की भी. राज्य के बस्तर एवं सरगुजा के आदिवासी गांवों के विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी घोषणाएं हुईं, करोड़ों-अरबों खर्च हो गए लेकिन अन्य गांवों के साथ-साथ कुल्हाड़ीघाट में भी जिंदगी ठहरी हुई है. उसमें कोई गतिशीलता नहीं. गांव का प्राय: हर बाशिंदा भूखा, नंगा और प्यासा है.

इसी तरह बिलासपुर जिले के गांव रंजना एवं धमतरी जिले के गांव दुगली की भी यही स्थिति है. ये गांव राजीव गांधी के सपनों के गांव थे पर जब प्रदेश कांग्रेस के किसी भी नेता को उनके सपनों की परवाह नहीं है तो सत्तारूढ़ भाजपा को क्या पड़ी है कि वह इन गांवों में झांककर देखें. जाहिर है, विकास के सवाल पर राजनीति के शिकार ऐसे गांवों की संख्या भी राज्य में कम नहीं है.

दरअसल ग्रामीण विकास के मामले में सरकार हमेशा कटघरे में रही है. छत्तीसगढ़ ने मप्र में रहते कम से कम 9 पंचवर्षीय योजना देखीं. दस साल से तो वह स्वतंत्र है. यानी विकास के लिए केन्द्र से मिल रही राशि में किसी और की हिस्सेदारी नहीं.

इन दस वर्षों में यदि गांवों के विकास की एकीकृत योजनाएं ढंग से लागू की जातीं, वे भ्रष्टाचार से मुक्त होतीं, इनके क्रियान्वयन पर कड़ी निगरानी रखी जाती तो आज छत्तीसगढ़ के गांव भूखे-प्यासे नहीं रहते, सैंकड़ों औद्योगिकीकरण की बलि नहीं चढ़ते, नक्सलवाद को पनपने के लिए जगह नहीं मिलती तथा ग्रामीणों एवं आदिवासियों का सही मायनों में उत्थान होता.
यानी हर गांव में आबादी के हिसाब से नलकूप, कुएं, तालाब, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्रायमरी से लेकर माध्यमिक या उच्चतर माध्यमिक स्कूल, सस्ते अनाज की दुकानें, कुटीर उद्योग, गांवों में ही रोजगार के अवसर तथा सड़कें न्यूनतम जरूरतों को पूरा कर देती. किंतु ऐसा नहीं हो पाया है इसीलिए मुख्यमंत्री के ग्राम सम्पर्क अभियान में सर्वाधिक शिकायतें इन मामूली आवश्यकताओं से संबंधित रहती हैं.

गांवों का चेहरा वही पुराना है जिस पर पड़ी सलवटें ग्रामीणों के दु:ख एवं विवशता को बयां करती हैं. जीडीपी की लंबी छलांग उनके अभावों को दूर नहीं कर रही है.



गांवों के विकास के संबंध में राजनीतिक चेतना एवं जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की बात करें तो स्थिति बिलकुल स्पष्ट है. गांवों में राजनीतिक जागरूकता पर संशय नहीं लेकिन जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति निश्चय ही गंभीर नहीं हैं. यदि गंभीर रहते तो गांवों का नक्शा कुछ बेहतर रहता. राजीव गांधी के गांव कुल्हाड़ीघाट, दुगली या रंजना को ही लें या उन गांवों की बात करें, जहां मुख्यमंत्री रमन सिंह बीते 7 वर्षों में हो आए हैं, क्या वहां आदर्श स्थितियां बन पायी हैं?

राज्य बनने के बाद अजीत जोगी तीन वर्षों तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. क्या उनके कार्यकाल में राजीव गांधी के प्रवासी गांवों की दशा, जिसमें बस्तर के भी गांव शामिल हैं, बदल नहीं सकती थी? प्रदेश के कांग्रेसी जनप्रतिनिधि, सांसदों एवं विधायकों का दायित्व केवल राजीव गांधी की जयंती अथवा पुण्यतिथि मनाने तक सीमित है? जब वे राजीव गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, तब उन्हें राजीव गांधी के छत्तीसगढ़ दौरे एवं उनके सपने याद नहीं आते? यह शर्मनाक है.

दरअसल समूचा विपक्ष सत्ता के सुर के साथ सुर मिला रहा है. जब विपक्ष निर्बल हो तो विकास के लिए दबाव की उम्मीद कैसे की जा सकती है? छत्तीसगढ़ में विकास के नाम पर आ रहे पैसे का बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार के गटर में जा रहा है. इसीलिए चाहे कुल्हाड़ीघाट हो या दुगली, गांवों का चेहरा वही पुराना है जिस पर पड़ी सलवटें ग्रामीणों के दु:ख एवं विवशता को बयां करती हैं. जीडीपी की लंबी छलांग उनके अभावों को दूर नहीं कर रही है.

यह तो गनीमत है कि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण सरल, सौम्य एवं धैर्यवान हैं. रोटी के लिए संघर्ष से न तो थकते हैं न ही निराश होते हैं. इसलिए तमाम तरह के अभाव एवं ऋणग्रस्तता के बावजूद कभी यह सुनने नहीं मिलता कि किसी किसान ने फसल चौपट होने पर आत्महत्या की हो. लेकिन उनके धैर्य एवं साहस का यह मतलब नहीं है कि उन्हें अभावों में ही जीने दिया जाए. राज्य सरकार ग्रामीण विकास के मॉडल पर भले ही अपनी पीठ थपथपाती रहे किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि गांवों में असंतोष के जो छोटे-बड़े ज्वालामुखी तैयार हो रहे हैं, वे कभी भी फट सकते हैं.

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

खाप पंचायतें या पाप पंचायतें

रघु ठाकुर

पिछले कुछ माहों में खाप पंचायतों का हस्तक्षेप बढ़ा है और सगोत्र विवाह को अमान्य करते हुए ऐसे विवाह करनेवाले युवक-युवतियों को ग्रामीण समाज की खाप पंचायतों ने कानून हाथ में लेकर स्वत: दंडित करने के फैसले किए.


अनेकों मामलों में तो एक या दोनों विवाह करने वाले पक्षोंकी हत्यायें कर दी गई हैं. अंतरजातीय विवाहों के प्रति भीइसी प्रकार की सामाजिक कट्टरता का प्रदर्शन हुआ है. चाहे झारखंड की निरूपमा पाठक का मामला हो या दिल्लीकी बबली का, संबंधित परिवारों के लोगों ने अपने घर कीलड़कियों की हत्या करना पसंद किया परंतु अंतरजातीयविवाहों को स्वीकार नहीं किया.

ऐसी घटनायें यदा-कदा पहले भी होती रही हैं परंतु वे अपवाद स्वरूप थीं. यह आश्चर्यजनक है कि शिक्षा औरतकनीक का प्रसार और उपयोग बढऩे के बाद ऐसी घटनाओं में कमी होने के बजाय अंतरजातीय विवाहों केपक्षकारों को दंडित करने की घटनायें ज्यादा बढ़ रही हैं.

लगभग चालीस वर्ष पूर्व 1960 के दशक में भोपाल के मेडिकल कालेज के एक डाक्टर की हत्या अंतरजातीयविवाह रोकने के लिए हुई थी और इसी प्रकार कुछ वर्षों पूर्व नीतीश कटारा हत्याकांड हुआ, वह भी जातीय कारणोंसे. इन घटनाओं की चर्चा मीडिया ने काफी गंभीरता से की और अपराधियों को दंड दिलाने में महती भूमिका अदाकी है.

हरियाणा के मिर्चीपुर गांव में दलित परिवारों के लडक़ों के माता-पिता को दंड का शिकार बनाया गया. हरियाणा, पंजाब और पश्चिम उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से अदालतों में उन आवेदकों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है, जो अंतरजातीय शादी करने की वजह से जातीय समाज की हिंसक प्रतिक्रिया से भयभीत है तथा न्यायपालिका केसमक्ष सुरक्षा के लिये आवेदन लगाने को लाचार है.

अनेकों प्रकरणों में न्यायपालिका ने ऐसे प्रेमी युगल को सुरक्षा प्रदान की है. तथा पंजाब के एक न्यायाधीश ने तोऐसे बढ़ते आवेदनों पर चिंता प्रकट करते हुए प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है कि प्रशासन तंत्र तब तक हस्तक्षेपनहीं करता जब तक कि न्यायपालिका आदेश दें. जबकि प्रशासन का यह वैधानिक दायित्व होता है कि वहनागरिकों को सुरक्षा प्रदान करे.

हमें इन खाप पंचायतों के तर्क पर बहस करनी होगी. इन खाप पंचायतों का कहना है कि सगोत्र विवाह हिंदू धर्म केअनुसार वर्जित है. क्योंकि सगोत्र युवक और युवतियां एक ही रक्त वाले हैं तथा भाई-बहन जैसे है. कुछ लोगों नेऔर आगे जाकर तर्क दिया कि गांव के लडक़े और लड़कियां भले वे भिन्न जाति या गोत्र के हों पर एक-दूसरे कोभाई-बहन जैसा मानते हैं या मानने चाहिये ताकि ग्रामीण समाज में विकृतियां फैल पायें.

जहां तक गोत्र का प्रश्न है, गोत्र जाति का छोटा स्वरूप है और जाति बड़ा गोत्र है. अगर एक गोत्र के लोगों के पुरखे भीएक ही माता-पिता से पैदा हुए होंगे, अगर रक्त या समान माता-पिता के तर्क पर सगोत्र विवाह पर निषेध होनाचाहिये तो फिर जातीय शादियों को भी प्रतिबंधित करना चाहिये क्योंकि वही लोग कि जो लोग लंबे अतीत से एकमाता-पिता की संतान होने के बावजूद भी जाति में शादी होने को उचित मानते हैं तथा सगोत्र के मामले में अपनेतर्क को अमान्य करते हैं. काका कालेलकर ने इसी आधार पर जाति के बाहर शादी के पक्ष में कहा था.

सगोत्र विवाह को जो लोग हिंदू धर्म या परंपराओं के विरूद्ध मानते हैं और जाति विवाह को जो लोग धर्म औरपरंपराओं के अनुकूल मानते हैं, यह दोनों दृष्टिकोण अतार्किक और गलत हैं. फिर ऐसी मान्यताओं के नाम परकट्टरतायें और हिंसा किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं हो सकते. दरअसल जातिवाद, सगोत्रवाद या खापपंचायतवाद कमजोर समाज की ऐसी बीमारियां हैं, जो ताकतवर के सामने झुक जाती हैं और कमजोर लोगों कोदबाने का प्रयास करती हैं.

जहां तक गांव के भाई-बहन के रिश्ते का सवाल है तो यह तो इतिहास की घटनाओं से सिद्ध होता है किसी तर्कसे. भगवान कृष्ण की जो गोपिकायें थी, क्या उनमें एक ही गांव की नहीं थी. कस्बा शहर एक प्रकार से बड़े गांव हैंऔर फिर इस तर्क पर चला जाये तो कस्बों और शहरों में भी परस्पर विवाह प्रतिबंधित करना होगा.
श्रीमती इंदिरा गांधी की शादी पारसी व्यक्ति के साथ हुई थी और हरियाणा, उत्तरप्रदेश तथा पंजाब के इन्हीं खापपंचायतों के सदस्यों ने इन्हें भारी मतों से जिताया था. स्व. राजीव गांधी का विवाह एक ईसाई महिला से हुआ था, परंतु खाप और जाति पंचायतों को कोई आपत्ति नहीं हुई.

हमारे देश में लंबे समय का दर्शन रहा है-समरथ को नहिं दोष गोसाई, आज यथावत जारी है. हमने समाज कोलोकतंत्र के अनुकूल ढालने का प्रयास नहीं किया है बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधि वोटों की खातिर समाज को उनकुपरंपराओं की ओर ढकेलते हैं और कट्टरपंथी समाज के सामने घुटने टेक देते हैं. स्व. राजीव गांधी ने मुस्लिमकट्टरपंथ के सामने घुटने टेके थे और लगभग सौ वर्ष से लागू महिलाओं को निर्वाह भत्ता का नियम निजी कानूनके नाम पर समाप्त कर दिया था. आज उसी निजी कानून का तर्क खाप पंचायतों के नाम पर हिंदू कट्टरपंथी दे रहेहैं.

हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, कांग्रेस पार्टी के सांसद नवीन जिंदलऔर किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत इन खाप पंचायतों का केवल समर्थन कर रहे हैं बल्कि कुछ तो उनके साथआंदोलन की धमकी दे रहे हैं.

निजी कानून का जनतांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता. संसदीय लोकतंत्र में समाज की बेहतरी के लिएऔर व्यापक हितों को ध्यान में रखकर व्यक्ति और समूह स्वयंभू अपने अधिकारों और परंपराओं को राज्य केकानून के समक्ष त्यागते हैं. समाज का व्यापक विवेक व्यक्ति या छोटी इकाई के विवेक से सदैव श्रेष्ठ और श्रेयस्करमाना जाता है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का राज्य लागू होता है. बड़े से बड़े अपराधी को भी केवल वैधानिकप्रक्रिया से दंडित किया जा सकता है. व्यक्ति शिकायतकर्ता हो सकता है परंतु स्वत: निर्णय करने वाला न्यायाधीशनहीं हो सकता.

समाज में फैले रही यौन विकृतियों के बारे में वास्तव में अगर पंचायत वालों को चिंता है तो उन्हें कारणों की खोजकरना चाहिये जो समाज में विकृतियां फैला रहे हैं. सैकड़ों टीवी चैनलों के माध्यम से इस प्रकार नग्नता भरेकार्यक्रम रोज आते हैं. समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठ पर जिस प्रकार अर्धनग्न चित्र छापे जाते हैं, इनके प्रति ये खापपंचायतें कभी आक्रोश व्यक्त नहीं करतीं.

सभ्यता को नष्ट करने के इन वास्तविक केंद्रों के प्रति अगर वे चिंता करतीं तो उचित होता बजाय इसके कि फैलानेतंत्र के तो वे हिस्सेदार बने और फिर विकृतियों के प्रति शिकायत करे.

पता नहीं किस सोच के आधार पर मीडिया ने हत्याओं कोआनर किलिंगकहना शुरू कर दिया. क्या इन हत्याओंसे समाज के सम्मान की रक्षा हो सकती है? सम्मान की परिभाषा क्या है ? ये बेगुनाह हत्यायें हैं, जिनके पीछेअंधविश्वास अतार्किकता कारण है. अगर समाज या खाप पंचायत इन्हें अनुचित मानती हैं तो इनका बहिष्कारहो सकता है, परंतु हत्या करना एक जघन्य अपराध है, जो अक्षम्य है और खाप पंचायतों का पाप भी.