रविवार, 28 दिसंबर 2025

एसआईआर  ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होने के बाद लोगों को नाम कटने की आशंका, नाम कैसे खोजे, कौन-कौन से तरीके हैं, ये बता रहे ताकि जिनके कट गए वे जुड़वा सकें‎


इपिक नंबर, नाम या मोबाइल ओटीपी से देखें वोटर लिस्ट में नाम, यदि न हो तो फॉर्म छह भरें‎


बिलासपुर‎

ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में नाम होने या न होने‎की जानकारी जांचने के लिए चुनाव आयोग‎ने तीन आसान तरीके दिए हैं। लोग इपिक‎नंबर, अपने व्यक्तिगत विवरण जैसे कि‎नाम, पिता का नाम, राज्य आदि के माध्यम‎से अपना नाम खोज सकते हैं। साथ ही वे‎मोबाइल नंबर के माध्यम से नाम की‎तलाश कर सकते हैं। यदि नाम नहीं है तो‎उन्हें जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 भरकर जमा‎करना होगा। एसआईआर का पहला चरण‎(4 नवंबर से लेकर 18 दिसंबर) पूरा हो‎चुका है। चुनाव आयोग ने 23 दिसंबर को‎ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी की।‎ उप जिला‎निर्वाचन अधिकारी शिवकुमार बनर्जी ने‎बताया कि लोगों को इसके लिए परेशान‎होने की जरूरत नहीं है। वे बहुत ही‎आसानी से अपना नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट‎में खोज सकते हैं। इसके​ लिए उन्हें गूगल‎पर वोटर्स डॉट ईसीआई डॉट जीओवी‎डॉट इन टाइप करना होगा। इसमें इपिक‎नंबर, अपने व्यक्तिगत विवरण जैसे कि‎नाम, पिता का नाम, राज्य आदि के माध्यम‎से अपना नाम खोज सकते हैं। साथ ही वे‎मोबाइल नंबर टाइप कर ओटीपी के‎माध्यम से भी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में अपने‎नाम की तलाश कर सकते हैं।‎

बड़ी संख्या में कटौती से मतदाताओं में हड़बड़ी‎‎

मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटने के बाद आम लोगों में चिंता‎बढ़ गई है। कई मतदाता आशंकित हैं कि कहीं उनका नाम भी तो लिस्ट से‎नहीं कट गया। इसी डर के कारण लोग ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में नाम जांचने‎के लिए तेजी से ऑनलाइन और कार्यालयों का रुख कर रहे हैं।‎

ऐसे ऑनलाइन चेक करें अपना नाम‎

 सबसे पहले आधिकारिक वेबसाइट voters.eci.gov.in पर जाएं।‎

 होमपेज पर दाईं ओर ऊपर दिए गए ‘Search your name in‎voter List विकल्प पर क्लिक करें।‎

 क्लिक करने पर सर्च के तीन ऑप्शन आएंगे।‎

 पहला वोटर आईडी कार्ड नंबर दर्ज कर सर्च कर सकते हैं।‎

 दूसरा अपना नाम, पिता का नाम, राज्य आदि के माध्यम से नाम‎खोज सकते हैं।‎

 तीसरा मोबाइल नंबर के माध्यम से नाम खेाज सकते हैं। नंबर दर्ज‎करने पर ओटीपी आएगा और उसे दर्ज करने पर नाम सर्च हो जाएगा।‎

 तीनों ऑप्शन में बताया गया कैप्चा टाइप करना होगा।‎‎


ड्राफ्ट लिस्ट में जिले के 3.63 लाख मतदाता बाहर‎

जिले में कुल 16 लाख 75 हजार 770 मतदाताओं में से केवल 13 लाख‎12 हजार 223 नाम ही ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल हैं। वहीं 3 लाख‎63 हजार 547 मतदाताओं के नाम सूची से कट गए हैं। इनमें मृत, स्थायी‎रूप से शिफ्ट हुए, लंबे समय से अनुपस्थित और दो बार फॉर्म भरने वाले‎मतदाता शामिल हैं।‎

 

घोषणा पत्र से जुड़ेंगे नाम‎

‎‎‎‎यदि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में नाम नहीं है, तो‎22 जनवरी तक फॉर्म 6 और घोषणा पत्र‎जमा कर नाम जोड़ा जा सकता है।‎घोषणा पत्र में यह बताना होगा कि 2003‎की मतदाता सूची में नाम था या नहीं। यदि‎नाम नहीं था, तो माता-पिता का इपिक‎नंबर देना होगा। यदि माता-पिता का नाम‎भी सूची में नहीं था, तो 11 में से किसी‎एक दस्तावेज के आधार पर नाम जोड़ा‎जा सकता है। पहले केवल जन्म और‎निवास प्रमाण पत्र के आधार पर नाम‎जोड़ा जाता था।‎

रविवार, 28 जुलाई 2013

दीपक करते हैं गूगल में बदलाव

सुनील शर्मा बिलासपुर

गूगल, गूगल क्रोम, जी-मेल जैसे ४० से अधिक साइट के यूजर्स के सुझावों और शिकायतों को समझकर उनके हिसाब से बदलाव लाने की जिम्मेदारी शहर के युवा दीपक तिवारी संभालते हैं। वे दुनिया के सबसे लोकप्रिय सर्च इंजन 'गूगल' में बिजनेस एनालिटिक्स के सीनियर मैनेजर हैं। आईआईटी खडग़पुर की पढ़ाई के बाद अमेरिका पहुंचे तो कई पड़ावों को पार कर वे इस मुकाम पर पहुंचे। उनकी पत्नी सुप्रिया बोस्टन यूनिवर्सिटी में कैंसर पर रिसर्च कर रहीं हैं। मस्तूरी के लोहर्सी में उनका पुश्तैनी मकान और जमीन-जायदाद है। दीपक का बचपन बिलासपुर में ही बीता।

 दीपक दुनियाभर के उपभोक्ताओं की रुचि व संतुष्टि का ख्याल रखने की दिशा में काम करते हैं। गूगल के गूगल क्रोम, जी-मेल जैसे 40 से अधिक साइट्स हैं। इन्हें लेकर यूजर्स के सुझाव व शिकायतें आती हैं। इनके आधार पर ही वे डेटा कलेक्ट कर प्रोडक्ट में बदलाव लाने या नया प्रोडक्ट बनाते हैं। वे विभिन्न डिवाइस खरीदने वालों की रुचि का ख्याल भी रखते हैं। उन्हें ये सुझाव हैल्प सेंटर व हैल्प फोरम के जरिए दुनियाभर से मिलते हैं। उनके पास एक टीम है जो कई भाषाओं के यूजर्स को डील करती है। वे अपने काम में एडवांस मैथमेटिक्स यूज करते हैं।
गूगल में बड़े पैकेज पर काम कर रहे दीपक भविष्य में वतन लौटना चाहते हैं। वे उन हजारों युवाओं को गाइड भी करना चाहते हैं, जो टैलेंटेड होने के बाद भी सही मार्गदर्शन व जानकारी न मिलने से भीड़ में कहीं खोते जाते हैं।
इसी ध्येय से वे यहां कुछ दिनों तक शहर के एक कोचिंग सेंटर में युवाओं को पढ़ा चुके हैं। दीपक बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर व हाईटेक्नालॉजी के पक्षधर हैं, लेकिन जीवन में सरलता बनाए रखने की बात भी कहते हैं।

शिकागो से सपनों को लगा पंख

दीपक के टैलेंट को पहली बार रायपुर के सलेम इंग्लिश मीडियम स्कूल में पहचाना गया। इसके बाद दीपक ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2001 में आईआईटी खडग़पुर से पासआउट हुए और अमेरिका पहुंच गए। वहां जॉब की शुरुआत आसान नहीं थी। शिकागो की केटरपिलर कंपनी में सीनियर मैनेजर के रूप में ब्रेक मिला तो सपनों को पंख लग गए। फिर डेलोइट में सीनियर कंसल्टेंट व एसेंटर में इंगेजमेंट मैनेजर के पद पर काम किया। जून 2011 में दीपक को गूगल का ऑफर मिला। गूगल में बड़े पैकेज पर काम कर रहे दीपक भविष्य में वतन लौटकर उन हजारों युवाओं को गाइड भी करना चाहते हैं, जो टैलेंटेड होने के बाद भी सही मार्गदर्शन न मिलने से भीड़ में कहीं खोते जाते हैं।

पत्नी सुप्रिया पर नाज

दीपक ने रायपुर के प्रमोद व माधुरी शर्मा की बेटी सुप्रिया से शादी की है। सुप्रिया बोस्टन यूनिवर्सिटी में कैंसर पर रिसर्च कर रही हैं। रविशंकर यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के बाद वे स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में रिसर्च कर चुकी हैं। शांत व सरल सुप्रिया पर दीपक को नाज है।

आती है वतन की याद

बकौल दीपक, 'दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट सर्च इंजन 'गूगल' में जिम्मेदार पद पर साढ़े 10 घंटे लगातार काम करने के बाद जब भी रिलेक्स होता हूं, अपने घर और शहर की याद सताने लगती है। सोचता हूं, उड़कर उन गलियों में पहुंच जाऊं जहां बचपन बीता है।' अमेरिका के माउंटेन व्यू में भव्य कार्पोरेट ऑफिस हो या फिर सेन फ्रांसिस्को की पोक स्ट्रीट का अपार्टमेंट... वहां दीपक को अपने बचपन की नादानियां और दोस्त अक्सर याद आते हैं। शहर में भी बार-बार आना भी आसान नहीं है... लेकिन जब भी मौका मिलता है, वे घरवालों और रिश्तेदारों से मिलने के लिए अपने वतन पहुंच जाते हैं। एक रिश्तेदार की शादी ने यह मौका दिया तो वे खुद को नहीं रोक सके। एनआरआई दीपक गूगल के कंज्यूमर ऑपरेशन ग्रुप से जुड़े हैं और बिजनेस एनालिटिक्स के सीनियर मैनेजर हैं। यह डिपार्टमेंट गूगल के प्राफिट, लॉस के अलावा गूगल यूजर्स की रुचि, संतुष्टि, शिकायतों पर नजर रखता है। दीपक के पिता ईश्वरलाल तिवारी व मां विमला तिवारी शहर में मुख्य डाकघर के पास विमला सदन में रहते हैं।

दीपक कहते हैं...
१. छत्तीसगढ़ ही नहीं, भारत में एजुकेशन फेसिलिटी बढ़ रही है, लेकिन काफी कुछ करना बाकी है।
२. प्रगतिशील देश की अपनी चुनौतियां होती हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

आठवीं पास मनीराम ने छेड़ी फेसबुक पर जंग


सुनील शर्मा.बिलासपुर

शायद यह पहला मामला है जब किसी ग्रामीण
 महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना
(मनरेगा) के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने और इसका विरोध करने के उद्देश्य से सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर अपना एकाउंट बनाया है।

खुद मुंगेली जिले के लोरमी ब्लाक के ग्राम बोईरपारा के 34 वर्षीय मनीराम कैवर्त ने नवंबर 2012 के पहले कभी इसके बारे में नहीं सोचा था। लेकिन उसने अगली पीढ़ी के भविष्य के लिए मनरेगा के खिलाफ जंग छेडऩे का मन बनाया। तभी आर्थिक कारणों से उसे गांव छोडऩा पड़ा।

मनरेगा में मजदूरी नहीं मिली तो वह काम की तलाश में भटकता हुआ गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी कोनी पहुंचा जहां उसके रिश्तेदार की मदद से रोजी-मजदूरी का काम मिला। कुछ दिनों बाद उसने अपने मित्रों से संपर्क कर अपनी इच्छा बताई। मित्रों ने उन्हें फेसबुक और इसके व्यापक परिणाम से अवगत कराया। मनीराम ने अपने एक दोस्त की मदद से 19 नवंबर 2012 को फेसबुक पर अपना एकाउंट बनाया लेकिन उसने अपना इमेल आइडी मनी बोईरपारा ही रखा ताकि गांव का नाम उससे किसी भी तरह अलग न हो पाए। गांव का नाम थोड़ा अलग होने के बाद भी उसने इसकी चिंता नहीं की।

 इसके बाद उसने एक-एक कर कई खुलासे किए। उसने दस्तावेज के साथ गांव में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े निर्माण कार्यों की तस्वीर भी शेयर की। फेसबुक पर मनी के विधायक सौरभ सिंह,पिछड़ा वर्ग अध्यक्ष सोमनाथ यादव,समाजवादी आनंद मिश्रा के साथ ही राजनीति,शिक्षा,पत्रकारिता और युवा जगत के 122 मित्र है। उसके शेयर पर अब कमेंट भी आने लगा है। मनीराम को उम्मीद है कि उसका आदर्श गांव बनाने का सपना एक दिन जरूर पूरा होगा और इसमें फेसबुक उसकी मदद करेगा।

ये किया शेयर

0 19 नवंबर 2012 को मनीराम ने सांसद निधि से स्वीकृत पांच लाख के सीसी रोड के प्रगति प्रतिवेदन की छायाप्रति की तस्वीर शेयर कर बताया कि काम शुरू ही नहीं हुआ है।
0 उसने दिसंबर में आरटीआई द्वारा सूचना मांगने पर धमकी मिलने की बात शेयर की।
0 सजग ने उसे हौसलाभरा पत्र भेजा जिसे भी उसने शेयर किया।
0 22 जनवरी को गांव की पांच तस्वीरे शेयर की-1-गोशाला बन चुके पंचायत भवन,2- खेल मैदान में भ्रष्टाचार की जानकारी देता युवक ,3-गुणवत्ताहीन निर्माणाधीन प्रधानपाठक कक्ष,4-सरपंच के देवर द्वारा श्मशान भूमि पर कब्जा कर बना मकान,5-पंचायत के एक भवन पर कब्जा।

सजग ने दिया हौसला

आरटीआई के तहत सूचना मांगने पर धमकी मिलने से परेशान मनीराम ने फेसबुक पर इसे सांझा किया तो तो सोशल एंड ज्यूडिशयल एक्शन ग्रुप(सजग) ने मनीराम को एक पत्र लिखा। सजग के संयोजक विनोद व्यास ने सूचना के अधिकार को लेकर मनीराम द्वारा किए जा रहे कार्यों की प्रशंसा करते हुए  किसी भी तरह के समाज विरोधी लोगों से डरे बिना समाज को बेहतर बनाने की दिशा में काम करते रहने का हौसला दिया। यह भी कहा कि सजग के साथी हमेशा उनके साथ है।

ऐसे मिली प्रेरणा

13 अक्टूबर 2012 को केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के निर्देश पर सेंटर फॉर इकानामिक एंड सोशल स्टडीज की सेंट्रल टीम गांव का सर्वे करने पहुंची तो उन्होंने युवा मनीराम से गांव में मनरेगा के कार्यों को लेकर देर तक चर्चा की। मनीराम ने उन्हें भ्रष्टाचार की जानकारी दी तो उन्होंने इसके लिए उन्हें आवाज उठाने कहा। इसी दिन से युवा ग्रामीण ने मनरेगा में भ्रष्टाचार करने वालों को सबक सिखाने का मन बनाया।

मित्रों मैं गांव का एक गरीब किसान हूं और महज आठवीं तक ही पढ़ सका हूं । मुझे अपने ग्रामीण होने पर गर्व है लेकिन दुख इस बात का है कि वहां भ्रष्टाचार ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। मनरेगा में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लडऩे के लिए अपने मित्र के सुझाव और सहयोग से मैंने फेसबुक ज्वाइन किया है...उम्मीद है आप सभी से मुझे मदद मिलेगी। 
                                                                                                     मनीराम कैवर्त,फेसबुक पर

शनिवार, 2 मार्च 2013

आस्कर में बिलासपुर का नाम

सुनील शर्मा. बिलासपुर
विनीत चतुर्वेदानी


मशहूर विदेशी निर्देशक आंग ली की फिल्म लाईफ ऑफ पाई ने चार आस्कर अवार्ड जीतकर पूरी दुनिया को चौंका दिया है लेकिन कम ही लोगों को पता है कि इस फिल्म में बिलासपुर का भी योगदान है। चार में से एक अवार्ड बेस्ट विजुअल के लिए मिला है जिसमें मैच मूवर की भूमिका निभाने वाले संतोष डे और विनीत चतुर्वेदानी कुछ साल पहले शहर में विजुअल इफेक्ट की पढ़ाई कर चुके हैं।

2006-07 में एरीना मल्टीमीडिया में विजुअल इफेक्ट की पढ़ाई करने संतोष डे और विनीत चतुर्वेदानी आए थे। उन्होंने मन लगाकर यहां पढ़ाई की। पूरे एक साल विजुअल इफेक्ट के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने के बाद इन प्रतिभाशाली छात्रों को हॉलीवुड की नामी कंपनी रिदम एंड ह्यूज ने नौकरी दी। वहां भी इनका प्रदर्शन जारी रहा।
संतोष डे

विजुअल इफेक्ट में अपनी स्किल का बखूबी उपयोग करने वाले इन दो नौजवानों को उस समय लाईफ ऑफ पाई में ब्रेक मिला जब प्रोड्यूसर ने रिदम एंड ह्यूज के साथ फिल्म के विजुअल्स के लिए कांट्रेक्ट किया। फिल्म की अधिकांश शूटिंग भारत में हुई और इसमें स्पेशल विजुअल इफेक्ट में संतोष और विनीत ने अपनी कला का कौशल दिखाया। 


एक मंझे हुए मैच मूवर की भूमिका निभाते हुए उन्होंने अपना काम तल्लीनता से किया। यहीं वजह है कि फिल्म को विजुअल के लिए भी आस्कर मिला। रिदम एंड ह्यूज के दो स्टूडियो हैदराबाद व मुंबई में हैं। संतोष और विनीत हैदराबाद स्टूडियो में कार्यरत है।

एरीना मल्टीमीडिया के संचालक संदीप गुप्ता कहते हैं कि संतोष और विनीत शुरू से टैलेंटेड है। 2006-07 बैच में वे जब यहां विजुअल इफेक्ट की स्टडी के लिए आए थे तभी उन्हें लगता था कि ये एक दिन बड़ा मुकाम हासिल करेंगे। उनका अनुमान सही निकला। फिल्म को बेस्ट विजुअल के लिए आस्कर का अवार्ड मिलना उनके लिए भी गर्व की बात है क्योंकि उनके संस्था में पढ़े स्टूडेंट की उसमें प्रमुख भूमिका रही है। 

विजुअल्स में मैच मूवर की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है.पूरा भरोसा है कि आगे भी वे इसी तरह तरक्की करते रहेंगे। संतोष और विनीत की उपलब्धि से वर्तमान में अध्ययनरत स्टूडेंट्स का हौसला बढ़ा है। वे भी संतोष और विनीत की तरह अपना मुकाम हासिल करना चाहते हैं।
                                                                                      -  
संदीप गुप्ता,संचालक, एरीना मल्टीमीडिया


   भाई अनुपम सिंह (दैनिक भास्कर) को सादर आभार.

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

कहानी नरेंद्र की...

सुनील शर्मा. बिलासपुर
दर्द में तड़प उठता है नरेंद्र

16 साल का नरेंद्र रह-रहकर उठने वाले दर्द से बेतहाशा चीखने लगता है। वह न तो किसी से मिलना चाहता है और न ही उसे कोई चीज अच्छी लग रही है। गुस्से में वह गले के सपोर्ट के लिए लगे पट्टे को खींचने लगता है। थोड़ी-थोड़ी देर में उसकी आंखों से आंसू बहने लगता है। जुबान से तो कुछ भी नहीं बोल सकता, अपनी इन्हीं हरकतों से दर्द बयां करता है।

 पिछले पखवाड़ेभर से वह अस्पताल के बेड पर दर्द से कराह रहा है, लेकिन उसकी सुध लेने के लिए कोई नहीं आया। डॉक्टर बताते हैं कि वह अपने पैरों पर चल सका तो यह किसी करिश्मा से कम नहीं। उसके ठीक होने की उम्मीद सिर्फ एक फीसदी है।

गुरुकुल पेंड्रा में कक्षा दसवीं का छात्र नरेंद्र सिदार 15 सितंबर को जिम्नास्टिक के अभ्यास के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गया। जंप के दौरान वह सिर के बल गिरा और गले के पास रीढ़ की हड्डी टूट गई। गले की नस दबने के साथ ही क्षतिग्रस्त भी हो गई। गुरुकुल में उसे जिम्नास्टिक का अभ्यास पूर्व कबड्डी खिलाड़ी और व्यायाम शिक्षक आरसी यादव करा रहे थे। यादव सीनियर कोच हैं, लेकिन जिम्नास्ट के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। दरअसल, गुरुकुल में जिम्नास्ट कोच नहीं है। नतीजतन, एक गैर जानकार कोच की देखरेख में अभ्यास करते हुए नरेंद्र घायल हो गया।


 इतना ही नहीं, उसके इलाज में भी देर की गई। किसी तरह उसे अपोलो हास्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां उसका आपरेशन करने से मामूली सुधार हुआ, लेकिन इलाज के बढ़ते खर्च के कारण परिजनों ने उसे डिस्चार्ज करा लिया। पैरालिसिस से पीडि़त नरेंद्र अब गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग केंद्र अस्पताल में भर्ती है। डाक्टरों के मुताबिक उसे रिहेबलिटेशन के लिए रखा गया है। 

अब तक इलाज पर पौने तीन लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। गनियारी हास्पिटल में उसे अन्य मरीजों से अलग आपरेशन थिएटर से लगे हुए कमरे में रखा गया है। वहां उसकी हालत शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूप से खराब है। रह-रहकर उसे चोट की वह घटना याद आ जाती है और वह सिहर उठता है। 

आपरेशन के बाद उसके गले में पाइप और पट्टा लगा है। जिसे वह बार-बार खींचने की कोशिश करता है। उसकी स्थिति पागलों जैसी हो गई है। बेड पर हो या व्हील चेयर में वह अपनी हरकत जारी रखता है। किसी भी नए आदमी को देखकर तो उसकी हालत और खराब हो जाती है, वह चीखने-चिल्लाने लगता है। पिता खुलास और चचेरा भाई वीरेंद्र उसकी देखभाल के लिए अस्पताल में हैं। उसकी गंभीर हालत को देखकर उनका भी धीरज जवाब दे देता है। वे बारी-बारी से कमरे के बाहर आकर बैठ जाते हैं। 


उनके चेहरे पर भी चिंता की लकीरें खींच गई है, क्योंकि उन्हें नरेंद्र के पहले की तरह होने का भरोसा नहीं रहा। खुलास ने कहा कि डाक्टर ने उनसे कहा है कि नरेंद्र की हालत ठीक हो जाएगी, लेकिन उसे नहीं लगता कि ये सच है। डाक्टर ने उन्हें दिलासा देने के लिए ऐसा कहा है। वह पहले की तरह कभी नहीं हो पाएगा। कुछ ऐसा ही मानना वीरेंद्र का भी है। पिछले 13-14 दिनों से वह नरेंद्र के साथ है, लेकिन वह उनसे बात नहीं कर पाता। इशारों में वह बात करता है और चिल्लाकर उन्हें बताता है कि उसे बहुत दर्द है।

 पिता और भाई चाहकर भी उसे दिलासा नहीं दे पाते। गांव गढग़ोढ़ी में मां तितर बाई को अपने बेटे की चिंता सता रही है और अपने पति से फोन पर बात करते हुए वह रो पड़ती है। खुलास अपने भाग्य को कोसते हुए भगवान से नरेंद्र को स्वस्थ करने के लिए प्रार्थना कर रहा है।

भाई वीरेंद्र और पिता खुलास
समस्या म हावन... का करन

नरेंद्र जांजगीर-चांपा जिले के सक्ती के पास ग्राम गढग़ोढ़ी का रहने वाला है। गुरुकुल से पहले वह अमलडीहा में पढ़ता था। उसके घायल होकर अपोलो में भर्ती होने से उसका परिवार बैकफुट में आ गया है। उसके गरीब परिवार को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है।

 नरेंद्र के पिता खुलास राम ने दैनिक भास्कर को समस्याग्रस्त होने की जानकारी देते हुए बेटे के घायल होने पर दुख व्यक्त किया। उसने छत्तीसगढ़ी में कहा समस्या म तो हावन, का करन...सब किस्मत के खेल हे। भगवान बने-बने नइ रहेन देत हे...। डाक्टर मन कहत हे के ओखर नरी (गला) के हड्डी टूट गय हे। 


महीनों चलेगा इलाज, किस्मत से है जिंदा

गनियारी हास्पिटल के डाक्टर और नरेंद्र के केस को शुरू से ही देख रहे डा. रमन कटारिया का कहना है कि इलाज में महीनों लग सकते हैं। अभी उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। रिहेबलिटेशन के लिए उसे लाया गया है, जहां उसकी फिजियोथेरेपी सहित ट्रीटमेंट के कुछ अन्य तरीकों को आजमाया जा रहा है। अभी जितनी रिकवरी होनी थी वह हो चुकी है, अब छह महीने से सालभर तक स्लोवर रिकवरी के चांस है।

जब यह केस उनके पास आया था तो उन्होंने ही डा. शर्मा को नरेंद्र का ट्रीटमेंट करने कहा था। उसकी हालत इतनी खराब थी कि यदि उसे सिम्स से रायपुर भेजा जाता तो उसका बचना मुश्किल था। वह जिंदा है, यह उसकी बड़ी किस्मत है। यह एक गंभीर केस है, जिसे स्टाफ गंभीरता से ले रहा है।

चल सका तो चमत्कार

नरेंद्र का आपरेशन अपोलो हास्पिटल के न्यूरो सर्जन डॉ.सुनील शर्मा ने किया है। उन्होंने दैनिक भास्कर को बताया कि नरेंद्र की रिकवरी के 99 फीसदी चांस नहीं है। उसे बेहद गंभीर हाल में अपोलो लाया गया था। उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी, जबकि गले की नस दबने के साथ ही खराब भी हो गई थी। वह छाती भी नहीं फुला पा रहा था क्योंकि उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। यह अपनी तरह का एक गंभीर केस था। उसके परिजन और गुरुकुल स्टाफ को बताया गया कि आपरेशन के बाद भी नरेंद्र ठीक हो पाएगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता, लेकिन कोशिश की जा रही है। 

उनकी सहमति से आपरेशन किया गया। आपरेशन के दौरान उसके गले की नस को दुरुस्त किया गया है। साथ ही टूट चुकी रीढ़ की हड्डी को सपोर्ट दिया गया है। आपरेशन के बाद उसकी हालत में पहले से कुछ सुधार तो हुआ है, लेकिन चोट इतनी अधिक है कि आगे कुछ कहा नहीं जा सकता। वह शायद ही सामान्य लोगों की तरह अपना जीवन जी सके। अगर वह अपने पैरों पर चल सका तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।

इनका कहना है...
 

ऐसा नहीं है कि जिम्नास्ट के जानकार नहीं हैं। कई खिलाडिय़ों ने राज्य स्तरीय स्पर्धा में अपना जौहर दिखाया है। स्पोट्र्स में चोट लगना आम बात है। नरेंद्र के इलाज में विभाग और गुरुकुल स्टाफ ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब उसकी हालत ठीक है और उसका फिजियाथैरेपी होना है।
सीएल जायसवाल, संयुक्त संचालक, आदिम जाति विकास विभाग, बिलासपुर

मैं मानती हूं कि गुरुकुल में जिम्नास्ट का कोई स्पेशल कोच नहीं है, लेकिन सालों से बच्चे इसी तरह व्यायाम शिक्षक की निगरानी में प्रेक्टिस कर रहे हैं। उनके कार्यकाल में कभी कोई घटना नहीं हुई। नरेंद्र का गिरना एक सामान्य घटना है। मुझे इस बारे में ज्यादा नहीं पता इसलिए बेहतर होगा आप व्यायाम शिक्षक सुशील मिश्रा से बात करें।
प्रसन्ना बरला, प्राचार्य, गुरुकुल पेंड्रारो


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नरेंद्र की पूरी कहानी 29 सितंबर,1अक्टूबर को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई है।पेंड्रा एसडीएम सारांश मितर ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए है। देखना होगा कि नरेंद्र को न्याय मिलता है या एक बार फिर प्रशासन दोषियों पर कार्रवाई करने की बजाय उन्हें बचा लेगा।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

उतर गया जेनेरिक का जिन्न




सुनील शर्मा, बिलासपुर

जेनेरिक दवाइयों के जरिए महंगे इलाज को सस्ता बनाने का सरकारी दावा फेल होता नजर आ रहा है। राज्य में जेनेरिक दवा के नाम पर जेनेरिक-ब्रांडेड दवाओं की बिक्री की जा रही है। इनके एवज में दोगुने से अधिक कीमत ली जा रही है। इतना ही नहीं, सरकारी अस्पताल के मरीजों को झांसा देने के लिए रेडक्रास मेडिकल शॉप द्वारा इन दवाओं पर 40 फीसदी तक की छूट दी जा रही है।

 दवा में इतनी अधिक छूट मिलने से लोगों को यह पूरा माजरा समझ में नहीं आ रहा है। हमने बिलासपुर के रेडक्रास मेडिकल शॉप में पड़ताल की तो जेनेरिक दवा के नाम पर हो रही लूट का खुलासा हुआ। 

फिल्म अभिनेता आमिर खान के शो ‘सत्यमेव जयते’ के एक एपिसोड के बाद पूरे देश में मरीजों के लिए सस्ती दवाओं के रूप में जेनेरिक दवाइयां बेचने की मांग शुरू हुई है। इसी दौरान छत्तीसगढ़ में भी राज्य सरकार ने अंबिकापुर में जन औषधि केंद्र खोलकर वहां पहले से ही सस्ती दवा बिकने की बात प्रचारित की। लेकिन वहां जेनेरिक के नाम पर ब्रांडेड कंपनियों की दवा बेचने की शिकायत मिली। 

पिछले दिनों  जिला अस्पताल बिलासपुर  के  रेडक्रास मेडिकल शॉप में एक डाक्टर की पर्ची के आधार पर तीन दवाएं सिप्रोफ्लेक्सिन, डाइक्लोफिनेक और सिट्रेजीन मांगने पर इसी फार्मूले की सिप्रोडेक, रिएक्टिन और इंस्टेजिन टेबलेट दी गई। इन सभी को दुकानदार ने जेनेरिक दवा बताया। सिप्रोडेक-50 रुपए, रिएक्टिन 13.86 रुपए और इंस्टेजिन 20 रुपए सहित कुल 80 रुपए दुकानदार ने लिए। जबकि रैपर पर इनकी कीमत क्रमश: 64.02, 19.35 और 32 रुपए थी। दुकानदार ने 40 फीसदी छूट देने की बात कही। डिस्काउंट की आड़ में दुकानदार ने कई गुना अधिक कीमत की दवा थमा दी। हालांकि उसने बिल क्रमांक डीए-65618 में डिस्काउंट का जिक्र भी किया, लेकिन इस छूट के पीछे की असली कहानी कुछ और ही है। 

स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल दवाइयों का नया स्टाक नहीं आने का हवाला देते हुए इस मामले को अलग बता रहे हैं। आगे वे कहते हैं कि वर्तमान में रेडक्रास मेडिकल शॉप में पुराना स्टाक है। नया स्टाक आने पर नए सिरे से दर तय कर सस्ती दर पर जेनेरिक दवाइयां मरीजों को उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाएगा।

ऐसे ली जा रही अधिक कीमत

0 सरकार के ही जन औषधि केंद्र की सूची के मुताबिक सिप्रोफ्लेक्सिन 500 एमजी के 100 जेनेरिक टेबलेट की कीमत 215 रुपए है, जबकि दुकानदार ने जेनेरिक-ब्रांडेड के सिर्फ 10 टेबलेट देकर 50 रुपए ले लिए। तय दर के मुताबिक ये टेबलेट 21 रुपए के थे, यानी जेनेरिक की जो टेबलेट 2.15 रुपए में मिलती, वह 5 रुपए में बेची जा रही है।

0 डाइक्लोफिनेक सोडियम आईपी 50 एमजी की बात करें तो इसके 100 जेनेरिक टेबलेट का मूल्य 21 रुपए है और इसी फार्मूले की 10 टेबलेट देकर रेडक्रास मेडिकल शॉप ने 13.86 रुपए लिए, यानी कई गुना अधिक।
0 सिट्रेजीन की 100 जेनेरिक टेबलेट 99 रुपए में मिलती है, जबकि इसके 10 टेबलेट के लिए ही 20 रुपए लिए गए। 

...तो ब्रांडेड दवा ही सस्ती

जेनेरिक दवा के नाम पर जेनेरिक-ब्रांडेड दवा बेचकर लोगों को बेवकूफ ही बनाया जा रहा है। जानकारों के मुताबिक जेनेरिक ब्रांडेड के मुकाबले ब्रांडेड कंपनियों की दवाइयां सस्ती हैं। सिप्रोफ्लेक्सिन 500 एमजी में जीडस कंपनी के सिपोडेटक की कीमत 40.50 रुपए, लेबिन लेप्स कंपनी के सिपोलेब की 48 रुपए, नेटको के सिप्रोमेट की 45 रुपए, प्रोफिक के सिप्रोटम की 47 रुपए और मैक्लियोड्स कंपनी के कोफ्लाक्स के 10 टेबलेट की कीमत 39.68 रुपए है।

 इसी फार्मूले की जेनेरिक दवा देने की बात कहते हुए रेडक्रास मेडिकल शॉप ने 50 रुपए लिए, वह भी 40 फीसदी डिस्काउंट के साथ। जिस सिट्रेजीन फार्मूले की टेबलेट के लिए 20 रुपए लिए गए, उसकी ब्रांडेड कंपनी रिलायंस के सेटटॉप के टेबलेट की कीमत 9.50 रुपए, पिल के सिटीजेड की 16, बायो-माइक्रान के सेट्रिट की 14.90, इस्ट-वेस्ट के सेट्राजोल की 13 और भारतीय कंपनी खंडेलवाल के सेटनेज की कीमत सिर्फ 15 रुपए है। डाईक्लोफिनेक सोडियम आईपी 50 एमजी की ब्रांडेड दवा सिटाडेल कंपनी के डेलबिटोल के 10 टेबलेट की कीमत 7.42 रुपए, मूरेपेन के डिक्टो-डीटी की 7.50 तो इसी कंपनी के डाइक्लो की 9, जेबी केमिकल्स के ड्राइक्लोरेन की 10.92, इमक्योर के डाइक्लोमूव की कीमत 15 रुपए है। 

खोखले हुए दावे, मची है लूट

18 जून को रायपुर में हुई छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण विकास प्राधिकरण की पहली बैठक में मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने प्रदेश के सभी सरकारी जिला अस्पतालों में रेडक्रास सोसायटी की दवा दुकानों में शत-प्रतिशत जेनेरिक दवाइयां बेचने की बात कही थी। उन्होंने 15 दिनों के भीतर सभी रेडक्रास मेडिकल शॉप में जेनेरिक दवा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। अंबिकापुर के जिला अस्पताल में जेनेरिक दवा बिकने से मरीजों को लाभ होने का दावा किया गया था, लेकिन राज्य के दूसरे सबसे बड़े शहर और स्वास्थ्य मंत्री के गृह नगर में ही जेनेरिक दवा के नाम पर मरीजों से कई गुना अधिक कीमत ली जा रही है। 

ये है जेनेरिक दवा

ऐसी दवाएं जो बिना किसी प्रचार-प्रसार के अपने मूल केमिकल के नाम से जानी और बेची जाती हैं, उन्हें जेनेरिक दवा कहा जाता है। ये दवाएं किसी कंपनी से संबंधित नहीं होती, न ही इन पर किसी का पेटेंट राइट होता है। जेनेरिक दवाइयां जिस देश में बेची या बांटी जाती हैं, उस पर नियंत्रण वहां की सरकार का होता है। जेनेरिक दवाइयां दवा निर्माता के नाम से जानी जाती हैं और यह ब्रांडेड दवाओं से 30 से 40 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं। 

इलाज में प्रभावी है जेनेरिक दवा

डॉक्टरों के अनुसार सस्ती और सर्वश्रेष्ठ होने के कारण जेनेरिक दवाइयां इलाज में काफी प्रभावी होती हैं। इनकी कीमत ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले इसलिए कम होती हैं, क्योंकि उनका निर्माण या उत्पादन केवल फार्मूलेशन के आधार पर किया जाता है। जेनेरिक दवाओं में सारे तत्व (कम्पोजिशन) मौलिक दवाओं के समान होते हैं और ये विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक दवाओं के मानदंडों के अनुरूप होती हैं। ब्रांडेड दवा में अनुसंधान खर्च, प्रचार खर्च आदि का कमीशन जोडऩे के कारण उनकी कीमत सामान्य से अधिक हो जाती है। 

अक्टूबर से फ्री, अभी लूट

देशभर के शासकीय अस्पतालों में मरीजों को इस वर्ष अक्टूबर से मुफ्त में दवा देने की कोशिश केंद्र स्तर पर शुरू हो चुकी है। योजना आयोग ने इस मद में 2012-13 वित्तीय वर्ष के लिए 100 करोड़ रुपए दिए हैं। स्वास्थ्य योजनाओं के मद्देनजर मुफ्त दवा देने की योजना को स्वास्थ्य के क्षेत्र में ‘रियल गेम चेंजर’ के तौर पर देखा जा रहा है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत इस कार्यक्रम पर 28560 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इतने में देश की कुल आबादी के 22 प्रतिशत लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ ले सकते हैं। सरकार भले ही मुफ्त में दवा देने का दावा कर रही है, लेकिन वर्तमान में सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवा के नाम पर लूट मची है। इन अस्पतालों में मरीजों को चोट पर बांधने वाली पट्टी तक के लिए भटकना पड़ता है और सस्ती, डिस्काउंट वाली दवा देने के नाम पर उन्हें रेडक्रास मेडिकल शॉप पर लूटा जा रहा है। 



गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

छत्तीसगढ़ में बैगा महिलाओं की नसबंदी...!

सुनील शर्मा 
 सुकरिया ने गरीबी के कारण कराई नसबंदी
छत्तीसगढ़ में बैगा आदिवासियों की नसबंदी के चौंकाने वाले मामले सामने आये है. राज्य में प्रतिबंध के बाद भी बैगा आदिवासियों की नसबंदी हो रही है और यह प्रतिबंधित कार्य सरकारी महकमे के शासकीय शिविरों और स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहा है.

गरीबी और अशिक्षा के जाल में जकड़े और विकास में पिछड़े अधिकांश बैगा परिवार नहीं जानते कि उनके लिए नसबंदी प्रतिबंधित है लेकिन स्वास्थ्य विभाग, जिसे इस संबंध में स्पष्ट निर्देश हैं,वह जान—समझकर इस पर रोक नहीं लगा रहा है.

बैगाओं की घटती जनसंख्या के कारण केंद्र सरकार ने 90 के दशक में एक आदेश के तहत छत्तीसगढ़ की पांच संरक्षित जनजातियों बैगा अबुझमाड़िया, बिरहोर, पहाड़ी कोरवा और कमार की नसबंदी को प्रतिबंधित कर दिया है.लेकिन इस प्रतिबंध का कोई भी असर नहीं हुआ है.

हाल ही में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर,कबीरधाम और नवगठित मुंगेली जिले में ऐसे कई मामले प्रकाश में आये हैं,जिसमें जान बूझकर बैगा महिलाओं की नसंबदी करा दी गई है. सरकारी अमले का है कि नवंबर 2011 में एक मामला मिलने के बाद इस पर पूरी तरह से कड़ाई बरती जा रही है .इसके बाद किसी भी बैगा की नसबंदी नहीं हुई है. मुंगेली के कलेक्टर त्रिलोक महावर का कहना है कि जब से मुंगेली जिला बना है, उनकी जानकारी में एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया है. लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है.

बैगा बहुल लोरमी के खंड चिकिस्ता अधिकारी डाक्टर सीएम पाटले बताते हैं कि पिछले कई वर्षों से सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में बैगा आदिवासियों की नसबंदी होती रही है लेकिन उनके आने के बाद ऐसा नहीं हो रहा है. श्री पाटले का कहना है कि नवंबर 2011 में मेरे चार्ज लेने के दूसरे ही दिन एक बैगा महिला की नसबंदी का मामला आया था लेकिन उसके बाद मैंने इस पूरी तरह रोक लगा दी है. इस संबंध में सभी को सख्त हिदायत भी दी गई है.

काहे का प्रतिबंध
 एक महीने पहले नसबंदी कराने वाली कमला बैगा.
डा. पाटले भले ही दावा कर रहे हैं कि अब किसी भी बैगा की नसबंदी नहीं हो रही है लेकिन सूदूरवर्ती गांवों में घूमने के बाद यह दावा खोखला साबित हो जाता है.मुंगेली जिले की डूड़वाडोंगरी की सुकरिया बैगा ने पिछले महीने इलाके की कुछ महिलाओं के साथ डिंडौरी जिले के गोरखपुर स्वास्थ्य केंद्र में नसबंदी कराई है.

सुकरिया कहती है—''पहले वह नसबंदी के लिए लोरमी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गई थी लेकिन जब वहां मना कर दिया गया तो वह फगनी और अन्य महिलाओं के साथ गोरखपुर चली गई. वहां आपरेशन के बाद एक हजार रुपए मिले और वहां खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम भी था.सुकरिया के पति बनिया बताते हैं कि उनकी पत्नी स्वास्थ्य विभाग की गाड़ी से गई थी.वहां से उन्हें लेने के लिए सूरजभान नामक आदमी भी आया था जो स्वास्थ्य कार्यकर्ता का पति है.

थोड़ी और पूछताछ करने पर पता चला कि सूरजभान अपनी स्वास्थ्य कार्यकर्ता पत्नी का लक्ष्य पूरा करने के लिए डूड़वाडोंगरी की फगनी के साथ मिलकर बैगा महिलाओं को नसबंदी के लिए मध्यप्रद्रेश के डिंडौरी जिले ले जाता है फगनी बैगा ने दस साल पहले नसबंदी कराई थी और तब से वह जैसे नसबंदी कराने वाली बैगा महिलाओं की आदर्श बन गई है.

किसी भी नसबंदी करानी हो तो वह फगनी से संपर्क करती है और फगनी खुद भी ऐसे महिलाओं की खोज करती है.फगनी बताती है कि उसके पति संचू बैगा ने उसे चेतावनी दी थी कि वह यदि नसबंदी नहीं कराएगी तो वह उसे छोड़ देगा. रिश्ता टूटने के डर से उसने नसबंदी कराई.

फगनी बताती है कि नसबंदी कराने वाली महिलाओं को बतौर प्रोत्साहन राशि 600 रुपए और उन्हें प्रोत्साहित करने वाले को 150 रुपए तो मध्यप्रदेश हितग्राही महिला को एक हजार और प्रोत्साहित करने वाले को चार सौ रुपए प्राप्त होते हैं.

महिलाओं को नसबंदी के लिए प्रेरित करती है फगनी बैगा.
फगनी कहती है कि बैगा परिवार बेहद गरीब है. अशिक्षा के कारण परिवार में बच्चों की संख्या बढ़ती जाती है लेकिन जब वे बड़े होते हैं तो उनके पालन-पोषण की समस्या होती है.इसलिए अधिकतर परिवार नसबंदी कराना चाहते हैं ताकि कम बच्चों का पालन-पोषण अच्छे से हो सके.

पिछले महीने मार्च में फगनी के साथ मंजूरहा की कमला पति जगतराम बैगा, शांति बैगा पति चैन सिंह बैगा, किसानीन पति पनका बैगा, बिराजो पति मेहतर बैगा और डूड़वाडोंगरी की लमिया पति विश्राम बैगा और सुकरिया पति बनिया बैगा और चकदा की कुंती बाई पति जेठू राम बैगा और मंगली पति लमतू बैगा मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के गोरखपुर नसबंदी कराने गये थे. इन सभी ने गरीबी को प्रमुख वजह बताया है.

डुड़वाडोंगरी की उजियारो पति बैसाखू बैगा और मंजूरहा की बयन पति बाबूलाल बैगा ने पिछले साल लोरमी में नसबंदी करवाई थी.बयन कहती है कि सरकार ने नसबंदी पर तो प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन हमारे विकास की उसे चिंता नहीं है. बच्चे पैदा तो हो जाएंगे लेकिन उनका पालन-पोषण नहीं हो सकता.

मंजूरहा गांव की कमला बैगा के तीन बच्चे पहले से ही हैं. जब चौंथा बच्चा पैदा हुआ तो घर की हालत देखते हुये उन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही नसबंदी का ऑपरेशन करा लिया. कमला बैगा कहती हैं- “बैगाओं की नसबंदी पर रोक का हमें पता है लेकिन नसबंदी न करायें तो इतने बड़े परिवार को पालना संभव नहीं है.”

यह रिपोर्ट 5 अप्रैल 2012 को दैनिक छत्तीसगढ़ के मुख्य पृष्ठ पर बतौर बैनर प्रकाशित हो चुकी है .

मंगलवार, 20 मार्च 2012

विस्थापितों के साथ धोखा हुआ है


अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघों को बचाने के नाम पर वहां सैकड़ों सालों से रहने वाले बैगा आदिवासियों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों को हटाने के नाम पर पिछले 2 सालों में तमाम नियम कायदे और कानून को ताक पर रख कर वन विभाग का जो जंगल राज चल रहा है, उसने इन बैगा आदिवासियों के सामने जीवन-मरन का प्रश्न पैदा कर दिया है. पुनर्वास के नाम पर वन विभाग ने बैगा आदिवासियों की जिंदगी जानवरों-सी कर दी है.इस पूरे मामले पर सुनील शर्मा
ने एक लंबी रिपोर्ट लिखी है जो पहले ही दो किस्तों में छप चुकी है...पेश है तीसरी किस्त... 

वन विभाग के अफसर ही क्यों, विभाग के मंत्री भी यहां का दौरा कर चुके हैं और उन्हें विस्थापन की तारीफ करते हुए इसे देश का सबसे अच्छा विस्थापन बताया था लेकिन जल्दा के चमरू का तो कुछ और ही कहना है-'' उसेंडी सर जब आये थे तो उन्होंने अधूरे काम पूरे कराने का वादा किया था लेकिन आज तक गांव में स्कूल भवन, अस्पताल, आंगनबाड़ी केंद्र नहीं बना. उन्होंने हल के लिए भैंसा देने की बात कहीं थी. भैसा की जगह पड़वा दिया गया, जो हल खींचने के योग्य नहीं था और उसमें से एक पड़वा तो कुछ ही दिनों बाद मर भी गया. तीन हजार में जमीन की ट्रेक्टर से जुताई करवाई पर अनाज भी उतना नहीं हुआ कि उसे परिवार का एक सदस्य भी साल भर खा सके. हमारे साथ धोखा हुआ है.''

इस गांव में समस्याओं का अंबार लगा है. इतवारी कुछ समझदारी की बातें करते हैं. वे कहते हैं-'' वैसे तो यहां कई परेशानियां है लेकिन अगर कोई दूर ही नहीं करना चाहे तो वह कैसे दूर होगी.” 

वन विभाग के अफसरों की पोल खोलते हुए वे कहते हैं कि यहां आरक्षित भूमि को खेती की जमीन बताकर ग्रामीणों को दिया गया है और खेत क्या वह जमीन के कुछ टुकड़े हैं जिसमें पेड़ और पत्थर है. गांव के सभी 74 परिवारों को भैसा जोड़ी मिलना था लेकिन 24  को आज तक नहीं मिला, जिन्हें मिला उन्हें भैंसा की जगह पड़वा दिया जिनमें से कइयों की मौत हो चुकी हैं. विस्थापितों ने मामले की शिकायत एसपी से की है लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

 गांव के मुखिया मरहूराम बताते हैं-''हमारे इलाके के रेंजर वर्मा जी को सब मालूम हैं. हमें तो ठगा गया है. भला दस लाख रुपए जैसा हुआ क्या है.'' वह बोलते-बोलते भावुक हो जाते हैं- ''हम अपने पुराने गांव से अपना देवी-देवता भी तो नहीं ला पाये हैं, उनका आशीर्वाद अब हमारे साथ नहीं है...शायद यही कारण है कि हमें ये दिन देखने पड़ रहे हैं. हमारे पास अब न हमारे देवता है और न पूजा स्थल है. देवताओं का प्रकोप हमें चैन से रहने नहीं दे रहा है.''

तीन में न तेरह में
राजीव गांधी जलाशय (खुड़िया) जाने वाले मार्ग पर दायीं तरफ कारी डोंगरी के ठीक पहले कभी जंगल हुआ करता था. यहां के पंद्रह हजार से भी अधिक पेड़ों को काटकर अचानकमार बाघ परियोजना से विस्थापित किये गये तीन गांवों बांकल, बोकराकछार और सांभरधसान को बसाया गया. 

विस्थापन के दो साल बाद भी ग्रामीण यहां खुद को नया महसूस करते हैं. इलाके के पुराने वाशिंदे उन्हें तवज्जो भी नहीं देते, उल्टा वे मानते हैं कि इन नये आगंतुकों के कारण उनके ग्राम पंचायत को मिलने वाली सुविधायें अब बांटनी पड़ रही है. संकट ये भी है कि इन आदिवासियों की बोली और रहन-सहन इन गांव वालों से बिल्कुल अलग है. 

सांभरधसान में 17 परिवार हैं. यहां के सेवाराम बैगा को भी पांच एकड़ जमीन कृषि भूमि बताकर दी गई है. पर वे बताते हैं -''मेरी क्या इस गांव में किसी की जमीन भी समतल नहीं है. उबड़-खाबड़ है, बीच में बड़े-बड़े पेड़ है और जमीन ऐसी है कि कितनी भी बारिश हो, पानी नहीं रूकता. ऐसे में फसल की अच्छी पैदावार होने का तो सवाल ही नहीं है. धान का पौधा सही रूप से विकसित नहीं हो पाता.''

बांकल के तीस परिवारों को विस्थापित किया जाना था लेकिन वहां 29 परिवारों को ही बसाया गया है. एक भवन जो कि हितग्राही को दिया जाना था, वहां वर्तमान में स्कूल संचालित है. इस गांव में भी सिंचाई, स्कूल भवन, स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी, बिजली जैसी अन्य सुविधाएं नहीं हैं. आदिवासी परेशान हैं और अपने पुराने गांव को छोड़कर नई जगह पर विस्थापित होने का दर्द उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देता है.

बांकल की सुंदरिया सत्तर साल की हैं और उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें इस बुढ़ापे में एक नई जगह पर आकर रहना होगा. लड़खड़ाती जुबान से वह कहती हैं-'' बने ता हावन साहब फेर इहा मन नइ लागय. कई झन तो इहा ले कमाय-खाय बर दिल्ली-आगरा कोती जावत हे त कई झन घलो जाये के सोचथे...मोर तो बुध सिरा गये हे...सरकारो ह तो घलो जेन कहे रहिसे ओला पूरा नई करिच...खेत म पथरा हे, रूख-राई हे, धान उपजय नहीं त काला खाबो...अइसन में का करी कुछ बुता-काम तो घलो नइ हे इहा.''  अपने जवाब में अनपढ़ सुंदरिया खुद ही कई सवाल खड़े करती हैं. पर उनके सवाल पेड़-पौधों से टकराकर वापस आ जाते हैं. 

बांकल में बैगा परिवारों के साथ गोड़ आदिवासी भी विस्थापित किये गये हैं. इन्हीं में से एक परिवार हैं रमेश का. रमेश को पिछले साल 25 बोरी धान यानी सात क्विंटल धान मिला था जिसकी कीमत पांच हजार छह सौ रुपए थी और पांच हजार रुपए खेती में खर्च हो गये. इस तरह जी-जान से परिवार सहित खेती करने के एवज में उन्हें मिले महज छह सौ रुपए...वह इसका क्या करें. इस साल भी खेती का बुरा हाल है. रमेश बताते हैं-''इस बार तो पिछली बार से भी कम धान होगा.'' रमेश के पास बीपीएल का कार्ड भी नहीं है, लिहाजा 35 किलो चावल भी नहीं मिलते. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि बाल-बच्चों को वे क्या खिलाएंगे ?

जीवन में पहली बार पलायन 
बांकल में भी जल्दा, बहाउड़, सांभरधसान, कूबा और बोकराकछार की तरह ही रोजगार की समस्या है. जिसके परिणामस्वरूप पलायन जैसी समस्या सामने आ रही है. यह पहला अवसर है, जब इस गांव के आदिवासी दिल्ली और आगरा जैसे शहरों में कमाने-खाने के लिए गये हैं. छत्तीसगढ़ में पलायन की समस्या कोई नई नहीं है लेकिन यह वन्यक्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों के लिए एकदम नया है.

मानसिंह के साथ पूरा गांव ही बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा हैं.मानसिंह बताते हैं कि-''अच्छी बारिश होने के बाद भी इस साल अनाज पिछले साल की तुलना में कम मिला. कारण है खेती की जमीन का सही न होना. हमारे सामने बेरोजगारी की समस्या है. अगर हम काम नहीं करेंगे तो हमारे बच्चे भूखों मर जायेंगे.''
गांव के अन्य ग्रामीणों की तरह वे भी मजदूरी करने आगरा या दिल्ली जाना चाहते हैं ताकि वे अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकें. गांव के पंद्रह से अधिक लोग दिल्ली-आगरा कमाने-खाने चले गये हैं और कई दूसरे लोग भी जाने की इच्छा रखते हैं. इस गांव की सूनी गलियां और घरों में लगे ताले मानसिंह की बातों की गवाही देते हैं.
रमेश बताते हैं कि बांकल के 29 परिवार से 14 लोग पलायन कर चुके हैं.दरवाजा के एक ठेकेदार के द्वारा अच्छी मजदूरी दिलाने का वायदा करने के बाद रामकुमार, रामनाथ, रामप्रसाद, रामस्वरूप, समलिया, शिवकुमार, शिवचरण, हीरा ,शिवप्रसाद,  अररूत, मालिकराम, अशोक और लमतू आगरा और दिल्ली चले गये हैं.सांभरधसान का श्यामलाल भी उनके साथ गया हैं. ये सभी बैगा हैं. इन्हें गये एक महीना हो गया है.
जहां एक ओर बांकल और सांभरधसान के बैगा आदिवासी आगरा और दिल्ली जैसे शहरों में विस्थापन से उभरी पीड़ा के बाद पलायन का दुख झेल रहे हैं, वहीं बोकराकछार के आदिवासी पहाड़ियों पर बांस काटते हुए परिवार के लिए रोजी-रोटी का इंतजाम कर रहे हैं. कभी-कभी तो वे अपने परिवार से पंद्रह-बीस दिन भी अलग रहते हैं और इस बीच घर की सारी जिम्मेदारी महिलाओं के जिम्में होती है.

बोकराकछार के आदिवासियों को बांस कटाई के दौरान जंगल में ही झोपड़ियां बनाकर रहना होता हैं और दिल्ली-आगरा पलायन करने वालों को भी रातें झुग्गियों में काटनी पड़ रही हैं. ऐसे में कथित रूप से उनके लिए तीन लाख तैंतीस हजार रुपए की लागत से बनाये गये पक्के मकान का क्या औचित्य है. उनके हिस्से तो अभी भी झोपड़ियां ही हैं. 

आदिवासियों की विवशता भरे जीवन में विस्थापन के बाद उभरी पलायन की पीड़ा एकदम नई है और ये उनके उपर थोपी गई है. ये दुख उनके हिस्से नहीं था पर अब वे इस परेशानी से दो-चार हो रहे हैं. बोकराकछार के बसोर बैगा अपना परिवार छोड़कर दिल्ली-आगरा नहीं जाना चाहते क्योंकि उन्हें डर हैं कि कहीं वहां वे भूखों न मर जाये.
वे कहते हैं-''यहां वे किसी तरह रोजी-मजदूरी करके अपना जीवन काट लेंगे लेकिन वहां गये और काम नहीं मिला तो वहां से वह लौट भी नहीं पायेंगे, क्योंकि पढ़-लिखे तो हैं नहीं.साहब दोगुना मजदूरी मिलेगा कहकर ठेकेदार यहां से ले जा रहा है लेकिन यदि नहीं मिला तो हम तो वहां बेमौत मर जायेंगे.''

हालांकि बसोर इस बात को भी स्वीकारते हैं कि यहां भी वे सुखी नहीं रह सकते, क्योंकि खेतों में धान की जगह मायूसी उपज रही है. वे कहते हैं-'' पांच एकड़ में धान की बोनी किया और बीजहा भी वापस नहीं हो रहा है तो ऐसे में तो भूखों मरना ही है. वन विभाग के अफसरों ने कहा था कि वे पांच साल तक उनका ख्याल रखेंगे. उनके बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य का इंतजाम करेंगे लेकिन वे तो आते तक नहीं. उन्होंने हमें छोड़ दिया.'' 

राजीव गांधी जलाशय के पास खुड़िया ग्राम से दो किलोमीटर दूर सुरही जाने वाले मार्ग पर बसाये गये बहाउड़ का हाल तो इन गांवों से भी बुरा है. यहां 66 परिवारों को बसाया गया है. जंगलों के बीच बना इनका आशियाना जितना खूबसूरत दिखाई देता है, वैसा अंदर से है नहीं.

दुखीराम अपने नाम की तरह ही यहां दुखी है और उनकी उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी तब फिर गया जब पांच एकड़ की जमीन में से केवल दो एकड़ में ही वे कृषि कार्य कर पाये और शेष में पैरा भी नहीं हुआ. 
ठुकुर बैगा इस गांव के बुर्जुग है और लोग उनकी बड़ी इज्जत करते हैं. उन्होंने अपने जीवन में कई कष्ट झेले हैं और अब उनकी भी हिम्मत उम्र के साथ ही जवाब दे रही है. वे बहाउड़ के साथ ही बोकराकछार, बांकल, सांभरधसान, कूबा और जल्दा के ग्रामीणों के संपर्क में हैं और कभी-कभार वहां आते-जाते रहते हैं. वे आदिवासियों के पलायन को दुखद बताते हैं.

वे कहते हैं-''साहब सत्तर साल की उम्र हो गई, कभी हम बाहर कमाने-खाने नहीं गये. अब हमारे ही बिरादरी के लोग बाहर जा रहे हैं. दोगुना मजदूरी मिलेगा कहकर कोई बाल-बच्चों के साथ तो कोई यहां छोड़कर पलायन कर रहे हैं. यह अच्छी बात नहीं है. यह हमारे लिए एकदम नया है और यह अच्छा संकेत नहीं है.

हमारे बुजुर्ग कहते थे कि कभी अपनी मिट्टी को छोड़कर किसी के बहकावे में कभी मत जाना, भले ही वहां सोना-चांदी ही क्यों न मिले लेकिन आजकल के बच्चों को कौन समझाये और उन्हें समझाए भी तो कैसे ? समझाने पर वे उल्टे पूछते हैं-हमारा परिवार पालोगे...क्या करें जुबान बंद हो जाती है...पता नहीं बहाउड़ वाले कब तक उनकी बात सुनते हैं...उसके बाद तो बूढ़ादेव ही जाने क्या होगा ?”

शनिवार, 21 जनवरी 2012

विस्थापन के नाम पर वन विभाग का जंगल राज


अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघों को बचाने के नाम पर वहां सैकड़ों सालों से रहने वाले बैगा आदिवासियों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों को हटाने के नाम पर पिछले 2 सालों में तमाम नियम कायदे और कानून को ताक पर रख कर वन विभाग का जो जंगल राज चल रहा है, उसने इन बैगा आदिवासियों के सामने जीवन-मरन का प्रश्न पैदा कर दिया है. पुनर्वास के नाम पर वन विभाग ने बैगा आदिवासियों की जिंदगी जानवरों-सी कर दी है. नेशनल फाउंडेशन फार इंडिया के फेलोशिप के तहत सुनील शर्मा ने विस्तार से विस्थापन के इस मुद्दे पर लिखा है.पेश है दूसरी किस्त:—

सुनील शर्मा, बिलासपुर

विस्थापितों की रकम कहां गई?

सबसे बड़ा छल तो यह हुआ कि विस्थापित किये गये आदिवासियों को कभी भी पुर्नवास की नीतियों के बारे में नहीं बताया गया. सच तो यह है कि विस्थापन के लिये वन विभाग के अधिकारियों ने अपनी ही पुनर्वास नीति को ताक पर रख दिया.

टाईगर रिजर्व में विस्थापन को लेकर वन विभाग की नीति कहती है कि विस्थापित होने वाले आदिवासियों को दो में से किसी एक तरीके से पुनर्वास का लाभ दिया जाये. पहला तो यह कि प्रत्येक विस्थापित परिवार को बैंक खाता खुलवा कर 10-10 लाख रुपये दे दिये जायें और दूसरा ये कि इसी दस लाख रुपये से उनके लिये मकान-जमीन की व्यवस्था की जाये. पुनर्वास के इस दूसरे तरीके में प्रत्येक परिवार को पचास हजार रुपए नगद, पक्का मकान, पांच एकड़ कृषि भूमि, सड़क, बिजली, सिंचाई की सुविधा, तालाब, ट्यूबवेल, पेयजल, अस्पताल, सामुदायिक भवन, आंगनबाड़ी, पूजा स्थल, श्मशानघाट सहित अन्य जरूरी सुविधाओं का इंतजाम विस्थापितों के लिए करना था.
नियमानुसार 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी युवाओं को एक स्वतंत्र परिवार की मान्यता देते हुये उन्हें पुनर्वास का लाभ दिया जाना था. लेकिन वन विभाग ने ऐसा नहीं किया. सवाल यही उठता है कि ऐसे युवाओं के लिये आयी 10-10 लाख रुपये की रकम कहां गई ? यह सवाल पूछने पर वन विभाग के अफसर कागजों को देखने के बाद ही स्थिति बताने का रटा-रटाया जवाब देते हैं.

जाहिर है, सारे नियम-कायदों को दरकिनार करते हुए बगैर ग्रामीणों के पुर्नवास की व्यवस्था किये वन विभाग ने उन्हें रातोंरात गाड़ियों में भरकर उनके सामान के साथ लाकर नई जगह पर छोड़ दिया. अभी उनके लिए मकान बनने की शुरूआत भी नहीं हुई थी. न खेत बने थे और न सड़क, न बिजली का ही इंतजाम था.

पानी की उपलब्धता के कारण तालाब के किनारे आदिवासी छाला झोपड़ी बनाकर रहने लगे और  इस तरह अपनी जमीन से बेदखल हुए  आदिवासियों के नये और अनोखे त्रासदीपूर्ण जीवन का आगाज हुआ.

तालाब के किनारे मौसमी बीमारियों और मच्छर से तो वे किसी तरह अपनी जान बचाते रहे लेकिन अपनी मिट्टी से अलग होने का दर्द उनकी आंखों में रह-रहकर उभरने लगा. उनमें से कुछ तो पुर्नवास स्थल को छोड़कर अपने मूल गांव भी गये पर वहां पहरा होने के कारण उनका पहले की तरह निवास संभव नहीं था. जो गये उन्हें खदेड़ दिया गया और अपमानित आदिवासी एक बार फिर झोपड़ियों में दिन गुजारने लगे.
चूंकि उनके लिए बनाये जा रहे मकान ठेकेदार द्वारा बनाये जा रहे थे इसलिए उन्हें भवन निर्माण में काम नहीं मिल रहा था, क्योंकि ठेकेदार अपने लोगों को मजदूरी पर रख रहा था. वन विभाग ने इन आदिवासियों को पेड़ काटने, मार्ग बनाने, तालाब बनाने जैसे काम करवाये पर ऐसा रोजगार पाने वाले आदिवासियों की संख्या कम ही है.

वन विभाग का दावा है कि प्रत्येक परिवार को रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत एक लाख रुपए का भुगतान किया गया है. लेकिन वन विभाग का यह आंकड़ा अपनी कहानी खुद कह देता है. अगर इन आदिवासियों को एक लाख रुपये का भुगतान किया जाता है तो 249 परिवारों के हिसाब से यह रकम दो करोड़ 49 लाख रुपए हो जाती है. लेकिन आदिवासियों के जॉब कार्ड में इतनी रकम कहीं नजर नहीं आती.

इति विस्थापन कथा

अचानकमार टाईगर रिजर्व से विस्थापित 249 परिवार लगातार पांच महीने तक इसी तरह अपना जीवन झोपड़ियों में व्यतीत करते रहे और उधर वन विभाग के अफसर मनमानीपूर्ण रवैया अपनाते हुए अपने हिसाब से उनके मकान बनवाते रहे. मकानों में घटिया और गुणवत्ताहीन सामग्री का इस्तेमाल किया गया, जो कैमरे पर रिकार्ड है.
भ्रष्टाचार की सारी सीमायें लांघते हुए मकान,  सड़क, पहुंच मार्ग, खेती के जमीन का समतलीकरण, मेड़ निर्माण और तालाबों का निर्माण होता रहा. किसी तरह उक्त निर्माण कार्य पूर्ण हुआ और विस्थापितों को उनका घर और खेती के लिए जमीन सौंप दी गई.

यहां यह बताना लाजिमी है कि जिन छह गांवों का विस्थापन किया गया, उसमें जल्दा के ग्रामीणों को कोटा लोरमी मार्ग में जूनापारा, कठमुड़ा के पास, कूबा को मरवाही वनमंडल के आमाडोब के पास तो बांकल, बोकराकछार, सांभरधसान को लोरमी ब्लाक के अंतर्गत ग्राम दरवाजा के पास बसाया गया, जो कि खुड़िया यानी राजीव गांधी जलाशय जाने वाले मार्ग पर स्थित है. बहाउड़ के ग्रामीणों को ग्राम खुड़िया के अंतर्गत खुड़िया से जंगल के रास्ते छपरवा जाने वाले मार्ग पर बसाया गया.

मकान और खेती के लिए जमीन मिलने पर ग्रामीणों ने राहत ली और पांच महीने की दुख-तकलीफ को वे भूल गये पर यहां भी परेशानियों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. विस्थापित करने से पहले वन विभागों द्वारा उनको किया गया वादा सब्जबाग साबित होने लगा. खेती-किसानी के दिनों में जब ग्रामीणों ने अपनी जमीन देखी तो वहां न सिंचाई की सुविधा थी और न ही हल के लिए बैल मिले. खेती की जमीन का इतनी उबड़-खाबड़ थी कि उसमें चलना भी मुश्किल था, ऐसे में उसमें पानी रुकने और खेती होने की उम्मीद ही नहीं थी.

शिकायत करने पर कुछ ग्रामीणों की जमीन को ट्रेक्टर से जुतवाया गया जबकि बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने खुद से ही पैसे देकर ट्रेक्टर जमीन जुतवाई. नि:शुल्क रासायनिक खाद का वितरण भी हुआ पर उसका लाभ भी कइयों को नहीं मिला. किसी तरह खेती शुरू हुई पर बारिश ने दगा दिया. खेती से उतना अनाज भी नहीं हुआ कि परिवार का एक आदमी उसे साल भर पकाकर खा सके. उन्हें पीडीएस का चावल नहीं मिलता तो उनके सामने भूखे मरने की नौबत आ जाती.
ग्रामीणों के यहां आने के  पहले दिन से ही शिक्षा और स्वास्थ्य का बुरा हाल रहा. आंगनबाड़ी,स्कूल,सामुदायिक भवन नहीं बने और न मंदिर न श्मशानघाट.

इन गांवों में आज भी उचित मूल्य की दुकान नहीं है और उन्हें बीपीएल का चावल लेने दूसरे गांव जाना पड़ता है. नये बने मकानों का हाल यह है कि पहली बरसात में ही छत के रास्ते से पानी कमरे के भीतर आने लगा.
वन विभाग के दावे के उलट इन 6 में से किसी भी गांव में अस्पताल नहीं है तो डाक्टर या नर्स के होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता लिहाजा ये अपनी बीमारियों का झोला छाप डाक्टर से इलाज कराने मजबूर है.

इसी तरह बिजली के तार तो है पर उनमें करंट नहीं है. लिहाजा रात का अंधेरा अभी भी उनके पुराने गांव की तरह ही अभी उनका पुराना साथी है. हां यदि कोई मंत्री या बाहर का बड़ा अधिकारी गांव का निरीक्षण करने आता है तो जरूर इनमें करंट दौड़ने लगता है.
विस्थापित सभी गांव पानी की समस्या से भी जूझ रहे है. पेयजल की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. हैंडपंप तो खुदवाये गये हैं लेकिन अधिकतर हमेशा बिगड़ी हालत में ही रहते हैं. इनके बच्चों के बदन पर आज भी चिथड़े दिखते हैं और साफ-सफाई से कोसों दूर होने के कारण ये बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं. विस्थापन के बाद इनके खातों में जमा कराया गया रुपया प्रति परिवार 50 हजार कब का खत्म हो गया है और अब इनके पास रोजगार का कोई इंतजाम नहीं है. 

नई जगह होने के कारण इन्हें कोई काम नहीं देना चाहता, वहीं महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में भी इन्हें काम नहीं मिल रहा है. शिक्षा का हाल यह है कि गांव के ही किसी के घर में स्कूल संचालित है, जिसमें गिनती के बच्चे क,ख,ग,घ रट रहे हैं और आने वाले संकट से बिल्कुल अनजान है.
यहां आकर कुछ बच्चों का जन्म जरूर हुआ है पर जो पुराने गांव में पैदा हुए है उनके लिए ये नया गांव ऐसा लग रहा है जैसे वे किसी और के घर में कुछ दिन रुकने के लिए आये हैं. नई जगह से न बड़े जुड़ाव महसूस कर पा रहे हैं और न बच्चे. ऐसे में विस्थापितों का जीवन अधर में दिखाई देता है.

जल्दा गांव के मरहूराम की उम्र करीबन 55 साल हैं. वे गांव के मुखिया हैं और वे अपने गांव वालों की दुर्दशा पर अफसोस जताते हुए कहते हैं -''दो डिस्मिल में पक्के का मकान, पांच डिस्मिल में बाड़ी, पांच एकड़ खेती की जमीन, सिंचाई की सुविधा, बिजली, पेयजल, स्कूल, टेलीफोन, धार्मिक पूजा स्थल, श्मशानघाट, तालाब, सड़क, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उचित मूल्य की दुकान, आंगनबाड़ी केंद्र और कई अन्य सुविधाओं को देने की बात कहकर यहां लाया गया लेकिन दो साल बाद भी हमें ये सुविधाएं नहीं मिलीं. अगर कोई हमारे खेत और मकान ले लेगा तो हम उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि हमारे पास तो जमीन और मकान का पट्टा भी नहीं है.”

उल्लेखनीय है कि मरहूराम के गांव में ही पिछले साल मंगलू बैगा की मौत भूख के कारण हुई थी, जो अखबार की सुर्खियां तो बनी लेकिन आदिवासियों की आवाज अनसूनी रह गई. गांव के सरहू और धान बाई ने तो ईलाज के अभाव में दम तोड़ दिया. मरहूराम को इनकी मृत्यु का गहरा अफसोस है. गांव का मुखिया होने के नाते ग्रामीण उनसे बड़ी उम्मीदें रखते हैं लेकिन वह उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहें है. बकौल मरहूराम, अब उन्हें अपने मुखिया होने पर भी शर्म महसूस होने लगी है.
जल्दा गांव के विस्थापन के लिए सात करोड़ चालीस लाख रुपए मिले थे, जिसमें सभी 74 परिवारों को पचास-पचास हजार रुपए प्रोत्साहन राशि के रूप में मिले और शेष राशि सात करोड़ तीन लाख रुपए से पुर्नवास करने का दावा वन विभाग के अफसर करते हैं लेकिन साल भर के भीतर ही दीवारों पर आई दरार और बारिश में छतों से रिसकर मकान के भीतर पहुंचने वाले पानी की हर बूंद भ्रष्टाचार की दुहाई देता है.

इस गांव को 370 एकड़ कृषि भूमि देने का दावा विभाग के अफसर करते है लेकिन इस कृषि भूमि की हालत पर गांव के नौजवान वीर सिंह कहते हैं-''एक तो जंगल की जमीन हमें खेती करने दी गई है, उपर से खेत समतल नहीं होने के कारण इसमें अनाज नहीं उपजता. सिंचाई की सुविधा भी नहीं है और बिजली नहीं होने के कारण हमारे घरों में अंधेरा रहता है. बिजली की बात करने पर ठेकेदार पैसे मांगता है. हमारे पास तो पैसे नहीं है हम क्या करें ?''

होली राम को नई जगह से काफी उम्मीदें थी लेकिन किस तरह उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया, वे खुद ही बताते हैं- '' पुराने गांव में हमारे पास खेती की थोड़ी-सी जमीन थी, जिसमें हम मकई उपजाते थे. यहां आने पर हमें पांच एकड़ खेती की जमीन मिलने की उम्मीद थी और अधिकारियों ने कहा था कि वे आने वाले चार सालों तक उनकी जमीन को समतल करायेंगे. दूसरे साल ही नहीं आये तो अब शेष दो सालों का क्या भरोसा. साहब लोगों ने अस्पताल खोलने की बात कहीं थी, आज तक नहीं खुली.''

(एनएफआई की मीडिया फेलोशीप के तहत किये जा रहे अध्ययन का हिस्सा)

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

अचानकमार में वन विभाग का जंगल राज

बैगा आदिवासियों का गैरकानूनी विस्थापन
 अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघों को बचाने के नाम पर वहां सैकड़ों सालों से रहने वाले बैगा आदिवासियों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों को हटाने के नाम पर पिछले 2 सालों में तमाम नियम कायदे और कानून को ताक पर रख कर वन विभाग का जो जंगल राज चल रहा है, उसने इन बैगा आदिवासियों के सामने जीवन-मरन का प्रश्न पैदा कर दिया है. पुनर्वास के नाम पर वन विभाग ने बैगा आदिवासियों की जिंदगी जानवरों-सी कर दी है. नेशनल फाउंडेशन फार इंडिया के फेलोशिप के तहत सुनील शर्मा ने विस्तार से विस्थापन के इस मुद्दे पर लिखा है.इस रिपोर्ट को लगातार चार दिनों तक चार किस्तों में 19,20,21 व 22 दिसंबर 2011 को दैनिक छत्तीसगढ़ ने प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया है.
पेश है पहली किस्त —


विस्थापन को लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को किस तरह ठेंगे पर रखा जाता है, इसे जानना-समझना हो तो आपको अचानकमार बाघ परियोजना से विस्थापन के नाम पर उजाड़े गये गांवों को जरुर देखना चाहिये. बाघ के नाम पर बरसों से जंगल के इलाके में रह रहे सैकड़ों बैगा आदिवासियों को केवल इसलिये गैरकानूनी तरीके से उजाड़ दिया गया क्योंकि वन विभाग के अफसरों को बजट में आवंटित पैसे आनन-फानन में खर्च करने थे. खर्च करने की यह हड़बड़ी क्यों थी, इसे वन विभाग के अफसरों से बेहतर कौन बता सकता है ! लेकिन वन विभाग के इस विस्थापन के लिये अपनाये गये मनमाने जंगल कानून की मार अब विस्थापित बैगा आदिवासी झेल रहे हैं. विस्थापन की तलवार 19 और गांवों पर लटक रही है और इन गांवों के हजारों आदिवासी विस्थापन का हाल देख कर डरे हुये हैं.

बीमार, बदहाल और तमाम जरुरी सुविधाओं से दूर इन आदिवासियों के विस्थापन के लिये बनाये गये चमकदार ब्रोशर और पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन भले राज्य और देश की राजधानी में इस विस्थापन के लिये जंगल विभाग को शाबाशी दिलवा दें लेकिन विस्थापन की असली कहानी बेहद भयावह है. इस इलाके में रहने वाले बैगाओं के लिये इतिहास में पहला अवसर है, जब उन्हें अपने को जिंदा रखने के लिये देश के दूसरे इलाकों में पलायन करना पड़ा.

दिसंबर 2009 में बिलासपुर के अचानकमार टाइगर रिजर्व के 6 गांवों के बैगाओं को आधी रात को ट्रकों में भर कर जंगल के इलाके में छोड़ दिया गया था. पुनर्वास की एक भी व्यवस्था किये बिना. कहा गया कि इन आदिवासियों को 10-10 लाख रुपये मिलेंगे. लेकिन अपने गांवों से उजाड़े जाने से पहले न तो पंचायत कानून के तहत पंचायत की बैठक की गयी और ना ही पुनर्वास कमेटी की बैठक. तत्कालीन कलेक्टर सोनमणी बोरा कहते रहे कि बिना पुनर्वास कमेटी की बैठक के किसी का विस्थापन नहीं होगा. यहां तक कि आदिवासियों का विस्थापन हो जाने के बाद भी जब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उन्हें ज्ञापन सौंपा तब भी वे यही दुहराते रहे. दूसरी और वन विभाग ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के उलट राज्य सरकार के किसी भी दूसरे विभाग से बिना संपर्क किये आदिवासियों के कथित पुनर्वास में पैसों की अफरा-तफरी और मनमाने तरीके से काम जारी रखा. आज दो साल बाद भी विस्थापित आदिवासियों को जमीन और मकान का पट्टा तक नहीं मिला है.

जंगल, बाघ और विस्थापन
वन क्षेत्रफल और वन राजस्व के हिसाब से छत्तीसगढ़ देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है. राज्य के 44 फीसदी हिस्से में यानी 59558 वर्ग किलोमीटर में जंगल है लेकिन अकेले अचानकमार टाईगर रिजर्व एरिया के महज छह वन्य ग्रामों के विस्थापन के लिए 1250 एकड़ जंगल की कटाई की गई है. अभी 19 वन्य गांवों का विस्थापन और होना है.

बिलासपुर और मरवाही फारेस्ट डिवीजन में स्थित अचानकमार टाईगर रिजर्व एरिया के अंतर्गत 625.195 वर्ग किलोमीटर कोर जोन, 287.822 वर्ग किलोमीटर बफर जोन सहित कुल एरिया 914.017 वर्ग किलोमीटर है.
कोर एरिया का 551.552 वर्ग किलोमीटर एरिया अचानकमार वन्यप्राणी अभ्यारण्य में आता है और 74.643 नान प्रोटेक्टेड एरिया है. 20 फरवरी 2009 को अचानकमार टाइगर रिजर्व एरिया का नोटिफिकेशन जारी हुआ और उसके बाद यहां के 25 में से छह गांव जल्दा, कूबा, सांभरधसान, बोकराकछार, बांकल, बहाउड़ के पहले चरण के विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हुई.

विस्थापन में न तो पुर्नवास नीति का पालन हुआ और न ही मानवता का ही ख्याल रखा गया. विशेष पिछड़ी जनजाति कहे जाने वाले बैगा आदिवासियों को धमकियां दी गई कि यदि उन्होंने उनकी बात नहीं मानी और वे यहां से जाने तैयार नहीं हुए तो फिर किसी भी घटना के लिए वे जिम्मेदार नहीं होंगे. कैमरे में रिकार्डेड बयान में आदिवासियों ने दावा किया कि जंगल के अधिकारियों ने आ कर धमकियां दी कि अगर गांव खाली नहीं किया तो यहां हाथी छोड़े जाएंगे और तुम सब मारे जाओगे.

आदिवासी डर गये और उन्होंने विस्थापित होना स्वीकार किया. बरसों से तिनका-तिनका कर जंगल के बीच बसाया आशियाना पलभर में उजड़ गया और आधे-अधूरे सामान के साथ परिवारों ने वहां से चले जाने में ही अपनी भलाई समझी.

आंकड़ों में पुनर्वास
विस्थापन और पुर्नवास पर गौर करें तो बांकल के तीस परिवारों के 127 लोगों को, बोकराकछार के 38 परिवारों के 136 , सांभरधसान के 17 परिवारों के 44 , जल्दा के 74 परिवारों के 258 , कूबा के 22 परिवारों के 52 तो बहाउड़ के 66 परिवारों के 254 लोगों को विस्थापित किया गया है. ऐसे में कुल विस्थापित परिवारों की संख्या 249और इनकी कुल जनसंख्या 866 है. इनमें अधिकांश परिवार बैगा आदिवासियों का है जबकि इनमें कुछ परिवार गोड़, उरांव और यादवों का भी है.

वन विभाग का दावा है कि सभी हितग्राही परिवारों को विस्थापित कर उनका नियमानुसार पुर्नवास किया गया है लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि अभी बीस की संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जो इससे वंचित हैं.
वंचित ग्रामीणों का कहना है कि उनके साथ वन विभाग ने धोखा किया है. टाईगर रिजर्व के लिए छह गांवों में निवास करने वाले परिवारों का सर्वे 2007-08 में किया गया था, जिसके मुताबिक करीब 270 परिवार चिन्हांकित किये गये थे, लेकिन 249 परिवारों का विस्थापन किया गया.

यह कैसे हुआ इस सवाल का जवाब देते हुए रामनारायण मरकाम बताते हैं- ''वन विभाग ने जब ग्रामीणों का विस्थापन किया तो उसने अपने ही द्वारा किये गये वर्ष 2007-08 के सर्वे को गलत बताते हुए वर्ष 2004-05 में हुए सर्वे का पालन किया. जिसके कारण कई परिवारों का विस्थापन नहीं हो सका. न उन्हें खेती की जमीन मिली और न मकान और न ही कोई अन्य सुविधा. जब उन्होंने इस मामले की शिकायत वन विभाग के अफसरों से की तो उन्होंने यह वायदा किया कि जब दूसरे चरण में पांच गांवों का विस्थापन होगा तब सभी वंचितों को शामिल कर लिया जाएगा. इसलिए वे शांत रहें.''

वंचित आदिवासियों को उस समय तो अफसरों की बात पर भरोसा हो गया लेकिन आज उन्हें इस बात का अहसास हो रहा है कि वे ठगे गये हैं. बांकल के लखन सिंह भी वंचितों में शामिल है और अपने पुराने गांव से बिछुड़ने और मकान और खेती के लिए जमीन नहीं मिलने के कारण वह शून्य में निहारते रहते हैं. वह अपने भाई सुकाल सिंह के साथ रहते हैं. सुकाल सिंह ने बताया कि उनका भाई पागल हो गया है और यहां आने से पहले वह सामान्य था. उसे मकान और जमीन नहीं मिलने पर गहरा सदमा लगा है.

लखन की तरह ही इसी गांव के बारी लाल, इतवारी, अर्जुन और रामनाथ को विस्थापन और पुर्नवास का लाभ नहीं मिला है. इतना ही नहीं बांकल के मुखिया महंगु के बेटे गिरधारी भी मकान और जमीन से वंचित है. सांभरधसान के भैयालाल और जनकराम बैगा, बोकराकछार के अनंदराम पिता गुलाब सिंह, अनंद राम पिता महेत्तर, प्रमोद पिता दुकालु राम,सुरेश और फूलबाई को उनका घर और जमीन नहीं मिली. फूलबाई अपने रिश्तेदार गरीबा के साथ रहती है जबकि अन्य वंचित या तो पलायन कर गये या फिर अपने रिश्तेदारों के घर किसी तरह रह रहे हैं.

कूबा और बहाउड़ के वंचितों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. बहाउड़ में दाउ सिंह, समार सिंह, इतवारी सहित अन्य कुछ लोग अपना अधिकार नहीं पा सके हैं. इन्हें वन अधिकार अधिनियम 2006 का हवाला देते हुए उनके अधिकार से वंचित कर दिया गया है, जबकि इनका आरोप है कि उनके साथ वन विभाग के अफसरों ने जान-बूझकर ऐसा किया है. उनका जीवन अधर में लटक रहा है. न उनके पास रहने के लिए मकान है और न खेती के लिए जमीन. वे न तो वापस अपने गांव लौट सकते हैं और न नये गांव में उनका ठिकाना रहा, ऐसे में आखिर वे जायें तो जायें कहा. कुछ दिनों तक रिश्तेदारों के यहां दिन काटने के बाद अब उन्होंने भी उनसे मुंह फेर लिया है, ऐसे में वे परेशान और दुखी है. वे मानते हैं कि यदि सबसे अधिक किसी का नुकसान हुआ है तो उनका.

लेकिन जिनका कथित पुनर्वास हुआ, उनके हिस्से भी वन विभाग के कागजी वायदे ही आये. वन अधिकार अधिनियम 2006 के मुताबिक विस्थापित परिवारों को जमीन का पट्टा वैसे भी दिया जाना था लेकिन आज तक उन्हें न घर का पट्टा मिला और न खेती की जमीन का. हद तो यह हो गई कि आदिवासियों को विस्थापन करने पेशा एक्ट का उल्लंघन किया गया. वन विभाग का दावा है कि इसके लिए ग्राम सभा की सहमति ली गई है लेकिन ग्रामीण इस बात से इनकार करते हैं.

विस्थापन के पहले न तो जिला पुर्नवास समिति की बैठक हुई और न ही जिला प्रशासन के अधिकारियों से कोई चर्चा की गई. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के अनुसार पहले दिन से जिला प्रशासन को विस्थापन और पुर्नवास में शामिल करना था लेकिन वन विभाग ने ऐसा नहीं किया. यही कारण है कि शासन की योजनाओं का लाभ आदिवासियों को आज भी नहीं मिल रहा है.

पूरे देश में महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना का लाभ लोगों को मिल रहा है लेकिन बेरोजगारी की मार झेल रहे आदिवासी दूर-दराज जंगलों में या तो बांस कटाई या अन्य कार्य करने मजबूर है या फिर दिल्ली-आगरा जैसे शहरों में पलायन कर रहे हैं.


         



-सुनील शर्मा 
(एनएफआई की मीडिया फेलोशीप के तहत किये जा रहे अध्ययन का हिस्सा)
जारी...


शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

केशव भैया और करवा चौथ


श्री केशव शुक्ला

आज करवा चौथ है...आज के दिन से जुड़ी एक खास बात मुझे याद आ रही है...जब मैं पत्रकारिता में नया—नया आया था, तो हरिभूमि बिलासपुर में धर्म—कला—संस्कृति वरिष्ठ पत्रकार केशव शुक्ला जी कवर करते थे. 

उनके बारे में एक कथा कुछ यो प्रचलित थी कि एक बार शुक्ला जी करवा चौथ के दिन एक पंजाबी महिला से व्रत के संबंध में पूछने गए. कुछ जानकारी देने के बाद पूजा करते हुए तस्वीर लेने के लिए उन्होंने उन्हें पूजा के वक्त बुलाया. शुक्ला जी बड़े जुझारू पत्रकार थे वे वक्त से पहले ही उस महिला के घर फोटोग्राफर को लेकर चले गए.उन्हें देखकर महिला ने कहा...भैया अभी न तो मेरे पति आये है और न चांद ही निकला है और आप आ गए...अब मैं पूजा किसकी करूं...

इस प्रसंग को लेकर साथी जमकर चटखारे लेते थे...शायद ही ऐसा कोई करवाचौथ हो जब शुक्ला जी को याद न किया जाता हो...फिर वे ड्यूटी में रहे या न रहे...मित्रों इस बात को शेयर करते हुए मुझे खुशी भी हो रही है और दुख भी क्योंकि अब शुक्ला जी पत्रकारिता की मुख्यधारा से अलग हो चुके है. उनके चरणों में मेरा सादर प्रणाम और ईश्वर से प्रार्थना की उन्हें लंबी आयु प्रदान करें.

धर्म—कला—संस्कृति बीट को पत्रकारिता में उपेक्षित समझा जाता है लेकिन ऐसे क्षेत्र में भी उन्होंने खूब नाम कमाया. इस क्षेत्र में उनके टक्कर का कोई पत्रकार नहीं है और कार्पोरेट मीडिया के इस युग में नहीं लगता कि इन बीट पर कोई पत्रकार काम भी करेगा.हालांकि अभी भाई नीरज दीवान (पत्रकार,नई दुनिया) ने शुक्ला जी की इस विरासत को संभालने का पूरा प्रयास किया है...पर शुक्ला जी तो शुक्ला जी है.यदि शुक्ला जी मेरे इस लिखे को  पढ़ेंगे तो उम्मीद करता हूं कि बुरा नहीं मानेंगे तो... आखिर उनके स्नेह पर मेरा भी तो अधिकार है.

केशव भैया की पत्रकारिता से जुड़ी कुछ और दिलचस्प बातें आगे भी जारी रहेगी.उनके पान खाने,उनकी आदतों और उनके द्वारा लिखी गई किताबों के बारे...
 * करवा चौथ की सभी को शुभकामनाएं.
-सुनील शर्मा